____________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १००किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

_________________________________________

सहारनपुर के बाड़ा लालदास की धरती का अति विशेष महत्व है क्योंकि यहां पर बाबा लाल दयाल जी ने १०० वर्ष तक तप किया था। बाबा लाल दयाल जी की वह तपस्थली आज भी सहारनपुर में श्री लाल दास जी का बाड़ा के नाम से विद्यमान है।

300 वर्ष की असाधारण आयु प्राप्त करने वाले परम संत योगीराज बाबा लाल दयाल जी महाराज गुरु नानक देव जी के मौसेरे भाई थे। आपका जन्म लाहौर (पाकिस्तान) के निकट कसूर नगरी में भोलामल पटवारी के घर संवत १४१२ वि. के माघ माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया के दिन हुआ था। आप की माता जी का नाम कृष्णा देवी था। ८ वर्ष की आयु में आपने वेदों सहित सब विद्याओं को प्राप्त कर लिया था और १० वर्ष की आयु में वैराग्य धारण कर घर बार को छोड़ दिया था।

एक बार बाबा लाहौर में रावी नदी के किनारे समाधि लगाए बैठे थे। इतने में साधुओं एक मंडली उधर आई और उनके प्रमुख संत चैतन्य स्वामी ने देखा कि कड़कती धूप में भी उस वृक्ष की छाया में कोई अंतर नहीं हुआ जबकि अन्य वृक्षों की छाया में परिवर्तन होकर वे अपने स्थान से दूर हो गई थी। निकट आने पर उन्होंने देखा कि बालक के सिर पर शेषनाग ने छाया कर रखी थी। इतने में बालक ने उठकर संत चैतन्य स्वामी को प्रणाम किया। पूर्व जन्मों के संस्कार के कारण दोनों का मिलन हुआ। बालक लाल संत चैतन्य स्वामी से दीक्षा लेकर उनके शिष्य बन गए।

इतने में ही एक शिष्य ने चैतन्य स्वामी से कहा कि सब को भूख लग रही है। इस पर चैतन्य स्वामी जी ने कुछ चावलों को लेकर मिट्टी के बर्तन में डाला और अपने पांवों का चूल्हा बनाकर योग अग्नि के द्वारा उन्हें पकाया। पल भर में चावल पकने के बाद सबने उनको खाया बाद में उस हांडी को फोड़ दिया। चैतन्य स्वामी ने चावल के ३ दाने बाबा लाल दयाल जी को भी खाने के लिए दिए। जिससे उनकी अंतर्दृष्टि खुल गई। लाल दयाल जी ने घर आकर माता पिता से स्वामी चैतन्य जी को अपना गुरु बनाने की अनुमति ली और उनकी मंडली में शामिल हो गए।

कुछ समय बाबा लाल दयाल जी को अपने साथ रखने के बाद चैतन्य स्वामी जी ने उन्हें स्वतंत्र रूप से भ्रमण करने की आज्ञा दे दी। बाबा लाल दयाल जी ने दूर-दूर के स्थानों की यात्रा करके धर्म प्रचार किया। आपके प्रति लोगों का श्रद्धा भाव इतना बढ़ा कि काबुल के बहुत से पठानों ने उन्हें अपना गुरु माना। सिंध में भी बहुत से मुसलमानों ने उन्हें अपना पीर मानकर वहां उनकी कब्र भी बना रखी है।

बाबा लाल दयाल महाराज अनेक तीर्थों की यात्रा करते हुए विक्रमी संवत १४५१ में लाहौर से हरिद्वार आते हुए गंगा यमुना के मध्यवर्ती स्थान सहारनपुर पहुंचे। यह स्थान उस समय साधु संतों की भूमि था ही इसलिए यह स्थान उन्हें इतना पसंद आया कि यहां आबादी से बाहर जंगल में आसन लगाकर बैठ गए। उन्होंने यहां अपना आश्रम बनाया और एक गुफा के अंदर बैठकर तप करने में लीन हो गए।

गंगा जी के प्रति आस्थावान होने के कारण बाबा लाल दयाल जी यहां से नित्य प्रति प्रातः काल के समय हरिद्वार गंगा जी स्नान के लिए जाया करते थे। लेकिन यहां के किसी व्यक्ति को इस बात का पता नहीं था। एक बार सहारनपुर के कुछ लोगों ने नित्य प्रातः काल बाबा लाल दयाल जी को हरिद्वार में गंगा स्नान करते हुए देखा जबकि बाबा लाल दयाल जी तब रात्रि के समय यही मौजूद रहते थे। यह बात सहारनपुर में तुरंत चर्चा का विषय बन गई की यहां से ५० मील दूर हरिद्वार जाना और फिर इतनी ही दूरी से वापस यहां लौटना इतने कम समय में कोई कैसे कर सकता है।

इस तरह लोगों ने बाबा का नित्य प्रति हरिद्वार गंगा स्नान को जाना उनका चमत्कार माना इसके बाद आश्रम में उनके दर्शनार्थ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई उनके आशीर्वाद से लोगों की मनोकामनाएं भी पूर्ण हुई

इसी बीच एक बार ऐसा हुआ कि बाबा जी को गंगा स्नान के लिए हरिद्वार पहुंचने में कुछ देर हो गई तब गंगा जी ने बाबा लाल दयाल जी को हरिद्वार में ही दर्शन देकर कहा कि आज अपना कमंडल यही छोड़ दो गंगा जी के कहने पर बाबा लाल दयाल जी ने अपना कमंडल वहीं छोड़ दिया। अगले दिन जब वे गंगा स्नान को हरिद्वार गए तो गंगा जी ने उसी कमंडल में गंगाजल भरकर बाबा जी को देकर कहा इसमें से कुछ जल कल प्रातकाल पूर्व दिशा की ओर छिड़क देना उसी जल से तुम्हें वहां एक कुंड मिलेगा और उस कुंड से एक पवित्र जल धारा बहेगी जो मेरे ही जल की धारा होगी सहारनपुर में बाबा लाल दास बाड़े के पास आज भी वे जलधारा बह रही है वही जलधारा आज पांवघोई नदी के नदी के रूप में नगर के बीच से बह रही है।

बाबा लाल दयाल जी की यश कीर्ति निरंतर बढ़ रही थी 100 वर्ष तक सहारनपुर में इसी स्थान पर तपस्या करने के बाद आप सीधे कलानौर जिला गुरदासपुर पंजाब मैं पधारे और किरण नदी के तट पर आश्रम की स्थापना की

बादशाह शाहजहां के बड़े पुत्र दारा शिकोह ने भी बाबा लाल दयाल जी की यश गाथा को सुनकर उनके दर्शन करने की आज्ञा प्राप्त करने के लिए करीम बख्श को बाबा के पास भेजा इस पर बाबा लाल दयाल जी ने लाहौर नगर में जाकर खान तहरीनी के बाग में प्रथम बार दारा को दर्शन दिए दोनों के बीच हुई इस पहली भेंट को दरबार की पहली मजलिस कहा जाता है इसी प्रकार नूर महल जोधन बाई का बाग दौलत खाना ख्वास का बाग आदि कुल मिलाकर 7 मजलिसें हुई इन मजलिसों के दौरान दारा शिकोह स्वयं बाबा लाल दयाल के चरणों में बैठते थे

इस तरह बाबा लाल दयाल ने दारा शिकोह को अपना शिष्य बना लिया

*****

संत बाबा लालदास बाड़ा में 8 एकड़ भूमि पर गुजरात के गांधीनगर व दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर के स्थापत्य शैली जैसा विशाल एवं भव्य शिव धाम मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *