बढ़ापुर कस्बा जनपद बिजनौर का एक रमणीय स्थल है यह जिला मुख्यालय से उत्तर दिशा में 45 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के जनपद पौड़ी गढ़वाल की सीमा पर बसा हुआ है

अपनी भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण यह एक रमणीय स्थल है। इस कस्बे के तीन दिशाओं में नदियां पूर्व में गूला नदी और पश्चिम में नकटा नदी है और दक्षिण दिशा में इन दोनों नदियों का संगम है। बढ़ापुर कस्बे के उत्तर दिशा में घने वनों व हिमालय पर्वत की प्रथम श्रेणी की श्रंखला तथा इन पर्वतों से निकलने वाले पानी के कई स्रोत हैं। बढ़ापुर कस्बे को खो नदी, नकटा नदी और ऊनी नदी का संगम स्थल भी कहा जाता है। यह कस्बा अनेक नदियों और वन क्षेत्र से गिरा हुआ है। जिससे इस कस्बे का जनपद के अन्य क्षेत्रों से संपर्क इन नदियों के ऊपर बनाए गए पुलों के द्वारा ही संभव है।

बढ़ापुर कस्बे की इसी विषम भौगोलिक स्थिति के कारण किसी समय इसे काला पानी भी कहा जाता था।

बढ़ापुर के प्राचीन इतिहास और इसकी महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस क्षेत्र पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए सैकड़ों वर्षों से राजपूतों और पर्वतीय जनजाति गौरवों के बीच लड़ाइयां होती रही। कभी बढ़ापुर और इस क्षेत्र पर राजपूतों का कब्जा हो जाता तो कभी गौरवों का, बाद के दिनों में गौरवों ने राजपूतों को
हराकर इस स्थान को अपने कब्जे में ले लिया। बाद में यह क्षेत्र तत्कालीन काशीपुर रियासत के अंतर्गत आ गया।

पुराने समय में इस स्थान को राजा महाराजाओं और जमींदारों के द्वारा एक शिकारगाह के रूप में प्रयोग किया जाता था। काशीपुर रियासत के शासक अधिकतर यही निवास करते थे। इसलिए उन्होंने यहां महल आदि का निर्माण कराया था। आज भी काशीपुर रियासत का महल टूटी- फूटी अवस्था में यहां के मोहल्ला ठाकुरान में मौजूद है और अपने पुराने इतिहास की गवाही दे रहा है।

प्राचीन घटनाओं की साक्षी अनेक ऐतिहासिक इमारतें आज भी खंडहर के रूप में बढ़ापुर कस्बे के मोहल्ला ठाकुरान और गडरियान आदि में देखी जा सकती हैं। इन जीर्ण- शीर्ण इमारतों को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह कसबा सैकड़ों वर्ष पुराना है।

बिजनौर जनपद का बड़ा क्षेत्र पुराने समय में घना वन क्षेत्र होने के कारण यहां वन्य प्राणियों की अधिकता थी। अठारहवीं शताब्दी में नवाब नजीबुद्दौला के आग्रह पर अफगानिस्तान से पांच पठान भाई यहां शिकार खेलने के लिए आए थे। जो वर्तमान समय के नजीबाबाद में नवाब के मेहमान रहे। बढ़ापुर उस समय एक प्रसिद्ध शिकारगाह होने के कारण उस समय के राजा के. सिंह बाबा ने पठान भाइयों को अपने यहां शिकार खेलने की दावत दी। काफी समय तक पांचो पठान भाई काशीपुर राजा के मेहमान रहे। इसी दौरान साहनपुर रियासत के राजा मूछपदारत ने बढ़ापुर को अपने नियंत्रण में लेने के लिए युद्ध की घोषणा कर दी। काशीपुर रियासत के मुकाबले साहनपुर रियासत की सेना अधिक शक्तिशाली थी।

दोनों रियासतों की सेनाओं का बढ़ापुर से 5 किलोमीटर पश्चिम में गांव इसलामगढ़, गढ़ी, गावड़ी के आस-पास में ही युद्ध हुआ। जिसमें पांचो अफगान पठान भाइयों ने राजा काशीपुर की तरफ से युद्ध किया और कुशल रणनीति व अच्छे निशानेबाज होने के कारण काशीपुर सेना की जीत में विशेष योगदान दिया। जिससे काशीपुर के राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें बढ़ापुर में ही रहने की दावत दी और बावन गांव की जमीदारी भेंट की। पांचो पठान भाइयों में से तीन भाई कुछ दिनों बाद अफगानिस्तान वापस चले गए और दो भाई यहीं पर ही रह गए।
______

बढ़ापुर इलाके में कालू शहीद की मजार – श्रद्धालु इस मजार पर मन्नत मांगने के लिए जाते हैं।

_______________________________________

पारसनाथ का किला
________________

बढ़ापुर से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित पूर्व दिशा में पारसनाथ किले के अवशेष इस कस्बे के ऐतिहासिक महत्व को बताते हैं। कुछ वर्षों पूर्व इस स्थान पर हुई खुदाई में प्राप्त पुरातन सामग्री के अध्ययन से निष्कर्ष निकाला गया था कि प्राचीन काल में यह स्थान जैन धर्म का प्रमुख केंद्र था। उस समय इस स्थान पर जैन तीर्थंकरों के अनेक मंदिर बने हुए थे। तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का मंदिर इन सब मंदिरों में प्रमुख माना जाता था। इसलिए इस स्थान का नाम पारसनाथ का किला पड़ गया था। यहां की गई खुदाई में भगवान महावीर स्वामी की 1000 वर्ष पुरानी प्रतिमा भी मिली थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *