___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत)के १००कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
_____________________________________

हरिद्वार के बिल्व पर्वत पर विराजमान मनसा देवी अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ति करने वाली देवी कहलाती हैं। मनसा देवी की पूजा विष हरने वाली देवी के रूप में भी की जाती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि देवी की पूजा से विष का भय नहीं रहता।

मनसा देवी मां दुर्गा का ही प्रतिरूप हैं, जो भक्तों की मनसा (कामनाओं) को पूरा करती हैं। देवी भगवती का मंत्र त्रिकोण है। हरिद्वार में देवी के तीनों सिद्ध पीठ त्रिकोणात्मक हैं। देवियों के इस त्रिकोण के एक कोन पर मां मनसा देवी का मंदिर बना हुआ है।

हरिद्वार में मनसा देवी का अति प्राचीन मंदिर है। इसका जीर्णोद्धार कुछ दशक पहले ही शांतानंद जी के द्वारा हुआ था।

देवी भागवत में मनसा देवी के 12 नामों का वर्णन किया गया है –

“जरत्कारु जगद्गौरी मनसा सिद्धि योगिनी
वैष्णवी नागभामिनी शेवी नागेश्वरी तथा।

जरत्कारू प्रिया आस्तिक माता विषहरेती च
महाज्ञान युवा चैव सा देवी विश्व पूजिता।।”

मनसा देवी की उत्पत्ति और देवी बनने की कथा बहुत रोचक है।

पौराणिक कथाओं में मनसा देवी का वर्णन ऋषि कश्यप और नागमाता कद्रू की बेटी के रूप में किया गया है।

मनसा देवी को भगवान शंकर की मानस पुत्री के रूप में जाना जाता है। यह देवी उन्हीं के तेज से उत्पन्न हुई। भगवान शंकर ने स्वयं गुरु रूप में इस देवी को अत्यंत गोपनीय विनाशक शक्तियों का ज्ञान दिया है। भगवान शंकर की पुत्री मनसा को ऋषि कश्यप ने अपने संरक्षण में पाला और स्वयं ब्रह्मा जी ने इनका नामकरण किया।

पुराणों में बताया गया है कि जरत्कारु ऋषि की पत्नी जरत्कारु ही बाद में मनसा देवी के नाम से विख्यात हुई। ऋषि जरत्कारु ने यह प्रण किया हुआ था कि जब मेरे नाम वाली ही कन्या मिल जाएगी और वह भी भिक्षा की तरह तथा जिसके भरण पोषण का भार भी मेरे ऊपर न रहे तो मैं उस कन्या को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लूंगा। ऐसा सब होने पर ही मैं विवाह करूंगा अन्यथा नहीं।

नागराज वासुकि मनसा देवी के भाई माने जाते हैं। वासुकि नाग को भगवान शिव की कठोर तपस्या करने के बाद उनके गले में लिपटकर रहने का वरदान प्राप्त हुआ था।

ब्रह्मा जी ने इन देवी का नामकरण करते हुए बताया कि महान से महान विष भी इस देवी के सामने तुच्छ है इसलिए इस देवी का नाम विषहरि होगा।

इसी कारण समस्त नागों के राजा और भगवान शिव के गले में विराजमान वासुकि नाग ने इसे बहन के रूप में स्वीकार कर नाग लोक की देवी घोषित किया। इसी देवी ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या करके वेदों का अध्ययन किया और कृष्ण मंत्र प्राप्त किया, जो कल्पतरु मंत्र कहलाता है। भगवान श्री कृष्ण ने दर्शन देकर इन्हें वरदान दिया कि तीनों लोकों में तुम्हारी पूजा होगी। यह वृत्तांत ब्रह्मवैवर्त पुराण में है।

लोक मिथक है कि पांडवों में से एक धनुर्धारी अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई थी। एक सर्प के काटने से पिता परीक्षित की मृत्यु के बाद जनमेजय ने नागवंश के विनाश की प्रतिज्ञा ली थी। इसके लिए जनमेजय ने सभी सर्पों को समाप्त करने के लिए सर्प यज्ञ का आयोजन कराया। जिस समय जन्मेजय का सर्प यज्ञ हो रहा था, तब ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा कि इस समय जगत में सर्प बहुत बढ़ गए हैं, अत: अब जरत्कारु नाम के एक ऋषि होंगे-उनके पुत्र का नाम होगा आस्तिक, वही जनमेजय का सर्प यज्ञ बंद करा सकेंगे।

देवताओं के पूछने पर ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि जरत्कारु ऋषि की पत्नी का नाम भी जरत्कारु होगा वह सर्पराज वासुकि की बहन होगी-उसके गर्भ से आस्तिक का जन्म होगा और वही सर्पों को मुक्त करेगा।

अब यह सभी सुयोग कैसे बने-इसकी चिंता एलापत्र नामक नाग को हुई। एलापत्र नाग ने सर्पराज वासुकि से प्रार्थना की कि अगर जरत्कारु ऋषि दीक्षा में पत्नी की याचना करें, तो उन्हें अपनी बहन देकर मुक्ति का मार्ग तलाशें। इस प्रकार की प्रार्थना देवताओं ने भी, यहां तक कि स्वयं ब्रह्मा जी ने सर्पराज वासुकि से की। तब पितरों तथा देवताओं की इच्छा पूरी करने के लिए और स्वयं ऋषि की प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए वासुकी नाग की बहन जरत्कारु का विवाह जरत्कारु ऋषि से हुआ।दोनों के पुत्र आस्तिक ने सर्पों को महाराज जनमेजय के प्रकोप से बचाया था।

कहते हैं जरत्कारु ऋषि विवाह के लिए आसानी से मान जाने वाले न थे। उनके पितरों ने एक दिन जरत्कारु से वंश बचाने के लिए करुण स्वर में प्रार्थना की, तब जाकर जरत्कारु की तपस्या भंग होने को आई। वृद्ध ऋषि को और कोई तो अपनी पुत्री देता नहीं तथा प्रतिज्ञा के कारण भी उनके साथ जरत्कारु कन्या का विवाह हुआ।

यह विवाह जरत्कारु ने अपने पूर्वजों की मोक्ष प्राप्ति के लिए अपनी शर्तों पर, वह भी विचित्र शर्त पर किया था। ‘अगर मेरी रुचि के विरुद्ध काम किया तो छोड़ कर चला जाऊंगा।’एक दिन जरा सी भूल पर कुपित होकर ऋषि जरत्कारु अपनी पत्नी को छोड़कर चले गए।

यहीं से जरत्कारु कन्या के देवी बनने की कथा शुरू होती है। आहत होकर उन्होंने शंकर की कठोर तपस्या की। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उनको ‘मनोकामना पूर्ति’ की देवी के रूप में पूजे जाने का वरदान दिया।

कहते हैं कि भगवान शिव ने जब समुंद्र मंथन से निकला विष पिया, तब मनसा ने ही उनकी रक्षा की। इसके बाद मनसा की पूजा विष हरने वाली देवी के रूप में होने लगी।

यह भी मान्यता है कि एक बार धन्वंतरी ऋषि और सांपों में बड़ा भारी युद्ध हुआ। जिसमें बड़ी संख्या में सर्प मारे गए। यह देख वासुकी नाग ने अपनी बहन को धनवंतरी और उनके शिष्यों का विनाश करने के लिए भेजा। सर्पों के मारे जाने से क्रोध से कांपती हुई वासुकि की बहन धनवंतरी से लड़ने के लिए चली। उनके हाथ में मंत्रसिद्ध कमल का एक फूल था। उस मंत्रसिद्ध कमल के फूल को उन्होंने धनवंतरी की तरफ फेंक दिया, जिससे आग की लपटें निकलने लगी। इसके उत्तर में धनवंतरी ने धरती से एक मुट्ठी धूल को उठाया और मंत्रसिद्ध करके कमल के फूल की तरफ फेंक दिया। जिससे कमल का फूल तुरंत राख बन कर भूमि पर गिर गया।

अब मनसा ने विषैले नागों से नागपाश बनाया उसके उत्तर में गरुड़ देव आ गए और उन्होंने सारे नागों को समाप्त कर दिया। मनसा अपनी इस पराजय से बहुत दुखी हुई। तभी उन्हें भगवान शिव के द्वारा दिए गए ‘अमोघशूल’का स्मरण हुआ। मनसा इस अमोघशूल से वार करना ही चाहती थी कि स्वयं भगवान शिव और ब्रह्मा प्रकट हो गए। इन दोनों देवों के समझाने से मनसा और धनवंतरी में संधि हो गई। ब्रह्मा जी के वरदान से मनसा सर्पों की देवी मानी गई।

पितरों की अभिलाषा (मनसा) को पूरा करने देवताओं की इच्छा (मनसा) पूरी करने और स्वयं ऋषि की प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए इस देवी का नाम मनसा हुआ और यह मनसा देवी के नाम से विख्यात हुई।

हरिद्वार में रेलवे लाइन के साथ हरकी पैड़ी के पीछे बिल्लपर्वत के शिखर पर मनसा देवी का मंदिर है। बिल्व पर्वत पर विराजमान मनसा देवी मनोकामना पूर्ति की देवी कहलाती हैं।

हरिद्वार के इस अति प्राचीन मनसा देवी मंदिर के संदर्भ में पुराणों में जो संदर्भ मिलता है उसके अनुसार बिल्केश्वर के ऊपर ललिता देवी का मंदिर था जिसे स्यालकोटी या सुनारकोटी कहते थे। तैमूर लंग ने जब हरिद्वार में मंदिरों का विध्वंस किया उस समय यह मंदिर ध्वस्त हो गया था। बाद में धनपतिया बाबा संप्रदाय के एक सिद्ध संत ने उस ध्वस्त हुए मंदिर की एक शीलामूर्ति स्यालकोटी से उठाकर जहां मनसा शिला थी, मंदिर का निर्माण करवाया। वेहुला के समय से ही इस स्थान पर एक स्नेही वृक्ष पर मनसा पूजन हुआ करता था। बाद में जब वह स्नेही वृक्ष नष्ट हुआ तो वहीं पर सिहोरुक वृक्ष पर स्त्रियां अपने कपड़ों के चीर बांधकर मंशापूर्णी की पूजा किया करती थी और अभिलाषित वर मांगती थी। मनोकामना के पूरी हो जाने पर पुण: यहां आकर पूजा की जाती थी।

मनसा देवी मंदिर के निर्माण के संदर्भ में बताया जाता है कि एक रात्रि महंत मुखरामगिरी के स्वप्न में देखा कि मंदिर आग में जलकर ध्वस्त हो गया है और मां कह रही है कि तेरे पास जो मूर्ति है उसे मेरी इस शिला पर स्थापित कर दे। तब उसी दिन सन 1942 में मूर्ति प्रतिष्ठित हो गई। बाद में मनसा देवी मंदिर का जीर्णोद्धार श्रवणनाथ मठ के तात्कालिक महंत शांतानंदनाथ ने करवाया था।

उस समय मंदिर का मार्ग बहुत दुर्गम था। कठिन चढ़ाई तथा घनघोर जंगल में खूंखार जानवरों के डर से आतंकित होकर श्रद्धालु मंदिर तक जाने से घबराते थे। इस स्थान पर जल और अन्य जरूरी सुविधाओं का भी अभाव था। बाद में कुछ संतो के अथक प्रयासों से यहां जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था हो पाई। रोपवे आदि की व्यवस्था होने के बाद तो इस स्थान की कायापलट हो गई। सुविधाओं के हो जाने पर अब यहां भारी संख्या में श्रद्धालु भक्तों पहुंचते हैं।

मनसा देवी मंदिर पहुंचने के लिए 2 किलोमीटर लंबा पैदल मार्ग भी है। यह चढ़ाई बहुत मुश्किल नहीं है और इस रास्ते से हरिद्वार नगरी का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। इसके अलावा बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त रोपवे सेवा के द्वारा मंदिर में दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं।

माता मनसा देवी मंदिर का निर्माण संगमरमर पत्थर से कराया गया है। गर्भगृह में चांदी के एक सुंदर मंडप में माता की पांच मुख एवं दस भुजाओं वाली प्रतिमा चांदी के सिंहासन पर विराजमान है। मनसा देवी का दिव्य स्वरूप गौर वर्ण एवं सौम्य है। मनसा देवी की गायत्री स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। मनसा देवी के सम्मुख भगवान शंकर का मंदिर है। माता के मुख्य मंदिर के बाएं भाग में हवन कुंड एवं शीतला माता का मंदिर है तथा दक्षिण भाग में चामुंडा देवी और श्री लक्ष्मीनारायण जी का मंदिर है। पश्चिम दिशा में शिवजी का प्राचीन तथा प्रधान मंदिर है। मनसा देवी मंदिर परिक्रमा में भी विभिन्न देवी देवताओं की सुंदर मूर्तियां दीवारों पर बनाई गई है। मंदिर का अधिकांश भाग भी आकर्षक और पत्थरों से सुसज्जित है। पास में ही अष्टभुजा भैरव का मंदिर है, उसके पीछे आधा मील उतरने पर सूर्यकुंड नामक कुंड है।

श्रद्धालु भक्तों के द्वारा प्रसाद के रूप में मनसा देवी को नारियल, लाई, परवल, इलायची दाना, फूल माला और धूप अगरबत्ती चढ़ाने की परंपरा है। श्रद्धालु भक्त माता को चुनरी एवं छत्र विशेष रुप से चढ़ाते हैं।

माता मनसा देवी मंदिर के बाहर कचनार वृक्ष जिसे स्नेही वृक्ष के नाम से जाना जाता है। इस वृक्ष की विशेषता यह है कि वृक्ष का आकार कभी बदला ही नहीं है। यह एक समान ही रहता है। श्रद्धालु भक्तों के द्वारा इस स्नेहीवृक्ष पर मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मौलीधागा बांधने की परंपरा है। जो भी श्रद्धालु भक्त मनसा देवी मंदिर में माथा टेकने के बाद स्नेही वृक्ष पर मौलीधागा बांधता है और संकल्प लेता है कि मनोकामना पूरी होने के बाद मां के दरबार में पुण: माता मनसा देवी के दर्शन करने के लिए आएगा। मनोकामना पूरी होने के बाद मौलीधागे को खोलकर मां के मंदिर में चढ़ाया जाता है।

माता मनसा देवी विवाह एवं संतान की कामना पूरी करने के लिए जानी जाती हैं। सर्प दोष से मुक्ति के लिए भी माता की पूजा की जाती है।

चैत्र तथा अश्विन नवरात्रों में मंदिर में मां के निमित्त अनुष्ठान किया जाता है।

हरिद्वार से रात्रि के समय मनसा देवी पर्वत का रोशनी से झिलमिलाता हुआ बहुत ही मनोहरी दृश्य दिखाई देता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *