_____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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यह गंगा यमुना और सरस्वती नदी की भूमि है -इन नदियों के तट पर भारतीय संस्कृति ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। यह विस्तृत भूभाग ऐतिहासिक अवशेषों से परिपूर्ण है। ऐतिहासिक धरोहरों के मामले में यह इलाका बहुत समृद्ध है। पुरातत्व विभाग ने इस क्षेत्र में जहां जहां खुदाई कराई है वहां वहां इतिहास की दुर्लभ धरोहरें प्राप्त हुई है। पाषाण काल से लेकर महाभारत काल एवं अन्य सभ्यताओं के अवशेष यहां खुदाई में हासिल हुए हैं। जिन पर इतिहासकारों ने तमाम तरह के शोध भी किए हैं।
खुदाई में प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि हमारे पूर्वजों का रहन सहन कैसा था। निर्माण के प्रति कितने ईमानदार थे। हजारों वर्ष पूर्व बनी ये वस्तुएं भले ही हमें टूटी फूटी या साबुत हालत में मिलती है लेकिन ये हमें यह बताती हैं की तत्कालीन समय में सभ्यता किस हद तक विकसित थी। भले ही ये धरोहरें क्षतिग्रस्त हो गई हो लेकिन इनका रंग रोगन और इन पर की गई नक्काशी इस बात का संकेत करती हैं कि उस समय के लोग कितने बड़े फनकार थे।

देशभर में महाभारत कालीन सभ्यता के अवशेष तीन बडे क्षेत्रों में मिलते रहे हैं। इनमें भी सबसे महत्वपूर्ण जहां कई प्रकार के चित्रित घूसर मृदभांड मिलने के कारण यमुना हिंडन का दोआब इस सभ्यता का की -जोन साबित हो रहा है।
यमुना और हिंडन नदियों के बीच का क्षेत्र महाभारत कालीन सभ्यता का की – जोन है।
इस क्षेत्र में अगर सही तरह से उत्खनन कराए जाने पर कई रहस्य उजागर होने की अपार संभावनाएं हैं। प्रारंभिक सर्वेक्षणों में ही इस क्षेत्र में खास तरह के मृदभांड मिले हैं, जो भारत में अन्य किसी भी क्षेत्र में मिले मृदभांडों के प्रकारों से अधिक है।

गंगा यमुना का दोआबा क्षेत्र अपने गर्भ में कई सभ्यताओं को समेटे हुए हैं। समय-समय पर इस क्षेत्र में खुदाई के दौरान मिले प्राचीन अवशेषों को देखने से यह पता चलता है कि यह क्षेत्र महाभारत कालीन, सिंधु घाटी व हड़प्पा कालीन सभ्यता के हजारों वर्ष के इतिहास को अपने अंदर दबाए हुए हैं। खुदाई के दौरान मिलने वाली प्राचीन अवशेष सिक्के बर्तन आदि इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यहां की सभ्यता और संस्कृति काफी उन्नत रही होगी और उस समय के लोगों को अंतरिक्ष, भूगोल, गणित आदि विषयों की अच्छी जानकारी रही होगी।

यहां के चप्पे-चप्पे पर प्राचीन संस्कृति सभ्यता व इतिहास के अवशेष बिखरे पड़े हैं।
पुरातत्व सामग्री के दृष्टिकोण से गंगा यमुना का ऊपरी दोआबा क्षेत्र काफी समृद्धशाली है। मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, सहारनपुर, गाजियाबाद, बुलंदशहर आदि जनपदों में अनेक स्थानों पर समय-समय पर प्राचीन संस्कृति के अवशेष खुदाई में मिलते रहे हैं।
यहां की ऐतिहासिकता को लेकर देश ही नहीं विदेशियों में भी हमेशा उत्सुकता बनी रहती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यहां की ऐतिहासिकता को देखते हुए प्राचीन स्थानों पर जब जब उत्खनन करवाया तो यहां की मिट्टी ने दुर्लभ इतिहास की निशानियां उजागर की, उनसे यह साबित हुआ की ५००० वर्ष पूर्व भी यहां की सभ्यता और संस्कृति कितनी विकसित थी।

समय-समय पर मिले प्राचीन अवशेष इस भू-भाग के पुरातात्विक सामग्री से समृद्ध होने की पुष्टि करते हैं।
क्षेत्र के अनेक टीलों पर प्राच्य संस्कृतियों की सामग्री उत्खनन
में मिल चुकी है।
इस क्षेत्र की महत्ता १९५१ -५२ में भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा कराये उत्खनन , गजेटियर व प्रामाणिक तथ्य
इसे क्षेत्र को वैदिक, उत्तर वैदिक, सिन्धु घाटी व हडप्पा के
समकालीन तथा सम्बद्ध स्पष्ट कर चुके है।

इतिहासविदों को अब कोई संदेह नहीं कि यह क्षेत्र सांस्कृतिक संपदा से भरा है।

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हस्तिनापुर से कुरुक्षेत्र तक सेनाएं किस रास्ते से पहुंची

इतिहासकार अब इस कवायद में जुटे हैं कि हस्तिनापुर से ओमकुरुक्षेत्र तक कौरव और पांडवों की सेना किस रास्ते से पहुंची थी।

चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के इतिहास विभाग द्वारा पता लगाने पर काम किया जा रहा है। सर्वेक्षण में यह बात साबित हो चुकी है कि यह इलाका प्राचीन काल से ही समृद्ध संस्कृति का केंद्र रहा है। क्षेत्र में मौजूद प्राचीन स्थलों
से प्राप्त संकेतों को जोड़ने की जरूरत है। इतिहासकार हस्तिनापुर से शामली और करनाल के बीच महाभारत कालीन और उनके अवशेषों से प्राप्त संकेतों का अध्ययन कर रहे हैं। यदि इस बारे में कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्षों की कड़िया जुड़ गई तो यह अपने आप में आश्चर्यजनक खोज होगी।

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सिनौली – (जिला बागपत)

5000 हजार साल पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले है जहा , वह सिनौली साईट यहीं है।

पुरातत्व के विद्वान बताते हैं कि सिनौली शक भाषा के सिन और औली को मिलाकर बना शब्द है जिसका अर्थ है जल स्रोतों के किनारे बसी बस्तियां। लेकिन अभी तक हुए पुरातात्विक उत्खनन में उस समय के शवाधान स्थल का ही पता चला है। इस शवाधान स्थल के मिलने से इस बात की संभावना लगभग पक्की है कि निश्चित रूप से सिनौली के ही कहीं आस-पास कोई हड़प्पा कालीन या महाभारत कालीन नगर या बस्ती कहीं धरती में छिपे है और उसे भी खोजने की जरूरत है। पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि उस समय के लोग मकान बनाकर रहते थे और वह मकान कहां रहे होंगे यह अगली खोज हो सकती है। सिनौली में वर्तमान में जहां खुदाई हुई है उसके 1 किलोमीटर के दायरे में उत्तर दिशा की ओर वह बस्ती हो सकती है। यदि वह नगर पुरातत्व उत्खनन में सामने आता है तो यह देश के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

गंगा के काठे में स्थित सिनौली गांव में लगभग 5000 वर्ष से भी पुराने महाभारत काल के पुरावशेष प्राप्त हुए है।

बागपत जनपद के सिनौली गांव में कई काल और समय की सभ्यताओं के राज दफन हैं। समय-समय पर हो रहे पुरातत्व उत्खनन में वह राज एक एक कर सामने आ जाते हैं।
इतिहास की दृष्टि से ये राज अब तक पढ़ाए जा रहे इतिहास को बदल देगें।
पुरातत्ववेत्ता सिंधु काल को ईसा से 3000 वर्ष पूर्व होना मानते हैं। लेकिन इस सिंधु काल से 2000 वर्ष बाद ताम्र युग का आना माना जाता है। स्कूल कॉलेजों में छात्रों को इतिहास की पुस्तकों में सिंधु काल के बाद ही ताम्र युग का आना पढ़ाया जाता है। लेकिन सिनौली में पुरातत्व उत्खनन में प्राप्त साक्ष्यों ने इस बात को गलत साबित कर दिया है। हमारे देश के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के पुरातत्व वेता कई दशकों से यह खोज कर रहे हैं कि सिंधु काल और ताम्र काल कहीं समकालीन तो नहीं, लेकिन पुरातत्व वेता प्रमाण नहीं होने के कारण एक राय नहीं बना पाते थे। लेकिन अब सिनौली में तांबे की बनी तलवार और तांबे के कड़े सिंधु सभ्यता के अवशेषों के साथ मिले हैं। दोनों सभ्यताओं के साक्ष्य एक साथ मिलने पर सिनौली की खुदाई और भी महत्वपूर्ण हो गई है। इस खोज से अब यह कहा जा सकता है कि सिंधु कालीन सभ्यता और ताम्र युगीन सभ्यता समकालीन है। सिनौली के इन प्रमाणों से इतिहास की पुस्तकों में बदलाव करना पड़ सकता है।

सन 2005 में यहां हुई पुरातत्व खुदाई में पहले ही दिन से पुरातत्ववेत्ताओं को महत्वपूर्ण पुरातत्व वस्तुएं मिलनी शुरू हो गई थी। उन्हें सिंधु कालीन मृदभांड और नर कंकाल के साथ महत्वपूर्ण पुरातत्व वस्तुएं प्राप्त हुई। नर कंकाल के हाथों की हड्डियों में तांबे के दो कड़े मिलने से पुरातत्ववेत्ताओं की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस समय उन्होंने संभावना व्यक्त की कि करीब 5 फुट लंबा यह नर कंकाल किसी किशोर का है। नर कंकाल के पास में ही कुछ दूरी पर मिट्टी में दबे चार मृदभांड भी मिले थे। जिन पुरातत्ववेत्ताओं के निरीक्षण में यह खुदाई की जा रही थी उन्होंने कंकाल के हाथों में तांबे के दो कड़े मिलना बहुत महत्वपूर्ण बताया था।
सिनौली में इस खुदाई से 1 साल पहले एक किसान के खेत से ग्रामीणों को खुदाई के दौरान बेहतरीन किस्म के मृदभांड आदि मिले थे।
इतिहास और पुरातत्व के विद्वान ताम्र युग को हड़प्पा सभ्यता से बाद में आना बताते हैं। लेकिन सिनौली में पहले हड़प्पा सभ्यता के साथ ही तांबे की तलवार मिली थी और अब तांबे के दो कड़े मिलना एक बहुत बड़ी खोज माना गया था।

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मांडी – ( जनपद – मुजफ्फरनगर )

गंगा यमुना के ऊपरी दोआबा के मध्य हिंडन व अन्य छोटी-छोटी नदियों के आसपास के क्षेत्र में ईसा से भी लगभग २००० वर्ष पहले की संस्कृति के अवशेष फैले हुए हैं जो भारतवर्ष की प्राचीनतम सभ्यता के समकक्ष है।

मांडी गांव वालों की खुदाई से मिट्टी की परतें तो अस्त व्यस्त हो गई। लेकिन यहां से प्राप्त स्वर्ण आभूषण नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय की हड़प्पा सभ्यता गैलरी के शोकेस में प्रदर्शित हैं जिनमें दो बड़े आकार के कड़े दो छोटे कडें तथा छल्लेदार बने तीन कंठ हार प्रदर्शित हैं।
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मुजफ्फरनगर जनपद के लगभग 25 गांवों में हड़प्पा संस्कृति के चिन्ह मिले हैं।

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इस्सोपुरटील – ( शामली – जनपद )

कैराना से 11 किलोमीटर दूर इस्सोपुरटील में पुरातत्वविदो को
लगभग ३२०० वर्ष पुराने हड़प्पा कालीन अवशेष मिले हैं। समझा जाता है कि यह कभी एक बड़ा नगर रहा होगा। शोध कार्य में लगे विशेषज्ञों के अनुसार यह नगर लगभग 5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला था। यमुना नदी के पूर्वी तट पर स्थिति नगर कुषाण, गुप्त व उत्तर गुप्त काल में बहुत विकसित रहा होगा। इस नगर के चारों ओर दूर-दूर तक कुएं मिले हैं। जिनका निर्माण बड़ी-बड़ी ईंटों और पत्थरों से किया गया है। माना जाता है इन कुओं का निर्माण दानवों ने किया होगा।
इस्सोपुर ईशपुर का अपभ्रंश मालूम पड़ता है।यहां निश्चय ही कोई ऐश्वर्यपूर्ण संपन्न सभ्यता रही होगी।

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कैराना कस्बे से उत्तरी दिशा में कठानाला के विस्तार में पुरातत्व विशेषज्ञों ने खोज की। एक बड़े भू भाग के फैलाव में तथा भूंडा में तीन सभ्यताओं के प्रमाण मिले। प्राचीनतम सामग्री में हड़प्पा कालीन टुकड़े, बोलियां, पासे तथा सिक्के आदि हैं।

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मेरठ। जनपद –

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हस्तिनापुर – ( जनपद – मेरठ )

महाभारतकालीन एवं चंद्रवंशियो की कर्मस्थली रही हस्तिनापुर नगरी ने अपने गर्भ में ऐतिहासिकता एवं संस्कृति की धरोहरों को संजोकर रखा और समय-समय पर विश्व को उससे अवगत कराया। जिनको देख और जानकर विश्व ने
आश्चर्य माना है।
हस्तिनापुर की ऐतिहासिकता को खोजने के लिए भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा सन 1950 -52 में प्रसिद्ध पुरातत्व परशास्त्री डॉ. ब्रजवासी लाल के नेतृत्व में यहां पांडवटीले के आसपास उत्खनन कराया गया था। इस उत्खनन में भारतीय संस्कृति की पांच उत्तरोत्तर सभ्यताओं का पता चला।

उस उत्खनन में यहां पीले भूरे बर्तन, सिक्के, मूर्तियां, बड़े आकार की चौड़ी चौड़ी दीवार तथा चौथी सदी के शुंग शक कुषाण काल के अवशेष भी मिले थे। जिनमें बोधिसत्व मैत्रेय की महिला की आभूषणों से लदी अनुपम मूर्ति मिली थी।
बलबन के समय का भी सिक्का यहां मिला। कई प्रकार के अस्त्र शस्त्रों के अवशेष भी यहां से मिले हैं।

इस पुरातत्व उत्खनन में में शामिल प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता
डॉ. ब्रजवासी लाल का कहना है कि मान्यताएं चाहे जो भी कुछ कहें, लेकिन पुरातात्विक प्रमाण यह है कि महाभारत का युद्ध ईसा पूर्व 9 वीं सदी में हुआ था। हस्तिनापुर में किए गए उत्खनन से यह प्रमाणित होता है की ईसा पूर्व 9 वी सदी से पूर्व मध्य काल तक यहां बस्ती रही है और अलग-अलग स्तरों से वहां इन सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।
इस उत्खनन में तांबे के औजार, लोहे के यंत्र उपकरण और हथियार मिले हैं। इसी तरह वहां अन्य पशुओं के अलावा घोड़े की मृण मूर्तियां भी मिली है, इससे यह भी सिद्ध होता है कि यहां सिंधु सभ्यता के बाद भी बस्ती आ रही है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में लौह उपकरण या घोड़े की मूर्तियां नहीं मिलती है।
हस्तिनापुर से चित्रित धूसर मृदभांडों के अतिरिक्त चौसर का
पासा व गोटे भी मिली है, इससे महाभारत काल में इस खेल की लोकप्रियता का पता चलता है।

यह नगरी ईसा पूर्व लगभग एक हजार से भी अधिक वर्ष पुरानी है। उन्हीं का यह भी निष्कर्ष था कि हस्तिनापुर चार बार बसा और उजड़ा है।

हस्तिनापुर प्राचीन समय में गंगा के किनारे बसा था। हस्तिनापुर के प्राचीन टीले यहां पर पुरातत्व उत्खनन कराया गया है। गंगा नदी अब इन टीलों से काफी दूर बहती है।
निरंतर बरसात और बाढों ने निश्चय ही इन टीलों की मिट्टी को बहाया होगा। उत्खनन में पांच काल की बसावट के अवशेष पाए गए हैं। बसावट के मध्य में जो अंतर है, वे उस काल के हैं जब यह स्थान वीरान पड़ा रहा।
पुरातत्व विभाग ने जिस टीले की खुदाई कराई वह लगभग 60 फुट ऊंचा टीला है उसी के साथ साथ कई और टीले हैं। सबसे बड़ा टीला विदुर का टीला कहलाता है। यहां के लोग इसे उल्टा खेड़ा भी कहते हैं। पुरातत्व विभाग ने इसी विदुर टीले पर उत्खनन कराया था। पुरातत्व विभाग द्वारा कराई गई खुदाई के दौरान नीचे कई दीवार मिली जिनमें कुछ ईटें 18 इंच लंबी है। ज्यादातर इंटें ऐसी हैं जैसी कि लाक्षागृह के खंडहरों में पाई गई है। पुरातत्व विभाग ने न जाने क्यों खुदाई को बीच मैं ही रोककर काम बंद कर दिया।
हस्तिनापुर क्षेत्र में खुदाई में महाभारत काल के खाने के बर्तन मिले हैं। खुदाई में तीन तश्तरियां मिली है। सुरमई व काले रंग के इन बर्तनों पर महाभारत काल के दौर में चलने वाली रेखाएं अब भी साफ नजर आती हैं। ये तश्तरियां टूटी हुई मिली है, इनके अधिकांश हिस्से मिल चुके हैं।

लेकिन यह स्पष्ट है कि यदि यहां और खुदाई की जाती है तो महत्वपूर्ण महाभारत कालीन धरोहर यहां से प्राप्त किया जा सकता है।
इसी टीले के बराबर में महाभारत कालीन पांडेश्वर महादेव मंदिर इसकी जीती जागती मिसाल है। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अंतर्गत आने वाली प्राचीन धरोहरों में से एक है।
पुरातत्व विभाग के सूत्रों के अनुसार महाभारतकालीन अवशेषों से लेकर मुगल कालीन संस्कृति तक के जो भग्नावशेष इस क्षेत्र से प्राप्त होते हैं इससे इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विकास की वैभवता व क्रमबद्धता का ज्ञान होता है।

प्राचीन हस्तिनापुर नगर के टीले की खुदाई और उसमें निकले अवशेषों से पता चलता है कि यह भूमि राजाओं का महाराजाओं का केंद्र रही है।
हस्तिनापुर में पुरातत्व विभाग को उत्खनन के दौरान कुषाण काल की मृण मूर्तियां मिली है। गुप्त काल के दौरान इन मृण मूर्तियों की पूजा की जाती थी। खुदाई में मिली मृण मूर्तियां
4 से 6 इंच लंबी है। यह तीनों मूर्तियां अलग-अलग रंगों से बनी हुई है और इनके कुछ हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।

पुरातत्व विभाग को यहां से ढाई हजार वर्ष पुराने दर्जनों खिलौने भी मिले हैं। यह सजाए जाने वाले खिलौने हैं। इन खिलौनों की नक्काशी इतनी महीन व साफ है कि ढाई हजार साल बाद भी इनकी आंखें व पलकें बिल्कुल साफ नजर आती है। खिलौनों की बनावट इस समय के कलाकार को भी मात देती नजर आती है।

पांडव टीले के समीप ही प्राचीन महाभारत काल का पांडेश्वर मंदिर, उससे मात्र कुछ ही दूर दक्षिण में विदुर कुटी, कर्ण मंदिर, द्रौपदी घाट, द्रौपदी की रसोई और बाराखंबा स्थान पर स्मारक हैं। मान्यता है कि यहीं पर पांडवों और कौरवों ने जुआ खेला था। मान्यता है कि इस इलाके में आभूषण और सोने चांदी के भंडार हैं। इस धारणा के कारण यहां पर लोग चोरी-छिपे कई बार खुदाई भी करते रहते हैं।

मध्य गंगा नहर की खुदाई के समय यही सन 1972 में भगवान महावीर की मूर्ति निकली थी।

यह
हस्तिनापुर नगरी के चारों और बसे इलाकों में खजानों के
दबे भंडार समय-समय पर अपना रूप दिखाते रहते हैं।
नगर के आसपास दबे पड़े खजाने का पता इस बात से चलता है कि 16 अप्रैल 1995 को ग्राम किशोरपुर के समीप तपेश्वरी मंदिर के पास पीली मिट्टी खोदते समय स्थानीय युवती को 15 किलोग्राम सोने के सिक्कों से भरा कलश मिला था। लेकिन लोगों की नियत खराब होने के कारण पुरातत्व महत्व की यह विरासत सुरक्षित नहीं रह पाई, इसमें से कुछ सिक्के ही सरकारी कोष में किए गए थे।
ऐसे ही सन 1998 में पांडव टीले के पास उल्टा खेड़ा पर काली मां की मूर्ति के सामने खुदाई में निकले तुगलक काल के चांदी के सिक्कों से भरा कलश मिला था। इसके भी अधिकतर सिक्के गायब कर दिए गए थे।
हस्तिनापुर के पास परीक्षितगढ़ में भी सन 1996 के आसपास राजा परीक्षित के प्राचीन किले के पास दीवार खोदते समय प्राचीन सोने के सिक्कों का भंडार मिला था लेकिन उसमें से भी अधिकांश हिस्सा बंदरबांट कर लिया गया था।
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परीक्षितगढ़ में महारानी के आभूषण तक मिले जिन्हें पुरातत्व विभाग ने अपने कब्जे में ले लिया था।

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हस्तिनापुर नगरी के कुछ हिस्सों को प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व अधिनियम के तहत पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया था। परंतु पुरातत्व विभाग इन आरक्षित स्थानों की देखभाल और सुरक्षा के लिए अधिक ध्यान नहीं देता। इससे हस्तिनापुर की प्राचीन ऐतिहासिक पहचान को समाप्त होने का खतरा रहता है। क्या

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बागपत – जनपद
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बडौत के आसपास के गांव में ऐसे बहुत से स्थल मौजूद हैं, जिनके अंदर युगो – युगों की सभ्यताएं दफन है।
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लाक्षागृह – (बरनावा -बागपत) -महाभारत कालीन लाक्षागृह
बरनावा पर उत्खनन में 2000 वर्ष से भी पुरानी वस्तुएं मिली है। प्राचीन मनके, आभूषण, मृदभांड के अवशेष आदि प्राचीन महत्व की वस्तुएं मिलने से यहां लगभग 4000 साल पुरानी मानव बस्ती और सभ्यता के संकेत हैं। वर्ष 1950 में हस्तिनापुर में जिस तरह के रिंग वैल उत्खनन में मिले थे वैसे ही रिंग वैल यहां भी मिले हैं। इससे हस्तिनापुर और बरनावा का एक ही काल माना जा रहा है। इससे यह भी जाहिर होता है कि यहां महाभारत कालीन सभ्यता रही है।

बड़का-गांव- बागपत जनपद के बड़का गांव में खुदाई के

दौरान ग्रामीणों को करीब 2000 वर्ष पुरानी गुल्लक और तांबे के सिक्के मिले थे। सिक्को का गहराई से अध्ययन करने के बाद पता चला कि ये सिक्के कुषाणकालीन है।

इतिहासकारों ने बताया कि बड़का गांव के टीले से मिट्टी की गुल्लक और 5 सिक्कों का मिलना यह दर्शाता है कि भारत में प्राचीन काल से लोगों में बचत करने की प्रवृत्ति
थी।

क्षेत्र से पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं तो मिलती रहती हैं लेकिन गुल्लक और उसमें रखे सिक्के पहली बार मिले हैं।

उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में कुषाण काल की वस्तुएं मिलती रहती हैं। इससे यह भी पता चलता है कि करीब 2000 साल पहले भी यह क्षेत्र अति समृद्ध था। यहां से नदियों के द्वारा व्यापार आदि भी होता था।
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चंदायन गांव – यहां सन 2015 में उत्खनन के दौरान
चित्रित घूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण, गुप्त और राजपूत सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं।

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पंचमुखी मंदिर – ( परशुराम खेड़ा _ बागपत )

मेरठ की ओर से बागपत की सीमा में प्रवेश करते ही हिंडन नदी का पुल पार करने के बाद दाहिने हाथ की ओर प्राचीन पंचमुखी महादेव मंदिर आता है।
दंत कथाओं के अनुसार यह क्षेत्र महर्षि वाल्मीकि की तप
स्थली रहा है। यहां पर उनका आश्रम था यहीं पर निष्कासन के बाद माता सीता ने निवास किया था और लव कुश को जन्म दिया था।
पौराणिक महत्त्व की घटनाओं का साक्षी रहे इस स्थान के आसपास खुदाई के दौरान अक्सर दुर्लभ मूर्तियां, प्रस्तर खंड तथा मृदभांड मिलते रहे हैं। जब भी किसी प्रयोजन से यहां थोड़ी भी गहराई पर खुदाई होती है तो अक्सर यहां पर पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं निकलती रहती हैं।
फसलों की बुवाई से पहले समतलीकरण का कार्य करते समय भी यहां अनेक दुर्लभ मूर्तियां प्राप्त हुई थी। किसी भवन के गेरूए बलुई पत्थर के प्रस्तर खंड, खंडित प्रतिमाएं आदि मिली है, जिनके चेहरे के हिस्से वाला भाग गायब होने के कारण उनकी पहचान करना मुश्किल है। इसके अलावा बड़ी बड़ी ईटें, मिट्टी के घोड़े के सिर, गणेश व सिंह पर सवार मां दुर्गा की प्रतिमा, मृदभांड, मिट्टी के बड़े घडे नुमा बर्तन आदि मिले हैं।

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मेरठ नगर – शास्त्री नगर में वर्तमान में जहां सरस्वती
शिशु मंदिर बना है उसके पृष्ठ भाग की चारदीवारी के ठीक नीचे मौर्य कुषाण कालीन कुआं विद्यमान है। यहां खुदाई में कटावदार ईंट मिली है। इस आकार की ईंटे पहले हस्तिनापुर में भी मिल चुकी है। कुए के समीप के क्षेत्र में प्रागैतिहासिक बस्ती के भी अवशेष मिले। जिनमें चित्रित टूटे घूसर मृदभांड वे अन्य मृद पात्रों के टुकड़े महत्वपूर्ण है। ऐसे टुकड़े मेरठ में कई स्थानों पर मिले हैं।

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सिरसलगढ ______ दुर्लभ एवं विशाल टीला

पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण

सिरसलगढ़ गांव में स्थित स्टेले में विशाल दुर्ग मौजूद है जिसकी झलक काफी दूर से ही नजर आ जाती है।
विभिन्न गढ़ी (छोटे दुर्ग) से घिरा सिरसलगढ़ पुरातात्विक दृष्टि से अनूठा और दुर्लभ साइट के रूप में जाना जाता है।
सिरसलगढ गांव की पश्चिमी सीमा पर मौजूद ऐतिहासिक टीलों की एक काफी बड़ी श्रंखला मौजूद है।

सिरसल गढ इतिहासकारों द्वारा यहां से लौह युगीन सभ्यता को भी खोज निकाला था। एक विशाल दुर्ग को अपने अंदर समेटे सिरसलगढ़ के प्राचीन टीले से लौह युग की लोहे को गलाने की भट्टियां, लोहे के शस्त्रों का जखीरा, सैकड़ों मनके आदि
सिरसलगढ़पुरावशेष प्राप्त हुए थे। लोहे के पिंड मिलने से इस बात की पुष्टि हो गई थी कि यहां पर वैदिक काल के दौरान प्रयोग की जाने वाली तलवारों को तैयार करने का काम किया जाता था।
सिरसलगढ के प्राचीन टीलों के भौगोलिक, पुरातात्विक एवं स्थापत्य आदि सभी दृष्टिओं से अध्ययन किए जाने के बाद यह बात सिद्ध हो चुकी है कि यहां प्राचीन समय में कोई बहुत बड़ा दुर्ग मौजूद था, भव्य दीवारों व इस दुर्ग में निवास करने वाली मानव सभ्यता के प्रमाण यहां पर बिखरे पड़े हैं।

पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह स्थान उपेक्षित पड़ा है।
इस टीले के बहुत बड़े भाग को लोगों के द्वारा काट कर खेतों में मिला लिया गया है।

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बामनौली के प्राचीन खिदौडा टीले से उत्खनन में कुषाण
सभ्यता के प्रमाण मिले है । यही उत्खनन में कुषाण कालीन हुआ मिला है जो अपनी प्राचीनता की कहानी स्वयं बयान करता है।

प्रशासन की अनदेखी से यह प्राचीन धरोहर नष्ट हो रही है।

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बागेश्वर मंदिर के निकट टीला

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रटोल में गुप्तकालीन प्रतिमाएं

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गांव – ककोर, अकबरपुर ठसका, जागौस, पुसार,

सिनौली, छपरोली, सिंघावली, टांडा, कुरडी,

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मेरठ परिक्षेत्र मेंहस्तिनापुर,आलमगीरपुर,सिनौली, बिनोली, पुरा महादेव, सिंघावली अहीर सहित कई स्थानों पर खुदाई में प्राचीन पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं मिली है।

ललसाना गांव ( मोदीपुरम )

मोदीपुरम से 8 किलोमीटर दूर ललसाना गांव में प्राचीन कालीन मूर्तियां मिली थी। ऐसा समझा जाता था कि ये सभी मूर्तियां गुप्त काल की रही होंगी। सभी मूर्तियां खंडित अवस्था में मिली थी।

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आलमगीरपुर – क्षेत्र में खुदाई के दौरान 2000 साल
पुराने मन के मिले हैं। ये मनके कई रंगों व
कई आकार के हैं। संभवत इन मनकों को उस समय माला के रूप में पहना जाता होगा। ये मनके अब भी अपने मूल स्वरूप में नजर आते हैं। ये मनके इतनी मजबूत धातु के बने हुए हैं जो गिरने से भी टूटते नहीं है।

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जलालपुर गांव – खरखौदा के पास जलालपुर गांव में
खुदाई में मुगलिया दौर की कुलियां मिली है।
जिन पर 800 साल पहले की हुई नक्काशी आज भी साफ समझ में आती है।

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चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से जुड़े विद्यालय में हुए शोध मे कहा गया है -शोध में यहां धरती के गर्भ से सोना निकालने के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। शोध के अनुसार हस्तिनापुर महाभारत काल में अर्थ और संस्कृति का वैभवशाली साम्राज्य था तब कौरव पांडव यही धन संपदा जमा करते थे। सिनौली और मुजफ्फरनगर के मंडी में खुदाई में सोने के साथ ही पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं निकल चुकी है।

सिनौली व मंडी की खुदाई में यह साबित हो चुका है कि यहां सोने के बड़े भंडार हैं। हस्तिनापुर में पुरातत्व विभाग ने 1950 में खुदाई की थी, इश्क खुदाई का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक महत्व की चीजों की खोज था। अगर यहां लंबवत खुदाई की जाए तो यहां अकूत धन संपदा मिल सकती है।

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प्राचीन काल में जंबूद्वीप सांस्कृतिक, आर्थिक दृष्टि से विश्व का बड़ा केंद्र था। मयदानव जो दुनिया का सबसे बड़ा वास्तुकार था यही से था। माया सभ्यता पूरी दुनिया में यहीं से गई। वैदिक काल से चंद्रवंश नल दमयंती और मय दानव तक सब के केंद्र में मेरठ ही रहा है। यहां संपदाएं मिलने की संभावनाएं है।

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गंगा यमुना के दोआब में आज भी दर्जनों टीले मौजूद है जिनमें इतिहास सोया पड़ा है __

पुरातात्विक महत्व के टीले _____

० हस्तिनापुर में विदुर का टीला, ० ईस्सोपुर का टीला

० ककौर का टीला , ० कुरडी का टीला

० बरनावा का टीला, ० आलमगीरपुर का टीला

० रन्छाड का टीला, ० अतराडा का टीला

० बागपत में यमुना नदी के बाएं तट पर स्थित टीले
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० हापुड़ क्षेत्र के गांव गोहरा आलमगीरपुर का टीला
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० यमुना नदी के किनारे टांडा, कुरडी, ककोर,जागोस,
अकबरपुर, ठसका आदि गांवों में हर 5 किलोमीटर बाद आज भी टीले मौजूद है। इन तीनों से समय-समय पर मिलने वाले पुरातत्व अवशेष का मिलना यहां की धरती के गर्भ में महाभारत कालीन संस्कृति समायी होने का संकेत देते हैं।

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शामली – जनपद

इस्सोपुर टील – महाभारत कालीन टीला

आनंदपुरा गांव (झिंझाना) कई सदी पुरानी ईंटे

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सहारनपुर- जनपद

महाभारत काल में कुरू जंगल के नाम से प्रसिद्ध इस जनपद में ऐतिहासिक संदर्भ स्थान – स्थान पर बिखरे पड़े हैं।

सहारनपुर जनपद का ऐतिहासिक कालक्रम प्रागैतिहासिक काल से, ईसा से भी तीन-चार हजार वर्ष पूर्व से शुरू होता है। सिंधु सभ्यता कालीन अवशेष सहारनपुर जनपद में अब तक तीस से भी अधिक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इन स्थानों में प्रमुख रूप से हुलास, बड़गांव, अंबेखेड़ी, बहादराबाद का टीला आदि स्थान प्रमुख है।
वैदिक कालीन समय में यह जनपद कुरु पांचाल का अंग रहा है।

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हुलास का प्राचीन टीला

सहारनपुर जनपद की नकुड तहसील के नानौता से 5 किमी पश्चिम में एक महत्वपूर्ण पुरा स्थल अलास का प्राचीन टीला
है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यहां पर कई वर्षों तक प्राचीन संस्कृति की खोज के लिए खुदाई कराई थी।
हुलास के प्राचीन टीले से हड़प्पा काल संस्कृति सहित इस स्थान से पांच सांस्कृतिक काल के अवशेष प्रकाश में आए थे।
इन पांच काल की संस्कृति में प्रथम काल में सेंधव सभ्यता का काल, दितीय काल में चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति का काल, तृतीय काल के उत्तरी काले ओपदार मिट्टी के बर्तनों वाला काल, चतुर्थ काल में शुंग – कुषाण युगीन काल के लाल मृदभांड संस्कृति का काल और अंतिम पांचवें काल में
गुप्त एवं मध्यकालीन समय के मृदभांड यहां से प्राप्त हुए हैं।
यहां हड़प्पा युगीन चित्रित मृदभांडों के साथ साथ कुछ अन्य मृदभांड भी मिले हैं। इस काल के मिले मृदभांड के ठीकरे पर मयूर की आकृति अंकित है।
हड़प्पा कालीन आवास पद्धति के अवशेष यहां मिले हैं। उस समय के आवास स्थलों के अवशेषों के रूप में मिले मकानों में अनाज रखने के स्थान भी मिले हैं।
हड़प्पा काल के कुछ मृदभांडों में धान की भूसी के चिहन मिले हैं। धान के अलावा उस समय के लोग गेहूं जौ उड़द मूंग और रागी का भी प्रयोग करते थे।
यहां से हड़प्पा कालीन पक्की मिट्टी की एक मुद्रा भी मिली है। इस मिट्टी की मुद्रा पर तीन अक्षरों का एक लेख अंकित है जो मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांस्य मुद्रा से मिलता जुलता है।
हड़प्पा काल के अतिरिक्त यहां और भी कई समय के अवशेष मिले हैं ।
मिट्टी के खूबसूरत बर्तनों के अवशेष मिले हैं जिन पर आकर्षक चित्रकारी की गई है।
कुषाण काल की कला के अनुपम धरोहर कुषाण काल की मानव आकृतियां मिली है।
कुषाण कालीन पकी हुई ईटों की दीवार मिली है।

मौर्यकालीन कछुए की हड्डियों से बनी कलाकृतियां मिली है।

इन सब के साथ हुलास के टीले से पुरातत्व महत्व की बहुत सी वस्तुएं प्राप्त हुई है। जिससे भिन्न-भिन्न कालों की बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हुई है।
हुलास से प्राप्त सेंधव सभ्यता के अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि उस समय कृषि करने का कार्य पर्याप्त उन्नत अवस्था में था। इसका प्रभाव आसपास के क्षेत्रों पर भी पडा
होगा। परवर्ती काल के लोगों ने धान को उत्पन्न करने की विधि शायद इन्हीं लोगों से सीखी होगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मिले हड़प्पा संस्कृति के यह अवशेष इस बात को प्रमाणित करते हैं कि इस संस्कृति के लोगों का संपर्क अफगानिस्तान एवं इंडो ईरान सीमा में विद्यमान उस समय की संस्कृतियों से था।

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सहारनपुर जनपद के सरसावा कस्बे के पास स्थित एक टीले से मिले चित्रित भूरे रंग के मृदभांड इस बात का संकेत देते हैं कि लगभग तीन हजार वर्ष पहले यह स्थान आबाद और समृद्ध था। एक विद्वान के अनुसार चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा वर्णित शुंग प्रदेश की राजधानी यही थी।

यह टीला लगभग साढे तीन सौ मीटर लंबा और ढाई सौ मीटर चौड़ा है। यहां सर्वेक्षण में जो अनेक प्रकार के मृदभांडों
के अवशेष मिले हैं, उनमें से अधिकतर चित्रित धूसर मृदभांड है जिन पर काले रंग की चित्रकारी की गई है। ऐसे ही मृदभांड महाभारतकालीन अनेकों स्थानों पर मिले हैं।
यहां मिली शुंग काल की मूर्ति तथा एक दूसरी मूर्ति चीन से आयात किए हुए चीनी मिट्टी के बर्तन के आधार पर भारत में बने मृदभांड आदि उल्लेखनीय है।

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हुलास – (नकुड) कुषाण काल की अनुपम धरोहर

सरसावा – प्रसिद्ध टीला।

गांव गुडम – (रामपुर मनिहारिन) प्राचीन मंदिर व मूर्तियों के अवशेष।

नयाबांस – (नकुड), अम्बखेड़ी – बड़गांव

देवबंद – खेत से मिले विशेष धातु के तीर

मल्हीपुर मार्ग स्थित ईट भट्टे से निकली पीली धातु की ईंटें

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सहारनपुर जनपद की रामपुर मनिहारान तहसील क्षेत्र में पड़ने वाले गांव सकतपुर में मिले अवशेषों को पुरातत्वविदों ने जांच के उपरांत ४ हजार वर्ष पुराना बताया था।
यह प्राचीन अवशेष यहां पर एक किसान के खेत में एक भट्टे के लिए मिट्टी खुदाई के समय मजदूरों को तांबे के ६ मृदभांड हस्त कुठार मिले थे।
इसके बाद पुरातत्व विभाग ने यहां पर प्राचीन अवशेष मिलने की संभावना से उत्खनन का कार्य शुरू कराया था। पुरातत्वविदो को यहां कई ट्रेंच मी उत्खनन के दौरान पक्की मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, खिलौनों की गाड़ी के पहिए के अवशेष, पशु आकृति, पत्थर के सिल, घोड़े की आकृति आदि मिली थी। जांच के उपरांत पुरातत्वविदो ने यहां ४ हजार वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में सभ्यता का होना बताया था। इस क्षेत्र में किस प्रकार की सभ्यता मौजूद थी यह पता लगाने के लिए यहां उत्खनन का कार्य कराया गया था।
उत्खनन में यहां बनाए गए कई ट्रेचोमें यहां उत्खनन स्थल से लगातार मिट्टी के बर्तनों के अवशेष मिलते रहे थे।
खुदाई से यह पता चला था कि इस स्थान पर प्राचीन सभ्यता का इतिहास छिपा है। यहां मिली वस्तुओं जांच के उपरांत यह मालूम हुआ है कि चार हजार वर्ष पूर्व भी मानव कारीगिरी, घुड़सवारी, रंगो के महत्व की जानकारी रखता था।
पुरातत्व विभाग ने जांच में यह भी पाया कि यहां मिले
6 तांबे के प्राचीन कालीन हस्त कुठार मृदभांड परंपरा संस्कृति से संबंधित हैं और जो 4 हजार वर्ष पुराने हैं।

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खुजनावर गांव –

चचा राव नदी के किनारे बसा खुजनावर गांव अपने गर्त में अभी भी इतिहास के कई महत्वपूर्ण किस्से छुपाए हुए हैं। यदि इस गांव के इतिहास को समझे तो कई ऐतिहासिक सत्य सामने आ सकते हैं। इस गांव ने बदलाव के कई दौर देखे हैं।
यहां प्राप्त सिक्कों और ईटों को आधार मानकर इतिहासकारों ने इस स्थान पर ढाई हजार वर्ष पहले बस्ती होना बताया है। यहां बह रही चचा राव नदी में खड़े होकर देखने से जो भौगोलिक परिदृश्य दिखाई देता है। उससे यहां के बारे में काफी कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। खुजनावर गांव काफी ऊंचाई पर स्थित है। बाहर की ओर से इस गांव के नीचे दबी हुई विशाल इंटो को देखा जा सकता है। इस स्थान के ऊपर के हिस्से में बसे हुए खुजनावर गांव में कई मकानों में लाखोरी ईंटों का प्रयोग किया गया है।

इस गांव में रहने वाले ग्रामीणों का कहना है कि खुदाई में अक्सर यहां पुराने मृदभांड और इंटे निकलती रहती हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि खुजनावर गांव पुराने समय में किसी उजड़ी हुई बस्ती के ऊपर बसा हुआ है। इस पुरानी बस्ती के उजड़ने का कारण कोई प्राकृतिक आपदा है या इसके उजड़ने का कारण इस पर हुआ कोई आक्रमण है। इसका विवरण अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है। लेकिन यह उजड़ी हुई बस्ती काफी लंबे समय तक खाली पड़ी रही होगी। बाद में फिर कभी यहां गांव बसा होगा। यहां पर समय-समय पर जो ईंट और सिक्के निकलते हैं उनका प्रयोग कनिष्क काल में होता था। इससे अनुमान लगाया जाता है कि यह पुरानी उजड़ी हुई बस्ती 2100 साल पहले बसी हुई थी।

खुजनावर गांव से प्राप्त सिक्के काफी लंबे समय तक जमीन के नीचे दबे रहने के कारण काफी अस्पष्ट हो चुके हैं। फिर भी इन सिक्कों को ध्यान से देखने पर एक तरफ एक योद्धा लंबा सा वस्त्र पहने और हाथ में धनुष लिए नजर आता है। तांबे के इतने वजन और बनावट वाले सिक्के कुषाण काल में प्रयोग के जाते थे।

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गाजियाबाद जनपद

बिसरख. प्राचीन ईटें,मिट्टी के बर्तन, आभूषण, सिक्के
आदि पुरातत्व प्रमाणों की बहुलता

बिसोखर. – (मोदीनगर ) 9 वी शताब्दी के प्रतिहार राजाओं के समय के वैष्णव मंदिर के अवशेष

___कैला भट्टा स्थित दूधेश्वर नाथ मंदिर

____हिंडन नदी के पुल के पास का टीला

____ लोनी का टीला मोड़

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चंदौसी – पुरातत्व संग्रहालय -कुषाण कालीन संग्रह

चंदौसी – बूमरैंग जैसे शस्त्र, ईसा से 4000 वर्ष पूर्व के

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मदारपुर – (ठाकुर द्वारा) तांबे की ३२ मानव आकृतियां

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इंदौर खेडा -(बुलंदशहर) बडा टीला

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गांव गोहरा आलमगीरपुर – जनपद हापुड़

हापुड़ क्षेत्र के गांव गोहरा आलमगीरपुर के बारे में गांव वाले बताते हैं कि यह किसी राजा का टीला है। मिट्टी के ४० फीट ऊंचे टीले से खुदाई में हस्तिनापुर शैली से जुड़े पुराने बर्तन मिले हैं। इतिहासकार एवं पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया की
यह टीला ५००० वर्ष पुराना और महाभारत कालीन है। इसके अतिरिक्त यहां से प्राप्त अन्य मृदभांडों से यह भी पता चलता है कि यहां विभिन्न कालों के लोग रहे हैं। महाभारत काल के साथ साथ यहां कुषाण, गुप्त तथा राजपूत काल के समय के मृदभांड भी मिलते हैं। गोहरा से प्राप्त होने वाले मृदभांडों में
वलय कूप सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इन वलय कूप का प्रयोग पानी तथा अनाज को संरक्षित करने में किया जाता था। इस प्रकार के वलय कूप महाभारत कालीन हस्तिनापुर से भी प्राप्त हुए थे।

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गांव शंकर टीला – ( गढ़मुक्तेश्वर -हापुड़ )

गंगा नदी के किनारे बसे गांव शंकर टीला से प्राचीन समय के ५५१ चांदी व तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
बताते हैं कि गंगा नदी के किनारे एक टीले पर एक साधु ने तपस्या की और ग्रामीणों को बताया था कि नाग पंचमी पर यहां खजाना निकलेगा। इसके कुछ दिन बाद साधु वहां से चला गया। तब से ही गांव वालों की नजर उस टीले पर थी। उस समय गंगा नदी गांव के उक्त टीले के समीप से होकर वह रही थी जिससे टीले में काफी कटान हो चुका था। कुछ युवक नाग पंचमी पर महक टीले पर निगाह लगाए हुए थे। गंगा के कटान से टीले का कुछ हिस्सा गंगा नदी में ढह गया। टीला ढहने से खजाने का कुछ हिस्सा गंगा में बह गया, लेकिन दो मटके कुछ युवकों के हाथ लग गए।
इस मामले की सूचना जब पुलिस को मिली। पुलिस ने ५५१ सिक्के बरामद किए थे।

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लोनी – टीला मोड़

साहित्यिक स्रोतों के आधार पर देखें तो मौर्य काल या इससे पूर्व गाजियाबाद के आसपास के क्षेत्र के प्राचीनतम ऐतिहासिक संकेत बौद्ध साहित्य में वर्णित कुरु जनपद के रूप में मिलता है। उस समय यह क्षेत्र कुरु जनपद का एक अंग था।
गुप्त काल एवं कुषाण काल में यह क्षेत्र सांस्कृतिक वैभव के चरम शिखर पर था। उस समय यहां की भौगोलिक स्थिति भी कुषाणकालीन संस्कृति के फलने फूलने के अनुकूल थी।

इसका प्रमाण गाजियाबाद लोनी मार्ग पर स्थित टीला मोड़ के पास तथा लोनी स्टील में रोमिला थापर द्वारा कराए गए उत्खनन में प्राप्त पुरातात्विक सामग्री से मिलता है। खुदाई में गुप्तकालीन और कुषाण कालीन वस्तुएं एवं प्रतिमाएं प्राप्त हुई है।

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ग्रेटर नोएडा   –      जनपद गौतमबुद्ध नगर

बिसरख   –    यहां आज भी थोड़ी सी खुदाई करने पर जगह-जगह शिवलिंग निकलते हैं।

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बिजनौर
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मोरध्वज का किला – नजीबाबाद-कोटद्वार मार्ग के बीच

मोरध्वज गांव से सटे मालन नदी क्षेत्र में भूमि की खुदाई के दौरान भगवान सूर्य देव की विशाल शिला ग्रामीणों को मिली थी। इस शिला को विधि विधान से यहां मंदिर परिसर में स्थापित करवा दिया गया था।

मंदिर परिसर में जमीन से निकलने वाली देव देवी प्रतिमाओं , शिलापट तथा किले के नक्काशी वाले अवशेषों को संग्रहित किया हुआ है।

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हरियाणा
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कुरुक्षेत्र –
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कुरुक्षेत्र में ब्रह्मसरोवर के निकट -प्राचीन बौद्ध स्तूप के अवशेष।
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कुरुक्षेत्र में सन 1984 में हजारों वर्ष पुराना समझा जाने वाला एक शिवलिंग यहां खुदाई के फल स्वरूप प्राप्त हुआ था। माना जाता है कि इस शिवलिंग का उल्लेख वामन पुराण और स्कंद पुराण में है।

स्थानेश्वर महादेव मंदिर के सामने बने पवित्र सरोवर में से खोदकर निकाला गया था। कहा जाता है कि यह वही मंदिर है जहां भगवान श्रीकृष्ण ने भगवान शिव की पूजा की थी।
वामन पुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा जी ने शिवलिंग की स्थापना की थी, लेकिन उस शिवलिंग का तेज बहुत प्रचंड था अतः ब्रह्मा जी ने कहा कि इसे धूली से ढक दिया जाए।
तत्पश्चात उसके ऊपर एक के ऊपर एक छह शिवलिंग और स्थापित किए गए और उन सबको धूल से ढक दिया गया।
सरोवर से जो शिवलिंग प्राप्त हुआ था, वह सबसे ऊपर का माना जाता है। यह शिवलिंग अन्य शिवलिंगों से इस बात में भिन्न है कि यह नीचे से चौखुंटा और ऊपर से गोल आकार का है।

करनाल –

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असांध – करनाल

असांध कस्बे में जरासंध के किले के नाम से विख्यात यह प्राचीन स्मारक वास्तव में कुषाण कालीन बौद्ध स्तूप है। जिसका निर्माण पहली अथवा दूसरी शताब्दी में हुआ होगा।
असांध कस्बे के निकट सलमान गांव में स्थित यह स्तूप 60 फुट ऊंचा और गोलाई लिए दीवारों से घिरा हुआ है।
पुरातत्वविदों के अनुसार इस स्मारक की गोल दीवारें इसकी ऊंचाई सिक्के और टेराकोटा शैली से बने बैल स्पष्ट कर देते हैं की यह कुषाण युगीन बौद्ध स्तूप है।

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चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है कि सम्राट अशोक ने प्राचीन हरिचंद वर्तमान में हरियाणा में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए सात स्तूपों का निर्माण कराया था।

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