__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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बागपत जनपद की धरती अपने गर्भ में न जाने कितने प्राचीन इतिहास के रहस्य दबाए हुए है। समय-समय पर यहां की धरती से बहुमूल्य प्राचीन ऐतिहासिक साक्ष्य सामने आते रहते हैं।

यमुना – हिंडन दोआब क्षेत्र के अंतर्गत इतिहासकारों ने लगभग दो दर्जन पुरास्थल खोज निकाले हैं। विश्व के इतिहासकारों ने अपनी निगाहें इस क्षेत्र पर लगा दी हैं।

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बरनावा – लाक्षागृह
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बरनावा के लाक्षागृह टीले पर प्रारंभिक सर्वेक्षण में महाभारत कालीन मिट्टी के बर्तनों के अवशेष मिले हैं। जिन्हें देखकर पता चलता है कि महाभारत काल में जो मिट्टी के बर्तन प्रयोग किए जाते थे। उन्हें इतने अधिक तापमान पर पकाया जाता था कि मिट्टी लाल रंग से बदलकर उन बर्तनों का रंग धूसर हो जाता था। उस समय के बर्तन बहुत अधिक पतले और मजबूत होते थे। उन बर्तनों के टकराने पर जो खनक की आवाज निकलती थी वह कांच जैसी प्रतीत होती है। बरनावा से प्राप्त चित्रित धूसर मृदभांड के अवशेष काफी अच्छी स्थिति में हैं।

बरनावा के प्राचीन टीले पर महाभारत काल के अवशेष तो मिलते ही हैं वहीं इस टीले पर मौर्य, कुषाण, गुप्त, सल्तनत और मुगल काल के भी अवशेष प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते रहते हैं। इन सब काल खंडों के अवशेष इस टीले पर मिलते रहने से यह कहा जा सकता है कि लगभग 4000 वर्षों से बरनावा के इस टीले पर लगातार मानव सभ्यता बस्ती और उड़ती रही।

इस टीले के ऊपर मुगल काल की स्थापत्य कला का एक अनूठा एवं कलात्मक उदाहरण एक प्राचीन इमारत के रूप में मौजूद है।
बागपत जनपद में मुगलकालीन इतनी कलात्मक मेहराब और गुंबद वाली एकमात्र यही इमारत है।

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रटोल गांव –

रटोल गांव को यहां के आम के बागों और आम की रटोल प्रजाति के कारण देश विदेश में जाना जाता है। लेकिन रटोल गांव की प्रसिद्धि का एक और कारण भी है। इतिहासकारों के द्वारा समय-समय पर इस धरती के पुरातात्विक सर्वेक्षण से जुटाए गए ऐतिहासिक तथ्यों से यह प्रमाणित होता है कि यहां महाभारत, कुषाण काल, गुप्त काल से लेकर प्रतिहार वंश के शासकों के द्वारा निर्मित कराया गया कोई अति भव्य भगवान विष्णु का मंदिर भी यहां था। जो समय के किसी कालखंड में धरती में समा गया।

बागपत जनपद के शहजाद राय शोध संस्थान के इतिहासकारों ने इस गांव का विस्तृत सर्वेक्षण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि रटोल गांव एक ऊंचे टीले पर बसा हुआ है और इस टीले के अंदर महाभारत कालीन पुरातत्व अवशेष होने के साथ-साथ एक अति भव्य विष्णु मंदिर के प्रमाण भी मौजूद हैं। इतिहासकारों की टीम को टीले के आसपास चारों ओर सर्वेक्षण के दौरान रटोल गांव की गलियों में जगह-जगह 9 वी शताब्दी के शिल्पकला युक्त गुलाबी बलुआ पत्थर के स्तंभ, मूर्तियां एवं अन्य पत्थरों के अवशेष बिखरे मिले।

जानकारी के अभाव में इन महत्वपूर्ण और अमूल्य प्राचीन धरोहर को गांव वाले नालियों को ढकने आदि में कर रहे हैं। उन्हें गांव के बीच-बीच में अनेक स्थानों पर ऐसे स्थान भी दृष्टिगोचर हुए। जहां से प्राचीन मंदिर के अवशेष धरती की ऊपरी सतह से बाहर जागते दिखाई देते हैं।

यह भी बताया जाता है कि 1950 के दशक में गांव में एक कुआं खोदते समय इसी भव्य मंदिर की लगभग डेढ़ दर्जन अमूल्य हिंदू देवी- देवताओं की प्रतिमाएं प्राप्त हुई थी। जो इस समय मथुरा संग्रहालय में है।

इसी गांव से सम्राट पृथ्वीराज चौहान के ही चौहान वंशीय शासक चाहडा राजदेव की रजत मुद्राएं और ताम्र लेख प्राप्त हो चुके हैं। जो इस गांव की स्थापना और इतिहास पर काफी कुछ प्रकाश डालते हैं। यह ताम्र लेख भी मथुरा संग्रहालय में संग्रहित है।

यहां के पुरानी ईदगाह स्थल के आसपास फैले टीले से महाभारत कालीन चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के अवशेष व कुषाण कालीन मृदभांडों के अवशेष तथा ईदगाह के पास की जमीन को समतल करते समय रटोल निवासी हाजी जाहिद को कुषाण वंश के शासक कनिष्क की ताम्र मुद्राएं मिली थी। इन दुर्लभ ताम्र मुद्राओं की जांच करके शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन ने बताया कि ये बेशकीमती तांबे के सिक्के कुषाण सभ्यता के हैं। दो हजार साल पूर्व कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल में इनका प्रयोग होता था। इन सिक्कों के एक ओर जहां कनिष्क स्वयं लंबा कोट पहन यज्ञ वेदी में आहुति डाल रहे हैं और दूसरी और यूनानी – भारतीय देवी-देवताओं के चित्र हैं। यह सिक्के दो संस्कृतियों के सुंदर मिलन के प्रतीक भी हैं।यह सब इस बात के प्रमाण हैं कि रटोल गांव कई हजार वर्षों से अस्तित्व में है।

प्रशासनिक उदासीनता से इस गांव में जगह-जगह बिखरे पुरावशेषों को नासमझ ग्रामीण अपने घरों में इस्तेमाल करके नष्ट कर रहे हैं

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चंदायन गांव –

चंद्रायण गांव में खेतों से ईंट भट्टों के लिए मिट्टी उठाने के दौरान किसी मजदूर का फावड़ा एक ऐसे नर कंकाल से टकराया जिसकी खोपड़ी पर तांबे का मुकुट सजा था। नर कंकाल की खोपड़ी पर मिला मुकुट तांबे के पतरे से बना है। जिस पर मूंगे जैसे रत्न की कीमती मणिकाएं जड़ी हैं। जो इससे पूर्व हड़प्पा सभ्यता से जुड़े अवशेष स्थलों पर मिली मणिकाओं से मेल खाती है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा बताया गया की मुकुट को देखने से लगता है कि नर कंकाल किसी तत्कालीन कबीले अथवा गांव के मुखिया का हो सकता है। उसी स्थान पर पक्की मिट्टी के कुछ बर्तन भी मिले लेकिन उनमें कुछ विशेष बात नहीं है। मुकुटधारी नरकंकाल मिलने के बाद ए एस आई ने हिंडन नदी के मैदानी इलाके के चंदायन गांव के उस स्थान को विभाग के संरक्षण में ले लिया गया। बाद में पुरातत्व विभाग द्वारा उसी स्थान पर खुदाई करवाई जाने पर इस बात के पर्याप्त प्रमाण सामने आए कि उस स्थान पर चार हजार साल पहले कोई गांव अथवा मनुष्यों की बसावट थी। जो समय के साथ जमीन में दब गई। इस स्थान पर एक जगह खुदाई में मिट्टी की बनी दीवार मिली है। जबकि दूसरी जगह पर एक मकान की तीन सतहें पाई गई हैं।

दुर्लभ पूरावशेष एक कंकाल और धातु निर्मित मुकुट भी प्राप्त हुआ था लेकिन मजदूरों की ना समझ के कारण सभी पूरावशेष क्षतिग्रस्त हो गए लेकिन इसके बावजूद भी चंदायन गांव सुर्खियों में आ गया।

चंदायन गांव से मिले सुसज्जित ताम्र निर्मित मुकुट माथा पट्टी के अवशेषों को देखकर शहजाद राय शोध संस्थान के इतिहासकारों ने इसे सिंधु सभ्यता के समकालीन होने की बात कही तो विश्व भर के पुरातत्व विधियों की दृष्टि बागपत जनपद की ओर मुड़ गई

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कुरड़ी गांव –

इस गांव में स्थित प्राचीन टीला अपने अंदर पुरातत्व महत्व के अवशेष दबाए हुए हैं। यहां पर सिंधु सभ्यता एवं कुषाण और गुप्त काल के प्रमाण मिल चुके हैं।

इतिहासकारों ने गांव के इस टीले पर खुदाई के कई प्रयास किए लेकिन गांव वालों के विरोध के कारण वे यहां पर पुरातत्व अवशेष प्राप्त करने के लिए खुदाई करने में असफल रहे। इस बारे में गांव वालों का तर्क यह होता है कि इस टीले के नष्ट होने से यमुना में आने वाली बाढ़ की चपेट में यह गांव आ जाएगा। इसलिए वे यहां पर आगे खुदाई करने के लिए मना करते हैं।

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बड़ागांव – (रावण गांव) –

बड़ा गांव के मनसा देवी मंदिर के टीले से इतिहासकारों को प्रारंभिक सर्वेक्षण में महाभारत कालीन चित्रित धूसर मृदभांड, गुप्त काल की बड़ी बड़ी इंटे, टूटे-फूटे बर्तन आदि मिल चुके हैं। मंशा देवी मंदिर के नीचे एक तहखाना बना हुआ है उसमें भी ऐतिहासिक महत्व के वस्तुएं मिलने की संभावना है। मंशा देवी मंदिर में ही आठवीं शताब्दी की भगवान विष्णु की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है।

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हरचंदपुर गांव –

इस गांव में तालाब की खुदाई के दौरान प्राचीन मृदभांड और इंटे मिली हैं। इतिहासकारों ने इन्हें कुषाण कालीन सभ्यता के अवशेष बताए हैं।

गांव में एक तालाब की खुदाई के समय अचानक बड़े-बड़े पत्थर निकलने लगे। तालाब से मिले प्राचीन पत्थर, मृदभांड और इंटे कुषाण कालीन सभ्यता के अवशेष है। इस स्थान पर खुदाई में मिली प_त्थरों की आकृति से यहां कोई बड़ा स्नानागार या कुषाण कालीन बस्ती का परकोटा होने की संभावना है। यह भी हो सकता है कि यहां पर उस समय कोई पानी का हौज रहा हो।

हरचंदपुर के तालाब की खुदाई में मिली पत्थरों की दीवार से निकले पत्थरों को देखकर इतिहास के जानकार भी चकरा गए। दीवार में पत्थरों की चिनाई चूने से की गई है। यह दीवार इसलिए अधिक रहस्यमय है। क्योंकि अभी तक उत्तर प्रदेश में किसी भी स्थान पर पत्थरों की दीवार नहीं मिली है। यह रहस्य इसलिए और भी अधिक हो जाता है। क्योंकि इस मैदानी इलाके में दूर-दूर तक कहीं भी पत्थर नहीं मिलते हैं। इसलिए यह संभावना जताई जा रही है की यह पत्थर यहां पर पहाड़ी इलाकों से लाए गए होंगे।

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बामनौली टीला – (खिंदौडा टीला)

बड़ौत बुढाना मार्ग पर स्थित बामनोली गांव का पूर्वी हिस्सा हिंडोला टीले का ही एक हिस्सा रहे परिक्षेत्र पर बसा है

जनपद बागपत ऐतिहासिक स्थल सर्वेक्षण समिति के सर्वेक्षण अभियान में सामने आए इस पुरातत्व स्थल की खासियत है कि यहां से महाभारत काल के चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति से लेकर मौर्य सोंग गुप्त कुषाण युग की मानव सभ्यताओं के प्राचीन अवशेष प्राप्त होते रहे हैं

काली नदी बामनोली स्थित खेरवाड़ा टीले से सटकर ही बह रही है जो की नदी घाटी सभ्यताओं का एक प्रबलता उदाहरण है लगभग सैकड़ों बीघा भूमि पर फैला छिंदवाड़ा टीला सरकारी कागजों में कसूरी टीले के नाम से दर्ज है

इस टीले के ऊपर प्रवेश करने के बाद दाहिने इससे के ऊपर कुछ ऐसे स्थान हैं जहां नदी घाटी सभ्यता के पुरातत्व अवशेष हैं टीले की ऊपरी सतह से ही महाभारत कालीन चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के मिट्टी के बर्तनों के अवशेष बहुतायत में मिलते हैं उन्हीं के साथ मौर्य युग कुषाण युग की सभ्यताओं के मानवों के द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली वस्तुओं के अवशेष जैसे मिट्टी के चूल्हे कच्चे कोयले के टुकड़े धातु गलन भट्टी के अवशेष निफ़्टी व कुछ अन्य पत्थरों के मन के यहां प्राप्त होते हैं कुषाण काल के टेराकोटा निर्मित बैल की मृण मूर्तियां बच्चों के खेलने के खिलौने सोंग काल के नारी शिल्प का सांचा मिलना भी इस स्थान पर समय-समय पर विभिन्न संस्कृतियों के नष्ट होने और दोबारा विकसित होने के उदाहरण हैं

महाभारत परिपथ समिति के सदस्य द्वारा बताया गया है कि यह टीला चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति का एक अनुपम उदाहरण है यहां से विश्व ने पहली बार बच्चों के खेलने का खिलौना प्राप्त हुआ जो महाभारत कालीन सभ्यता का पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत ही महत्वपूर्ण है शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन कहते हैं कि यहां की संस्कृति का सिलसिलेवार उत्खनन कराया जाना चाहिए जिससे पौराणिक संस्कृति को सामने लाया जा सके

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