______________________________________________________ जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र. भारत) के लगभग१००कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के एक अद्भुत पौराणिक तीर्थस्थल के बारे में – – – _____________________________________________

उत्तराखंड राज्य के पौड़ी जिले में पहाड़ की ऊंचाई पर बांज, बुरांश और काफल के घने पेड़ों से घिरा बहुत ही रमणीक वातावरण में अद्वितीय कथाओं और मान्यताओं वाला डांडा नागराजा मंदिर स्थित है।

यह अद्भुत मंदिर श्रद्धालु भक्तों के साथ-साथ देश-विदेश के पर्यटकों के बीच भी बहुत प्रसिद्ध है। यहां मंदिर प्रांगण में दूर तक हजारों की संख्या में घंटियां बंधी हुई हैं जो मंदिर की खूबसूरती को तो बढ़ाती ही हैं यहां का महत्वपूर्ण आकर्षण भी हैं।

गढ़वाल क्षेत्र में पौड़ी शहर से लगभग 37 कि.मी.की दूरी पर बनेलस्युहं पट्टी में अदवानी-बगानीखाल मार्ग पर भगवान श्री कृष्ण के अद्वितीय अवतार वाला नागराजा मंदिर है। पूरे पौड़ी जिले और गढ़वाल इलाके में जिस देव शक्ति की सर्वाधिक मान्यता है वह हैं भगवान कृष्ण के अवतार के रूप में मान्य नागराजा की। श्री कृष्ण के नागराजा रूप का यह पौराणिक मंदिर आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है।

नागराजा मंदिर के ठीक सामने सुदूर हिमालय में हिमाच्छादित पर्वत श्रंखलाओं के तथा दूसरी ओर पवित्र व्यास घाटी एवं गंगा मैया और न्यार नदी के संगम स्थली के मनमोहक दर्शन होते हैं। यह मंदिर इतनी ऊंचाई पर स्थित है कि यहां से मां चंद्रबदनी (टिहरी),भैरवगढ़ी (कीर्तिखाल), महाबगढ़ (यमकेश्वर), कण्डोलिया (पौड़ी) की पहाड़ियों की सुंदरता दृष्टिगोचर होती है।

सनातन हिंदू धर्म में भगवान श्री कृष्ण के प्रति श्रद्धालुओं में अगाध आस्था है। उनके यशोदानंदन, गोपीकृष्ण, मुरलीमनोहर आदि अनेकानेक नाम है और मथुरा-वृंदावन, द्वारका आदि तीर्थ श्री कृष्ण के नाम से जाने जाते हैं जहां उनके प्रसिद्ध मंदिर हैं।

इस क्षेत्र के उत्तराखंड राज्य में भी एक ऐसा क्षेत्र है जहां भगवान श्री कृष्ण के अद्वितीय रूप की पूजा की जाती है, डांडा नागराजा के रूप में। गढ़वाल इलाके में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के इस नागराजा अवतार रूप की बहुत मान्यता है। यहां इस क्षेत्र में यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है।

नागराजा मंदिर के संबंध में पौराणिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण यहां आए थे। श्री कृष्ण को यह स्थान बहुत पावन और रमणीय लगा, जिसकी उन्होंने यहां नाग का रूप धारण करके लिपटकर इस स्थान की परिक्रमा की तभी से मंदिर का नाम डांडा नागराजा पड़ गया। डांडा का अर्थ है पहाड़ और नागराजा का अर्थ सांप,

महाभारत पुराण में नागों और सांपों को महर्षि कश्यप और दक्ष प्रजापति की पुत्री कद्रू की संतान बताया गया है। विष्णु और शिव से भी नागों का संबंध है। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर विश्राम करते हैं तो भगवान शिव उन्हें अपने गले में धारण करते हैं।

पौराणिक काल से मध्य हिमालय क्षेत्र में नागराजा लोक देवता के रूप में पूजित रहे हैं। इनके नाम से स्थापित पूजा स्थल पौड़ी से लेकर जौनसार बावर तक के अनेक स्थानों पर पाए जाते हैैं।

वैसे तो नागराजा का मुख्य धाम हिमालय क्षेत्र के उत्तरकाशी जिले का सेममुखेम में है पर कहा जाता है कि सेममुखेम और डांडा नागराजा मंदिर दोनों की मान्यता एक समान ही है और नागराजा के दोनों प्रसिद्ध मंदिर हैं। पट्टी कड़वाल्सियु व बणेल्स्यु के संधि स्थल पर गांव रीई की जमीन पर लगभग गंगा नदी के ठीक सामने ऊंची पहाड़ी पर नागराजा मंदिर स्थित है। गढ़वाल में ‘कृषि के रक्षक’ नागराजा देव के रूप में डांडा नागराजा की ख्याति दूर-दूर तक है। मंदिर के गर्भगृह की छत पर नाग देवता का बना हुआ क्षत्र है।

डांडा नागराजा मंदिर स्थापना के बारे में मान्यता –

कोट विकास क्षेत्र के नौड,रीई, सिल्सू और लसेरा इन चार गांवों का प्रसिद्ध धाम डांडा नागराजा मंदिर का लगभग १५० वर्ष पुराना इतिहास है। मान्यता के अनुसार प्राचीन समय में लसेरा गांव में गुमाल जाति की एक दुधारू गाय अन्य डंगरों(पशुओं) के साथ पहाड़ पर घास चरने जाती थी। वह गाय डांडा (पहाड़ी) में स्थित एक पत्थर को हर रोज अपने दूध से नहलाती थी। जिस कारण घर वालों को उसका दूध नहीं मिल पाता था।इस बात से परेशान एक दिन उसके मालिक ने गुस्से में आकर गाय पर कुल्हाड़ी से वार कर दिया। परंतु संयोग से उस कुल्हाड़ी का वार गाय को कुछ भी हानि नहीं पहुंचा कर सीधा उसी पत्थर पर जा कर लगा जिसे वह गाय रोजाना अपने दूध से नहलाती थी, कुल्हाड़ी के वार से वह पत्थर दो भागों में टूट गया। उस पत्थर का एक भाग आज भी डांडा नागराजा में मौजूद है। कहते हैं कि इस क्रूर घटना के बाद गुमाल जाति पूरी तरह से समाप्त हो गई।

परंपरा के अनुसार समीपस्थ गांव सिल्सू के पुजारी यहां पूजा अर्चना करते हैं। श्री कृष्ण ने स्वप्न में आकर बताया कि वह यहां विराजमान हैं। यह जानकर उनके पूर्वजों ने इस मंदिर का निर्माण किया।

डांडा नागराजा में हर वर्ष सिद्ध कौथिग त्योहार मनाया जाता है। वैशाखी से अगले दिन १५ अप्रैल को मुख्य मेला आयोजित किया जाता है, तब यहां बहुत भव्य मेला लगता है। पूजा अर्चना के साथ मेले की शुरुआत होती है। लसेरा नागराज का ध्वज ढोल-दमाऊं के साथ मंदिर में स्थापित किया जाता है। इस दिन यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तों की भीड़ उमड़ती है। इस अवसर पर महिलाएं अपनी परंपरागत वेशभूषा में भेंट-पूजा अर्पित करती हैं।

प्रसाद के रूप में श्रद्धालु डांडा नागराज देवता को गुड़ की भेल्ली चढाते हैं। नागराजा देवता के दर्शन करने के बाद श्रद्धालु तीर्थयात्री उनका आशीर्वाद पाने के लिए मंदिर की परिक्रमा करते हैं।

मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु नागराजा को ध्वज व घंटियां अर्पित करते हैं। मंदिर प्रांगण में हजारों की संख्या में घंटियों को बंधे हुए देखा जा सकता है जो मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक तो हैं ही मंदिर की खूबसूरती को और भी अधिक बढ़ाती हैं।

एक दिवसीय मेले के दौरान मठ मंदिरों में शिव पार्वती राधा कृष्ण आदि की झांकियां आकर्षण का केंद्र होती है। इस दौरान लोक गायक अपने साथियों के साथ भजन प्रस्तुत करते हैं। भजनों को सुन कर श्रद्धालु भक्त झूमने लगते हैं। मेले के दौरान विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि भगवान श्री कृष्ण इस मंदिर में निवास करते हैं और यदि कोई श्रद्धालु भक्त वास्तव में सच्चे मन से उनकी प्रार्थना करते हैं तो वह भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं।

  • प्रतिवर्ष यहां श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मेला लगता है।

मनोरम पहाड़ी वादियों में बसा नाग देवता का मंदिर अपनी अद्भुत शक्तियों के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि गलती से भी कोई चोर यहां चोरी कर ले तो वह अंधा हो जाता है, चाह कर भी यहां कोई चोरी नहीं कर सकता। इसलिए मंदिर में किसी प्रकार की रखवाली करने की जरूरत ही नहीं पड़ती है।

पूरे वर्ष भर श्रद्धालु यहां दर्शन करने के लिए आते रहते हैं। यहां आने के लिए सबसे अच्छा मौसम मार्च से नवंबर तक का होता है पर मार्च से जून के महीनों में यहां का नजारा बुरांश के फूलों के सौंदर्य से भर जाता है। इस समय कंडोलिया टेका अदवानी के जंगल बुरांश के फूलों से लदे रहते हैं, श्रद्धालु तीर्थयात्री और पर्यटक ठंडी मंद हवा के साथ बांज बुरांश के छायादार वृक्षों का प्राकृतिक आनंद लेते हुए मंदिर तक पहुंचते हैं।

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