__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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कष्टों को हरने वाली शीतला माता बबरे वाली मंदिर

मुजफ्फरनगर जनपद के मीरापुर कस्बे में महाभारतकालीन पौराणिक एवं प्रसिद्ध लक्ष्मी स्वरूपा शीतला माता का भव्य मंदिर स्थापित है। यह मंदिर मीरापुर से लगभग 3 किमी दूर मीरापुर-सिकंदरपुर मार्ग पर स्थित है।

अपने श्रद्धालु भक्तों के सभी दुखों एवं कष्टों को दूर करने वाली श्री शीतला माता बबरे वाली का मंदिर। इस मंदिर के दर्शन मात्र से ही दुखों एवं कष्टों का निवारण हो जाता है।

इस मंदिर को पांच पांडवों में से एक महान योद्धा अर्जुन के पुत्र बबरूवाहन ने घोर तपस्या कर शीतला माता के साक्षात दर्शन कर स्थापित किया था।

इस संबंध में पौराणिक वर्णन है जिसके अनुसार कहते हैं कि महाभारत काल में पांडवों में सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था। अश्वमेघ यज्ञ करने वाले ऋषि-मुनियों के भोजन एवं सुरक्षा का उत्तरदायित्व मणिपुर नरेश चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा और अर्जुन के पुत्र बबरूवाहन को सौंपा गया था।

इस कठिन दायित्व को पूरा करने के लिए बबरूवाहन ने शीतला माता के आशीर्वाद के लिए हस्तिनापुर क्षेत्र के घने वन में इसी स्थान पर पूजा एवं तपस्या की थी। बबरुवाहन की पूजा और तपस्या से प्रसन्न होकर माता शीतला ने स्वयं प्रकट होकर उसे साक्षात दर्शन दिए थे और उसे ऋषि-मुनियों के द्वारा अश्वमेघ यज्ञ को संपन्न कराने के लिए शक्ति प्रदान की थी।

बबरूवाहन ने अपनी तपस्थली पर माता शीतला का मंदिर स्थापित किया। उसी समय से इसे बबरे वाली माता का मंदिर कहा जाता है।

मुगल काल में मंदिर में शीतला माता की प्राचीन मूर्ति स्थापित थी कहते हैं उस समय वह मूर्ति स्वयं ही वहां बने कुए में प्रवेश कर गई थी। मंदिर परिसर में बने उस कुए का पानी परम पवित्र है। यह प्राचीन कूप बबरूवाहन द्वारा मंदिर स्थापना समय से ही है। इस कुएं के जल से माताएं अपने बच्चों को स्नान कराती हैं तथा पिलाती हैं। इस पानी को पीने व स्नान करने से शारीरिक बीमारियां व शीतला माता का प्रकोप स्वतः ही दूर हो जाता हैं।

शीतला माता के बारे में मान्यता है कि बच्चों को चेचक-खसरा निकलने पर माता को प्रसाद चढ़ाने पर बीमारी दूर हो जाती है।

इस क्षेत्र के वैवाहिक-बंधन में बंधने वाले नवयुगल शीतला माता के दर्शन करने के बाद ही गृहस्थ जीवन की शुरुआत करते हैं।

महाभारत कालीन यह प्राचीन मंदिर वर्तमान समय में पूर्ण रूप से आधुनिक बन गया है। मंदिर परिसर के मध्य में निर्मित प्राचीन मंदिर आज भी यथावत है। यहां शीतला माता बबरेवाली की भव्य एवं आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। देवी दुर्गा की नौ मूर्तियां भी शीतला माता मंदिर के चारों ओर सुंदर नक्काशी के साथ स्थापित हैं। भगवान शंकर का विशेष शिवलिंग भी यहां स्थापित है। मंदिर परिसर में सरस्वती मां, काली मां शनि देव, राधा कृष्ण, शाकुंभरी देवी, बाला सुंदरी देवी, ब्राह्मणी, गणेश जी, उजली, जसवंती देवी, भैरव जी महाराज, हनुमान जी, मां भगवती, साईं बाबा आदि देवी-देवताओं की प्रतिमाएं विराजमान हैं।

मंदिर का जीर्णोद्धार करा कर मंदिर के प्राचीन गुंबद पर दिल्ली व मुंबई के कारीगर द्वारा कांच की उत्कृष्ट चित्रकारी की गई है। भवन को आकर्षक बनाने के साथ 132 फुट ऊंचा शिखर बनाया गया है। स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ साथ इस क्षेत्र के अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के कई लोगों ने भी शीतला माता के दर्शन कर सहयोग प्रदान किया है।

प्रत्येक सोमवार को यहां सैकड़ों श्रद्धालु भक्त माता शीतला देवी के दर्शन एवं शिवलिंग के जलाभिषेक तथा प्रसाद चढ़ाने के लिए आते हैं।

प्रतिवर्ष होली के त्योहार के ठीक सात दिन बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को यहां माता शीतला बबरे वाली का विश्व विख्यात विशाल मेला लगता है। संपूर्ण भारत से सप्तमी एवं अष्टमी के दिन लाखों की संख्या में अपने परिवार एवं बच्चों की कुशलता की कामना लेकर श्रद्धालु माता के दर्शन करने एवं प्रसाद चढ़ाने के लिए आते हैं। इस अवसर पर दूरदराज के श्रद्धालु परिवार तथा रिश्तेदारों सहित पहुंचते हैं।

शीतला सप्तमी का प्रसाद चढ़ाने के लिए एक दिन पूर्व तैयार किया हुआ बासी प्रसाद मंदिर में चढ़ाया जाता है, इसलिए इस पर्व को बसौड़ा भी कहते हैं। पहले श्रद्धालु अपने घरों में पूजा स्थान पर हल्दी के पांच थापे लगाकर तथा घर में बने मीठे पूडों, पूरी-हलवा,चना मूंग-उड़द आदि की दाल, रोली, चावल, गेहूं आदि से शीतला माता की पूजा अर्चना करते हैं।

स्थानीय लोग अपने-अपने नन्हे-मुन्ने बच्चों का मुंडन भी इस मेले के दौरान कराते हैं।

मेले से पूर्व मीरापुर कस्बे से माता का झंडा जुलूस के रूप में निकालकर मंदिर परिसर में पहुंचाने के बाद उसका यहां ध्वजारोहण किया जाता है।

इस मेले में खेल-खिलौने, साज-सज्जा से लेकर घरेलू जीवन की सभी वस्तुओं के छोटे बड़े दुकानदार, सर्कस, मौत का कुआं, थिएटर, खेल-तमाशा, हिंडोला-झूले एवं मनोरंजन के अन्य साधन आकर्षण का केंद्र होते हैं।

मेले के अवसर पर विशाल जागरण एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह विख्यात मेला है इसमें आसपास के कई जनपदों की मिली-जुली संस्कृति का आकर्षक संगम देखने को मिलता है।

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