बागपत जनपद में बरनावा से बड़ौत 15 किलोमीटर और मेरठ शहर से 35 किलोमीटर दूर स्थित है।
बरनावा स्थित लाक्षागृह पहुंचने के लिए दिल्ली- सहारनपुर हाईवे से बड़ौत के बाद बिनोली होते हुए बरनाला पहुंचा जा सकता है। दिल्ली से बड़ौत की दूरी लगभग 55 किलोमीटर है
दिल्ली से मेरठ के रास्ते होकर भी बरनावा लाक्षागृह पहुंचा जा सकता है। मेरठ नगर से मेरठ – बड़ौत मार्ग के रास्ते पहुंच सकते हैं।

यह एक पौराणिक स्थल है। महाभारत काल में बरनावा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान था। उस समय इसका नाम वारणावत था। प्राचीन काल में यह महाजनपद का अहम हिस्सा था।
महाभारत कालीन संस्कृति और सभ्यता की यादें आज भी बरनावा स्थित विशाल टीले में दबी हुई है। जब इस टीले का प्रारंभिक सर्वेक्षण किया गया था। तब यहां ऊपरी सतह से ही महाभारतकालीन संस्कृति के चित्रित धूसर मृदभांड अवशेष मिले थे। उन्हें देखकर बरनावा के टीले आसपास के क्षेत्र में प्राचीन काल में महाभारत कालीन घटनाओं का घटित होना पुष्ट होता है।

बरनावा के दोनों और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर एक और हिंडन नदी और दूसरी ओर कृष्णा नदी बहती है। लाक्षागृह के टीले पर खड़े होकर हिंडन और कृष्णा नदी के प्रवाह का विहंगम दृश्य भी देखा जा सकता है। लाक्षागृह से थोड़ी दूर इन नदियों का संगम होता है।
इस स्थान की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में इस स्थान का प्राकृतिक सौंदर्य बहुत ही रमणीक और मनोहारी रहा होगा।

इस स्थान को देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि यह वही स्थान है जहां से महाभारत के द्वंद की औपचारिक शुरुआत हुई थी।

गगनचुंबी टीले का आकर्षण देखते ही बनता है इतने विशाल टीले को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह टीला अपने अंदर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समेटे हुए हैं। 1959 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह स्थल महाभारत काल से जुड़े खंडहर और उस समय की सुरंग के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र है।

बताया जाता है कि दो नदियों के बीच बसा यह स्थान पांडवों को बहुत प्रिय था। पांडव समय-समय पर यहां आकर काफी दिनों तक रहा करते थे। शकुनी और दुर्योधन को जब इस बात का पता चला कि पांडव इस स्थान को बहुत पसंद करते हैं। तो उन्होंने यहां वरणावत में लाख का महल (लाक्षागृह) बनवाकर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव को जीवित ही जलाकर मारने की साजिश रची। लेकिन इससे पहले ही विदुर को कौरवों की साजिश का पता चल गया और उन्होंने अपने दूत भेज कर लाक्षागृह में भूमि के नीचे एक सुरंग बनवा दी। इसी सुरंग से होकर पांचो पांडव और कुंती कौरवों की पहुंच से बहुत दूर चले गए थे।

माना जाता है कि यह वही सुरंग है जिससे पांडव बचकर बाहर निकले थे।

महाभारत काल से भी पहले यह पवित्र भूमि महान ऋषियों की तपोभूमि रही है। महर्षि श्रृंगी, महर्षि महानंद, महर्षि जैमिनी व महर्षि व्यास ने अपने अपने जीवन काल में यहां चतुर्वेद पारायण यज्ञ किए थे।

इसी भूमि पर भीष्म पितामह ने कौरवों और पांडवों को शस्त्र चलाने की शिक्षा दिलवाने के लिए प्रशिक्षण स्थल बनवाया था। कौरवों पांडवों ने यहीं गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा प्राप्त की थी। गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन को महान धनुर्धर और भीम व दुर्योधन को भीषण गदाधारी बनाया था।

शांति दूत बनकर हस्तिनापुर गए भगवान श्री कृष्ण ने कौरव और पांडवों के बीच युद्ध न हो। उसके लिए दुर्योधन से पांडवों के लिए केवल पांच गांव मांगे थे। उन पांच गांवों में से एक गांव वरणावत भी था। लेकिन दुर्योधन ने सुई की नोक के बराबर भी भूमि देने से मना कर दिया था।

यही अर्जुन भीम और घटोत्कच की विज्ञानशालाएं थी।

महाभारत युद्ध के बाद यहां राजा परीक्षित का न्यायालय था।

बाद के समय में यहां श्वेतशक्ति नामक वैश्य ने एक विशाल शिवालय का निर्माण करवाया था। मुगल काल में उस शिव मंदिर को नष्ट कर दिया गया और उस पवित्र भूमि के एक भाग पर कब्रिस्तान बना दिया गया।

इस ऐतिहासिक टीले पर पुराने समय की बनी एक सौ एक सीढ़ियां और कुछ यादगार इमारतें आदि जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

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