_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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भारत की विराट सनातन संस्कृति और धार्मिक चेतना का केंद्र रहा है – हरिद्वार। जहां महापर्व तथा उत्सवों पर उत्तर- दक्षिण, पूरब – पश्चिम से जब लाखों-करोड़ों नर नारी श्रद्धा भाव से एकत्र होते हैं तो भाषा, प्रदेश और संप्रदाय के सारे भेद मिट जाते हैं। हरिद्वार का एक प्राचीन एवं पौराणिक स्थान है सप्तऋषि आश्रम। इस क्षेत्र में गंगा जी भी प्राचीन काल से ‘एक से अनेक’ तथा ‘अनेक से एक’ धारा में होकर बहती आ रही हैं।

हरिद्वार के इसी क्षेत्र में बना है श्रद्धालुओं के आकर्षण का अनूठा केंद्र ‘भारत माता मंदिर’। इस मंदिर का निर्माण प्रख्यात स्वामी सत्यमित्रानंद जी ने अपने विचारों को मूर्त रूप देने के लिए कराया था।

आधुनिक युवा पीढ़ी अपने सनातन धर्म एवं संस्कृति के पूर्वजों तथा ऋषियों को ही विस्मरण कर बैठी तो वह उनके श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में कैसे उतार सकती है? स्वामी सत्यमित्रानंद जी का उद्देश्य भारत माता मंदिर के निर्माण के द्वारा युवा पीढ़ी को देश के संत, आचार्य, बलिदानी, महापुरुषों, साध्वी, सतियों के जीवन से प्रेरणा, व्रत और संकल्प के लिए प्रेरित करना था।

भारत माता मंदिर भारत राष्ट्र की शक्ति और एकता का अद्भुत मंदिर है। जहां धर्म, मत ,भाषा और प्रदेश आदि का कोई भेद नहीं है। इस मंदिर में एक विराट मानव चेतना है, जिसके मूल में है हमारी संस्कृति की शाश्वत राष्ट्रीय एकता का अमृतमय चिंतन।

भारत माता मंदिर का उद्घाटन स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने १५ मई १९८३ को किया था। १८० फुट ऊंचाई के इस भव्य मंदिर में भूमि तल सहित ८ मंजिलें हैं। मंदिर की प्रत्येक मंजिल के विस्तृत हाल में देश, धर्म तथा संस्कृति के संरक्षक भारतीय विभूतियों की भव्य प्रतिमाएं स्थापित हैं। स्वामी जी की मान्यता थी कि हमारी संस्कृति की रक्षा शूरवीरों, सतियों, ऋषियों-मुनियों और संतों ने की है।

सबसे पहले आधार तल वाले कक्ष में भारत माता की विशाल व भव्य प्रतिमा लगी है, जिसे देख कर प्रत्येक दर्शक का हृदय राष्ट्र चेतना और मातृभूमि के गौरव से सहज ही भर जाता है। भारत माता के एक हाथ में दूध का कलश है और दूसरे में अनाज की बालियों का गुच्छा। यह दोनों भारत में श्वेत क्रांति और हरित क्रांति के प्रतीक हैं। वास्तव में दूध और अनाज हमारी प्रगति और शक्ति के आधार हैं और यही इन प्रतीकों के द्वारा दर्शाया गया है। भारत माता की प्रतिमा के पीछे भारत माता यंत्र बनाया गया है जिसका आधार हमारी प्राचीन तंत्र साधना है और यह तंत्र भारत की शक्ति एवं शौर्य की वृद्धि करता है। इसी कक्ष के मध्य में एक ढलवां चबूतरे पर भारत का एक विशाल चित्र बना है। जिसमें भारतीय संस्कृति व धर्म से संबद्ध स्थानों – द्वादश ज्योतिर्लिंग, सप्त पुरिया और चारों धामों को प्रमुखता से दर्शाया गया है।

इससे ऊपर का प्रथम तल ‘शूर मंदिर’ के रूप में है।शूर मंदिर राष्ट्रवीरों की पावन प्रेरणादायी स्मृति को समर्पित है। इस कक्ष में भारतमाता के उन सपूतों की प्रतिमाएं हैं जिन्होंने देश और धर्म की रक्षा के लिए अपना जीवन व प्राण न्यौछावर किए। ये हैं गुरु गोविंद सिंह, छत्रपति शिवाजी, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, शहीद भगत सिंह, अशफाकउल्ला खां, वीर सावरकर, हेमू कलानी, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय आदि शूरवीरों की आकर्षक प्रतिमाएं हैं।

इस विशाल मंदिर के दूसरे तल पर सती मंदिर है। भारतीय संस्कृति में नारी को ‘शक्ति रूपा’ कहा गया है। इस कक्ष में वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक की महान सती माताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। भारतीय संस्कृति में नारियों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए ऋषियों ने कहा है –

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ अर्थात जहां स्त्रियों का सम्मान सुरक्षित रहता है, वहां देवतागण निवास करते हैं।

इस सती मंदिर में गार्गी,मैत्रेयी, उर्मिला,दमयंती,अनुसूय्या,मदालसा,अंण्डाल, पद्मिनी महारानी लक्ष्मी बाई, मीरा, एनी बेसेंट की अतिसुंदर प्रतिमाएं हैं।

मंदिर के इससे ऊपर वाले तीसरे तल को ‘संत मंदिर’ के रूप में रखा गया है। जिन महापुरुषों ने ऐश्वर्य, संपत्ति और अभिमान से भरे इस भौतिक जगत की चकाचौंध को ठोकर मार कर शाश्वत सत्य के दर्शन कराए। इन महापुरुषों ने भारत देश को एकता के सूत्र में पिरोया और मनुष्य जाति को समय-समय पर नवजीवन प्रदान किया, प्रेम भक्ति और ज्ञान की मंगलमयी धारा प्रवाहित की, अपने अमर वांग्मय के द्वारा इस देश के साहित्य को समृद्ध किया। इस कक्ष में आकर भाषा, भाव, प्रदेश, धर्म और काल की सभी सीमाएं टूट जाती हैं और भारतमाता का भव्य रूप उभरता है। इस मंदिर में गौतम बुद्ध,भगवान महावीर स्वामी,आदि जगद्गुरु शंकराचार्य,गुरु नानक देव,चैतन्य महाप्रभु,गोस्वामी तुलसीदास, संत ज्ञानेश्वर, समर्थ गुरु रामदास, निंबार्काचार्य, रामानुजाचार्य, श्रीवल्लभाचार्य, माधवाचार्य, कबीर दास, नरसी मेहता, संत ज्ञानेश्वर, स्वामी दयानंद, गरीब दास जी, स्वामी विवेकानंद, स्वामी अरविंद, रामकृष्ण परमहंस, मां शारदा, रसखान तथा साईं बाबा इत्यादि की भव्य प्रतिमाएं हैं।

मंदिर के पांचवे तल पर सर्वोत्तम सुंदर तथा अद्भुत शक्ति मंदिर है। यहां मातृ शक्ति की स्तुति की गई है जो हमारी आध्यात्मिक तथा नैतिक शक्ति का आधार है और असत्य पर सत्य की विजय का शाश्वत प्रतीक भी है। देवी भागवत महापुराण में वर्णित नवदुर्गा – शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी चंद्रघंटा कुष्मांडा स्कंदमाता कात्यायनी कालरात्रि महागौरी सिद्धिदात्री के नौ रूपों को साकार करती हुई उनकी प्रतिमाएं विराजित हैं। इस शक्ति मंदिर में दक्षिण की मीनाक्षी देवी गुजरात की अंबाजी वेदमाता गायत्री और वीणा वादिनी सरस्वती की भव्य प्रतिमाएं भी हैं।

मंदिर के छठे तल पर भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों की झांकियां स्थापित हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है ‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ यानी दुष्टों के नाश के लिए अवतार लेकर पृथ्वी का कल्याण करते हैं। इस विष्णु मंदिर में भगवान लक्ष्मीनारायण, सीताराम, राधाकृष्ण, श्रीवेंकटेश, श्रीनाथ जी, विट्ठल रुक्मणी तथा रणछोड़ जी की प्रतिमाएं अवस्थित है।

भारतीय संस्कृति में ‘शिव ‘को महादेव और कल्याण का अधिष्ठाता कहा गया है। भोले शंकर हिमालय पर्वत के कैलाश शिखर पर शोभा पा रहे हैं। भारत माता मंदिर के अंतिम और सातवें तल पर संसार के परम शिव कल्याण और सुख के प्रदाता भगवान शंकर का सुंदर मंदिर है जिसमें भगवान शंकर की चांदी की मूर्ति अर्धनारीश्वर और नटराज की सुंदर प्रतिमाएं हैं।

इस प्रकार भारत माता मंदिर के दर्शनार्थ आए प्रत्येक श्रद्धालु को भारत के सभी भगवद्विग्रह के दर्शन करने का सौभाग्य एक ही स्थान पर प्राप्त हो जाता है।

हरिद्वार स्थित यह भारत माता मंदिर युगों से चली आ रही हमारी सनातन संस्कृति के गौरव और राष्ट्रीय एकता का ज्योतिस्तंभ है।

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