_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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गंगा – यमुना के इस क्षेत्र में कई स्थानों पर गूग्गा की प्राचीन और ऐतिहासिक गुग्गा माढी स्थापित है। जहां गुग्गा की स्मृति में प्रतिवर्ष मेलों का आयोजन किया जाता है। जिनमें इस क्षेत्र के ही नहीं दूर-दूर के श्रद्धालु भक्त आकर बड़ी श्रद्धा से प्रसाद और निशान चढ़ाते हैं।

 

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मुजफ्फरनगर जनपद
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दूधली गांव –

(चरथावल से 15 किमी , बिरालसी से 8 किमी दूर)

आस्था और  श्रद्धा का  केंद्र दूधली गांव स्थित माढी की बहुत मान्यता है। बागड़ के बाद सबसे अधिक मान्यता इसी माढी की मानी जाती है। यहां की माढी बनाने में स्वयं गोगा जी ने भक्त के कहने  पर ५ इंटें प्रदान की थी।

हर साल भादो महीने की शुक्ल पक्ष की दोज तिथि को यहां स्थित जाहरवीर गोगा की माढी पर विशाल मेला सजता है। इस मेले में कई प्रांतों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने की कामना लिए ढोल -नगाड़ों के साथ पवित्र निशान , छड़ी और प्रसाद चढ़ाने और मत्था टेकने आते हैं।

कई सौ साल पहले  स्थापित हुई  जाहरवीर की इस माढी की इतनी मान्यता के विषय में बताया जाता है ।चरथावल कस्बे से १५ किमी दूर एक गांव बसा था – मरूवा। इस गांव के एक संपन्न राजपूत परिवार में जन्मे किसान ने बाबा मछंदर उनके शिष्य गोरखनाथ, माता बाछल और उनके पुत्र जाहरवीर के सेवा भाव से प्रेरित होकर  अपनी घोड़ी के नीला बछेरा पैदा होने पर उसे राजस्थान में जाहरवीर की भूमि गोगा माड़ी पर जाकर अर्पित करने का संकल्प लिया और राजस्थान के  गंगानगर जिले की गोगा जी की मुख्य माड़ी पर अर्पित करने जा पहुंचा। जाहरवीर ने अपने भक्त की कठिन परीक्षा लेते हुए उसे अपने विभिन्न स्वरूपों को नीला बछेरा चढ़ाने के लिए कहा लेकिन भक्त किसान द्वारा गोगाजी से स्वयं प्रकट होकर उसके संकल्प को पूरा करने की प्रार्थना की। भक्त किसान एक माह तक भूखा – प्यासा गोगाजी की तलाश में इधर-उधर अनेक स्थानों पर घूमता रहा ।भक्त किसान ददेरवां, नौलखाबाग, हनुमानगढ़, कजलीवन, गोरखटीला आदि  स्थानों पर भटकता रहा। तब उसे जाहरवीर गोगा जी ने दर्शन दिए और नीला बछेरा ग्रहण किया। गोगा जी ने अपने भक्त  किसान की तपस्या, त्याग और सच्ची भक्ति से अभिभूत होकर उसकी मनोकामना पूछी तब किसान ने अपने गांव मरूवा में माढी बनाने के लिए इंटे प्रदान करने के लिए कहा। जाहरवीर जी ने अपने भक्त किसान को माढी बनाने के लिए ५ इंटें प्रदान कर आगाह किया कि इन ईटों को उसी स्थान पर जमीन पर रखना जहां पर माढी बनाई जानी है। यदि रास्ते में इन ईटों को कहीं अन्य जगह रख दिया तो  माढी उसी स्थान पर बनानी पड़ेगी। लौटते समय उस किसान ने अपने गांव मरूवा से केवल एक किलोमीटर पहले दूधली गांव के चौपाल पर हुक्का गुडगुडाने की ललक में चादर में बंधी ईटों को वहीं  टेक दिया। इसके फलस्वरूप गोगाजी की माढी उसी स्थान पर बनानी पड़ी।

दूधली गांव की माढी स्वयं जाहरवीर जी द्वारा प्रदान की गई ईटों के ऊपर बनाई गई  है। इसलिए इस माढी पर श्रद्धालुओं की बहुत आस्था है। उत्तर प्रदेश सहित राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड आदि के लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र स्थल यह माढी है।

अंग्रेजों के शासनकाल की बात है। एक अंग्रेज  हुक्मरानराम के निर्देश पर सरकारी कारिंदे ने इस माढी पर आधिपत्य कर  यहां आने वाले चढ़ावे को देने का दबाव बनाया था। लेकिन उनकी तमाम कोशिशों के बाद भी माढी के दरवाजे नहीं खुल सके और उन्हें यहां के चढ़ावे का मोह  लालच त्यागना पड़ा। आज भी उक्त किसान के वंशजों को ही इस माढी का चढ़ावा प्रसाद मिलता है।

मेले के अवसर पर कई प्रांतों के दूर- दूर से बड़ी संख्या में  श्रद्धालु पहुंचकर निशान और प्रसाद चढ़ाते हैं । मेले के अवसर पर चरथावल से ही पवित्र निशान और ढोल ताशों के साथ लोगों का सैलाब दिन निकलने से पूर्व ही शुरू हो जाता है। गांव बिरालसी से जुगाड़, तांगे और अपने- अपने वाहनों के द्वारा श्रद्धालु माढी के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। गांव में २ किलोमीटर की परिधि में प्रसाद और खिलौनों की दुकानें सज जाती हैं।

श्रद्धा और आस्था से बंधे कई प्रांतों के श्रद्धालु मेले वाले दिन दूधली गांव आते हैं। दूधली गांव के हर घर में कई दिन पहले ही मेहमानों – अतिथियों के स्वागत के लिए उत्सव जैसी तैयारी शुरू हो जाती है।

तीन दिन के लिए आयोजित होने वाले मेले में निशान चढ़ाने की परंपरा पहले दिन ही संपन्न होती है। अन्य दिन श्रद्धालु माढी पर प्रसाद चढ़ाकर माथा टेकते हैं।

 

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चरथावल    –

चरथावल कस्बे में रोहाना मार्ग पर प्राचीन जाहरवीर की माढी स्थित है। यंहा हर वर्ष भादो माह की अनंत चतुर्दशी को भव्य मेला सजता है।

जाहरवीर के गुरु गोरख नाथ जी के वंशजों ने पास के ही शिवालय पर तपस्या की थी। इसलिए इस माढी का जाहरवीर के श्रद्धालुओं में बहुत महत्व है।

इस अवसर पर सुबह से ही ट्रैक्टर ट्रॉली में सवार बड़ी संख्या में श्रद्धालु विशाल छड़ी लेकर जाहरवीर की गौरव गाथा व छड़ी के गीत गाते हुए माढी पर पहुंचते हैं और छोटे-छोटे बच्चे हाथों में नीले निशान लिए सब का आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं पूरी होने पर माढी पर फल  निशान चढ़ाते हैं।

दूर-दूर से श्रद्धालु परिवार बैंड बाजों के साथ निशान चढ़ाने आते हैं। यह श्रद्धालु बताते हैं कि उन्होंने यहां जो मांगा था वह पाया है।

इस मेले के अवसर पर दंगल का आयोजन होने से यह मेला दूर-दूर तक विख्यात हो गया है।

एक माह से इस इलाके के विभिन्न स्थानों पर जाहरवीर के मेलो का सिलसिला यहां के चौदस के मेले के साथ संपन्न हो जाता है।

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मोरना   –

मोरना का प्रसिद्ध जाहरवीर गोगा म्हाडी का तीन दिवसीय मेला प्रति वर्ष सावन माह की शुक्ल पक्ष की दशमी, एकादशी व द्वादशी तिथि के दिन लगता है। जाहरवीर गोगा म्हाडी पर निशान चढ़ाने से हर प्रकार की मनोकामना पूरी होती है इसी मान्यता के आधार पर प्रत्येक धर्म से जुड़े अनुयाई मोरना स्थित म्हाडी में अपनी श्रद्धा रखते हैं। आसपास के जनपदों के अलावा उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा से अनुयाई प्रतिवर्ष म्हाडी पर निशान चढ़ा कर अपनी मनोकामना पूरी होने की कामना करते हैं। सवेरे से ही भारी संख्या में श्रद्धालु महिला, पुरुष और बच्चे लंबी कतारों में लग कर म्हाडी पर प्रसाद और निशान चढ़ाते हैं।

यहां आयोजित होने वाले मेले में विभिन्न प्रकार के झूले, सौंदर्य प्रसाधन व खेल खिलौनों की दुकानों सहित चाट – पकौड़ी व अन्य जलपान के दुकानों पर ग्रामीणों ने खाने- पीने का आनंद लिया व दुकानों पर जमकर खरीदारी की। इस अवसर पर ग्रामीण संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं को देखने का अवसर भी मिलता है।

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सहारनपुर जनपद
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गुघाल मेला – सहारनपुर –

सहारनपुर से 5 किमी. दूर स्थित सहारनपुर- गंगोह मार्ग पर मानकमऊ गांव में गुग्गावीर की माढी बनी हुई है।

इस माढी पर प्रतिवर्ष भादो शुक्ल दशमी को गुघाल का मेला आयोजित होता है। यह मेला एक सांस्कृतिक पर्व है। इस मेले की विशेषता है कि इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों ही संप्रदायों के श्रद्धालु लोग एक सी ही श्रद्धा और भक्ति के साथ गुग्गापीर की समाधि पर आते हैं।

गुघाल के मेले को छडियों का मेला भी कहा जाता है। इस जहारवीर गोगा जी की माढी स्थल की मान्यता सदियों पुरानी है। इस जिले से ही नहीं पड़ोसी जिलों व दूसरे राज्यों तक से हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस अवसर पर यहां आते हैं और म्हाडी पर पहुंचकर जहारवीर गोगाजी के स्थान पर उन का प्रतीक चिन्ह छोटी छड़ी व प्रसाद चढ़ाकर मनोकामना मांगते हैं। इस अवसर पर माढी स्थल जहारवीर गोगाजी के जयकारों से गूंज उठता है। माढी पर प्रसाद चढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी – लंबी कतारें लग जाती हैं। सभी श्रद्धालुओं को बाबा के प्रतीक चिन्ह नेजा व चौबीस छड़ियों का इंतजार रहता है।

दोपहर से छड़ियां अपने- अपने स्थानों से निकलक।र शाम के समय भैरव मंदिर पर पहुंचना शुरू हो जाती हैं। भैरव मंदिर में विधिवत पूजन के बाद गोगा वीर के प्रतीक नेजे के साथ सुंदर तरीके से सजाई गई छड़ियां ढोल – धमाकों व बैंड – बाजों के साथ विशाल जुलूस के रूप में माढी की ओर प्रस्थान करती हैं। वातावरण में जहारवीर के जयकारों की गूंज सुनाई देती है। श्रद्धालु भक्त नाचते गाते रंग – बिरंगी छडियों को लेकर चलते हैं और देर शाम तक सभी छडियां माढी पर इकट्ठी हो जाती हैं। जहां इनकी दौड़ मेले का मुख्य आकर्षण होती है। माढी स्थल बाबा के जयकारों से गूंज उठता है। विशाल जुलूस के रूप में मेला स्थल पर पहुंची यह छडियां अपने- अपने निर्धारित स्थान पर स्थापित हो जाती हैं। माडी स्थल का अनोखा दृश्य देखते ही बनता है कि जब गगनचुंबी यह छडियां दूर-दूर तक खड़ी दिखाई देती हैं और हवा में उनके रंगीन झंडे लहराते हैं।

गुग्गा के भक्त माढी पर लंबी – लंबी छडियां लेकर जाते हैं। इन छडियों में रंग- बिरंगे कपड़े और पंखा बंधा रहता है। सभी भक्त ढोल की थाप पर बाबा की जय-जयकार करते हुए माढी पर जाते हैं। जहां छडियां जिन्हें निशान भी कहा जाता है चढ़ाई जाती हैं। यहीं पर दोनों संप्रदायों के लोग दोनों हाथ पसार कर जाहरवीर गोगा जी से मन्नते मांगते हैं।

इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु प्रसाद चढ़ाते हैं। पूरी रात श्रद्धालु प्रसाद चढ़ाकर मनोकामनाएं मांगते हैं। उसके बाद बाबा जाहर वीर की कथाएं सुनते हैं।

 

 

 

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