_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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भगवान चंद्रप्रभ अतिशय क्षेत्र – बरनावा    –

प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर- इस अतिशय क्षेत्र  दिगंबर जैन मंदिर का  पौराणिक इतिहास है। हर साल लाखों जैन श्रद्धालु यहां दर्शनों के लिए आते हैं। मंदिर में धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता रहता है।

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श्री पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र –  बड़ागांव     –

यहां का प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। प्राचीन समय से यहां  एक विशाल टीला है ।सन 1922 में जैन एलक श्री अनंत कीर्ति जी महाराज यहां से विहार करते हुए जा रहे थे। यहां से गुजरते समय वे इस टीले पर ध्यान लगाकर बैठ गए तो उस समय उनके मन में इस टीले के प्रति काफी जिज्ञासा का भाव पैदा हुआ। महाराज जी ने गांव वालों से इस टीले के बारे में जानकारी ली तो उन ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि यह बहुत पुराना टीला है और गांव वाले  हमेशा से यहां पूजा-अर्चना होते देखते आ रहे हैं। ग्रामीणों की यह बात सुनकर महाराज जी ने कहा कि जरूर यहां कोई देव प्रतिमा है जिसके प्रभाव से यह टीला प्राचीन समय से ही पूजनीय रहा है। उन्होंने  ग्रामीणों से उस स्थान पर खुदाई कराई तो लगभग 8 फीट तक नीचे खोदने के बाद वहां पर किसी मंदिर के चबूतरे की दीवार सी दिखाई दी। वहां पर थोड़ा  और अधिक खुदाई करने के बाद वहां से सफेद पत्थर की भगवान पार्श्वनाथ की एक प्रतिमा मिली ।पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा मिलने के बाद ग्रामीणों में खुशी की लहर दौड़ गई ।उस स्थान से प्रतिमा को उठाते ही वहां से पानी की एक धारा फूट  निकली । उस स्थान पर बाद में एक कुएं का निर्माण करा दिया गया। कहते हैं कि इस कुएं के जल से नहाने पर कई व्यक्तियों की बीमारियां ठीक हो चुकी हैं।

खुदाई के समय मिले चबूतरे कि ईंटों  से ही नए मंदिर की नींव रखी गई और कुछ वर्षों बाद वहां वेदी की प्रतिष्ठा कर भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा की स्थापना की गई।

कुछ वर्षों के बाद 1942 में मंदिर के ही दक्षिणी कोने पर स्थित आम के बाग से भगवानआदिनाथ,विमलनाथ और महावीर स्वामी की प्रतिमाएं मिली। बाद में भी समय-समय पर यहां भूगर्भ से छोटी बड़ी नौ  प्रतिमाएं मिल चुकी हैं। इन सभी प्रतिमाओं का जीर्णोद्धार करके उन्हें मंदिर में स्थापित कर दिया गया है। इस स्थान पर  भूगर्भ से छोटी बड़ी इतनी प्रतिमाओं के  मिलने से यह अनुमान लगाया जा सकता है की प्राचीन काल में यह स्थान एक बड़ा आस्था का केंद्र रहा होगा।

पुराने मंदिर का कायाकल्प कर मंदिर की छत और दीवारों पर मनमोहक नक्काशी व चित्रकारी करवाई गई है । मुख्य प्रतिमा की वेदी पर स्वर्ण की बेहद खूबसूरत चित्रकारी की गई है। मंदिर के प्रांगण में पत्थरों पर नक्काशी का कार्य करवाया गया है।

सावन और फागुन माह में यहां मेले का आयोजन होता है।

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त्रिलोक तीर्थ मंदिर    _

त्रिलोक तीर्थ धाम की छटा ही निराली है।यह एक दर्शनीय स्थल है।

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बिनौली –

मुगल काल में जिस समय पीर साहब ने यहां विशाल सराय को बनवाया तभी उन्होंने उस सराय के मेन दरवाजे के दोनों ओर दो दुकानों का भी निर्माण कराया था, और जोहड़ी गांव से दो जैन व्यापारी परिवार को लाकर उन नवनिर्मित सराय के गेट पर स्थित दुकानों में व्यापार शुरू करवाया। हरियाणा से भी कुछ जैन और अग्रवाल परिवार बिनौली आकर बस गए और अपने व्यापार का केंद्र बिनौली को बनाया। इस तरह बड़ी संख्या में आए व्यापारियों ने इस स्थान को एक अच्छे बाजार के रूप में विकसित कर दिया।

सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां के जिन जैन व्यापारी परिवारों ने अपने धार्मिक कार्यों के लिए जैन स्थानकों और जैन मंदिरों की स्थापना की थी। उस समय से आज तक यहां व्यापारी वर्ग स्थापित है, और जैन समाज के लिए यहां के धार्मिक स्थान अत्यंत श्रद्धा के केंद्र बने हुए हैं।

बिनौली गांव में कई बड़े और प्रमुख जैन आचार्यों के चातुर्मास व दिक्षाएं संपन्न हुई हैं।

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श्री दिगंबर जैन मंदिर  —  जलालपुर गांव

यह जैन मंदिर 550 वर्ष से भी अधिक प्राचीन और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

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श्री 1008 नेमिनाथ मंदिर  —  सरूरपुर कलां  गांव

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