_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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खांडसारी उद्योग के लिए प्रसिद्ध छोटीकाशी कहे जाने वाले चरथावल कस्बे में चमत्कारिक भैरव जी का मंदिर स्थित है।

यह भैरव मंदिर चरथावल बस स्टैंड से मात्र 1 किलोमीटर दूर शिव चौक बाजार के निकट मोहल्ला मुर्दापट्टी में स्थापित है।

श्रद्धा, विश्वास और अटूट आस्था का प्रतीक प्राचीन श्री भैरव मंदिर सिद्धपीठ है। मान्यता है कि यहां सभी की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

बाबा भैरव का मंदिर‌ इस क्षेत्र में एक अलग ही स्थान रखता है।इस मंदिर की स्वयंभू भैरव नाथ जी की पिंडी के बारे में कहा जाता है कि यह स्वयं घटती-बढ़ती रहती है। भैरव नाथ जी का प्राकृतिक मंदिर भारत में केवल दो स्थानों में ही है। एक तो काशी में है या फिर चरथावल में है। मान्यता है कि देश में काशी के बाद यहां पर ही भैरव जी की स्वतः ही उत्पत्ति हुई थी। नगर के बड़े बुजुर्गों का कहना है कि प्राचीन समय में चरथावल को छोटी काशी के नाम से ही जाना जाता था।

इस मंदिर में बाबा भैरव की मूर्ति के चारों ओर पत्थर का चक्र बना हुआ है तथा इस चक्र के बीच में बाबा भैरव की मूर्ति स्थापित है।

प्रत्येक शनिवार को बाबा बटुक भैरव का तेलाभिषेक व श्रंगार आदि किया जाता है। लोगों का विश्वास है शनिवार के दिन बाबा भैरव की मूर्ति को लाल सिंदूर का तिलक, उड़द काले तिल चढ़ाने व देसी घी का चौमुखा दीया जलाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए महिलाओं द्वारा प्रत्येक शनिवार के दिन यहां विधिवत पूजा अर्चना के साथ मन्नतें मांगी जाती हैं। श्रद्धा से मांगी गई सभी मनोकामनाएं पूरी भी होती है। इस मंदिर की अपनी विशेषता है। यहां पूजा करने से सभी के कष्ट दूर हो जाते हैं।

भैरव मंदिर में आषाढ़ मास के अंतिम दो शनिवार के दिन अनुष्ठान करने की परंपरा है। श्रद्धालुओं के द्वारा मंदिर परिसर में बाबा की पिंडी के दर्शन कर सिंदूर, चादर और प्रसाद चढ़ाने की परंपरा है। इन दिनों दूरदराज के जनपदों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आकर प्रसाद चढ़ाते हैं और पूजा अर्चना करते हैं। शनिवार को मंदिर में भारी चहल-पहल रहती है। श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होने से यहां पर श्रद्धालुओं का आवागमन लगा रहता है।इन दिनों भारी संख्या में श्रद्धालु महिलाएं भी मंदिर में पहुंचकर दर्शन करती हैं।

यहां के भैरव देव जी की विशेषता है कि बाबा अपना चौला स्वयं ही बदल लेते हैं। यह प्रतिमा प्रतिवर्ष रूप बदलती है।

स्थानीय लोगों में परिवार में आई नई नवेली दुल्हन और नवजात शिशु को भी भैरव जी के दर्शन कराने की परंपरा है।

प्रतिवर्ष भैरव अष्टमी के अवसर पर भैरव धाम में बाबा बटुक भैरव का शृंगार कर उनकी पूजा अर्चना की जाती है। प्रातः से ही हवन, पूजा-पाठ के साथ भैरवाष्टमी के कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं,। भैरव बाबा के जन्म के समय दोपहर 12:00 बजे पूजा-अर्चना के साथ ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। पूरा मंदिर बाबा के जयकारों से गूंज उठता है। इस अवसर पर भंडारे का भी आयोजन किया जाता है। जिसमें श्रद्धालु बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं

बाबा भैरव नाथ जी का यह मंदिर स्थानीय क्षेत्र में अपने आप में एक अलग पहचान रखता है। वहीं इसकी पहचान बाबा भैरव के मंदिर के साथ ही मंदिर परिसर में ही लगभग 7 फुट लंबी एवं 4 फुट चौड़ी पीर बाबा की समाधि होना भी विशेष महत्व रखता है। पीर बाबा की समाधि पर भी श्रद्धालु चादर और प्रसाद चढ़ाते हैं।

** भैरव बाबा अपनी मूर्ति के ऊपर छत नहीं चाहते हैं यह धारणा तब और अधिक बलवती हो गई जब स्थानीय समाजसेवी लोगों के द्वारा मंदिर के जीर्णोद्धार के समय क‌ई बार प्रयास किए जाने के बाद भी वे भैरव मंदिर के ऊपर छत डलवाने में सफल नहीं हो पाए। आज भी बाबा भैरव का मंदिर ऊपर की ओर से पूरी तरह खुला हुआ है।

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भूमियाखेड़ा –

चरथावल कस्बे की बाहरी सीमा में ग्राम देवता के नाम से विख्यात भूमियाखेड़ा का स्थान है। हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष के पहले और दूसरे शनिवार के दिन भूमियाखेड़ा की पूजा अर्चना की परंपरा है। परिवार की रक्षा, खुशहाली और नगर पर आने वाली सभी अलाओं – बलाओं से रक्षा के लिए साल भर में आषाढ़ महीने के दो शनिवार को भूमिया खेड़ा पर श्रद्धालुओं का मेला लगता है। इस समय यहां भारी संख्या में पूजा-अर्चना करके मत्था टेकने के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। विशेष रुप से बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु ग्रामदेवता पर पीली चादर, दूध और प्रसाद चढ़ाते हैं।

इसी परिसर में ब्रह्मा जी का स्थान भी है कहते हैं कि पुष्कर की तरह चरथावल में भी ब्रह्मा जी का वास है।

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