_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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गंगा यमुना की यह भूमि सिख पंथ के सभी गुरुओ के श्री चरणों से पवित्र हुई है ।यहां की भूमि पर उन स्थनो पर उनकी स्मृति में गुरुद्वारे बने है।
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यह भूमि पंचप्यारो में से एक भाई धर्म सिंह जी की भूमि है।
हस्तिनापुर सैफपुर निवासी भाई धर्म सिंह जी पंज प्यारे बने और इस क्षेत्र का मान बढ़ाया।
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सिख तीर्थ स्थली – सैफपुर (हस्तिनापुर )

पंज प्यारे भाई धर्म सिंह जी के जन्म स्थान सैफपुर कर्मचंदपर स्थित गुरुद्वारा पूरी दुनिया में विख्यात है। इस गुरुद्वारे का अपना अलग ही महत्व है। इसके दर्शन करने के लिए देश विदेश से श्रद्धालु खींचे चले आते हैं। मान्यता है कि गुरुद्वारे में बने पवित्र सरोवर में स्नान करने से असाध्य रोगों में राहत मिलती है।

पंज प्यारे भाई धर्म सिंह जी की जन्मस्थली सैफपुर-कर्म चंदपुर में गुरुद्वारा और सरोवर की स्थापना के बाद हर माह में पढ़ने वाली अमावस्या को बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।

बैसाखी के पावन पर्व पर यहां ऐतिहासिक जोड़ मेले का आयोजन किया जाता है। भाई धर्म सिंह जी की जन्मस्थली पर आयोजित होने वाले इस मेले में देश विदेश से हजारों श्रद्धालु पवित्र सरोवर साहिब में स्नान कर गुरु ग्रंथ साहिब पर मत्था टेकते हैं।
इसके अलावा खालसा पंथ की सृजना आदि अवसरों पर भी धार्मिक मेलों का आयोजन किया जाता है। इन मेलों में हजारों श्रद्धालु पवित्र सरोवर में डुबकी लगाकर व गुरुद्वारा साहिब में मत्था टेककर धर्म लाभ उठाते हैं।

सन 1699 में दशम गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने हुक्मनामा जारी कर सभी सिखों को वैशाखी के अवसर पर वैशाख महीने की पहली तारीख (29 मार्च ) के दिन आनंदपुर साहिब पहुंचने का हुकुम दिया। हजारों की संख्या में सिख संगत आनंदपुर साहिब पहुंची।
सुबह गुरुवाणी के कीर्तन व शबद की क्या के उपरांत केशगढ़ साहिब में सजे इस दीवान में दशम गुरु विशाल शिष्य समुदाय के सामने हाथ में चमचमाती नंगी तलवार लिए एकाएक उठकर खड़े हो गए और गरजदार आवाज में आह्वान कर रहे थे उस बलिदानी वीर का जो तत्क्षण शीश कटवाने के लिए तैयार हो। उनके इस रूप को देखकर चारों ओर सन्नाटा छा गया। पुणः गरज कर बोले-मेरी तलवार उस एक शिष्य के खून की प्यासी है, जिसने धर्म पर बलिदान देना सीखा हो।
उपस्थित सारी संगत में कोई नहीं समझ सका कि भक्तवत्सल गुरु जी का उद्देश्य क्या था। इससे पहले गुरु जी का ऐसा रूप किसी ने नहीं देखा था।
बिजली की चमक सी तेज आवाज में गुरु जी ने तीसरी बार पुकारा -है कोई ऐसा वीर इस सभा में, जो अपना शीश हथेली पर रखकर चला आए और उसे धर्म के लिए कुर्बान कर दे।
इस पर कुछ हलचल हुई और लाहौर निवासी भाई दयाराम ने आगे बढ़कर अपना सिर झुकाते हुए अपने को शीश दान के लिए पेश कर दिया। गुरुजी उसे विशाल खेमे में ले गए और रक्त की एक पतली धारा भक्तों ने बाहर आती देखी।
उसी के पीछे पीछे हाथों में रक्तरंजित तलवार लिए गुरु जी बाहर आए तो उनका रौद्र रूप देख कर सब सिहर गए। परंतु उनकी दूसरी पुकार भी व्यर्थ नहीं गई। हस्तिनापुर के भाई धर्म सिंह जी अपना शीश भेंट करने के लिए गुरुजी के सम्मुख हाजिर हुए तो फिर वही दशा हुई।
तीन बार और यह है रक्तिम नाटक रचा गया और तीन और बलिदानी भावना वाले शूरवीर भाई मोहकम चंद, भाई हिम्मत राय, भाई साहिब चंद सामने आए और गुरु जी की परीक्षा में सफल हुए।
गुरु गोविंद सिंह जी ने नहला- धुला कर वस्त्राभूषणों से
सजा पांचों वीरों को सबके सामने खड़ा किया और -पंज प्यारे कहकर संबोधित किया।
इस प्रकार गुरु गोविंद सिंह जी ने पांच शीश के द्वारा खालसा पंथ की स्थापना की।

अमृतसर दरबार साहिब के मुख्य ग्रंथी व अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी पूर्ण सिंह ने 1998 में पंज प्यारे भाई धर्म सिंह जी के जन्म स्थान की खोज की। क्षेत्रवासियों के सहयोग से इस स्थान को विकसित करने के लिए 2 फरवरी 2000 को यहां कार सेवा वाले स्वर्गीय बाबा हरवंश सिंह और पंज
प्यारा भाई धर्म सिंह जी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष बाबा जोगिंदर सिंह समेत समस्त कमेटी की देखरेख में यहां भव्य गुरुद्वारा साहिब निर्माण किया गया।
2004 में 13 अप्रैल को वैशाखी वाले दिन हजारों श्रद्धालुओं के साथ निकाली गई कीर्तन यात्रा द्वारा अमृतसर स्वर्ण मंदिर सरोवर, छरहटा साहिब, गोविंद दयाल, तरनतारण
रामसर साहिब, दिल्ली व हरिद्वार से गंगा समेत कई धार्मिक स्थानों से जल लाकर यहां भव्य सरोवर साहिब की स्थापना की गई।

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इस क्षेत्र में यमुना नदी के पश्चिमी तट की ओर हरियाणा प्रदेश की भूमि का इतिहास सिख गुरुओं से जुड़ा है। इस भूमि पर वैसे तो अनेक गुरुद्वारा साहिब है, जहां रोजाना श्रद्धालु श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को नमन करते हैं, वहीं इस पवित्र भूमि पर सिख गुरुओं के कई ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब है, जहां पर सिखों के 10 गुरुओं के चरण कमल पड़े।

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कुरुक्षेत्र के गुरुद्वारे   –

कुरुक्षेत्र ही एक ऐसी भूमि है जहां पर सिखों के 8 गुरु साहिबान ने अपने चरण रखकर इस भूमि को पवित्र किया।

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पहली पातशाही श्री गुरु नानक देव जी

ब्रह्मसरोवर के बगल में स्थित ऐतिहासिक स्थान पहली पातशाही श्री गुरु नानक देव जी गुरुद्वारा सिद्धवटी –

यहां श्री गुरु नानक देव जी अपनी पहली उदासी के समय भाई मरदाना के साथ संवत १५५४ में वैशाख की अमावस्या के सूर्य ग्रहण के अवसर पर पधारे थे तथा ब्रह्मसरोवर के निकट डेरा लगाया था।
हिंदू धर्म में सूर्य ग्रहण के समय आग नहीं जलाई जाती, गुरु जी ने इस नियम का उल्लंघन करके गुरु का लंगर शुरू किया तथा राजा के बड़े युवराज द्वारा भेट किया हुआ मृग का मांस एक बड़े पतीले में बनवाया। वहां के बड़े ब्राह्मण पुजारी नानू पंडित ने सूर्य ग्रहण के दौरान आग जलाने और मांस पकाने को बहुत बड़ा अनर्थ बताया लेकिन जब गुरु
नानक देव जी ने पंगते लगवाकर मरदाना से लंगर बंटवारा तो वह मांस खीर का रूप धारण कर गया। गुरु जी ने मांस खाने या न खाने को मूर्खों की बहस सिद्ध किया तथा यहां मांस पर वाणी विचार लिखा-मास मास करके मूरख झगड़े, ज्ञान ध्यान नहीं जाने।

नानू पंडित यह कौतुक देख कर गुरु जी के चरणों में गिर पड़ा तथा गुरु जी को कलयुग का अवतार स्वीकार किया।

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तीसरी पातशाही श्री गुरु अमर दास जी

गुरु अमर दास जी 1523 में आषाढ़ की अमावस्या को पड़ने वाले सूर्य ग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र पहुंचे थे। बाबर के समय से यहां जजिया लगा हुआ था। जजिया एक तीर्थ कर था जो वहां आने वाली हिंदू तीर्थ यात्रियों को देना पड़ता था।
गुरु अमरदास जी ने नगर के बाहर डेरा लगाया और जजिया देने से मना कर दिया। जब यह खबर बादशाह अकबर को मिली और अकबर ने गुरुजी के पास अपने दरबार भेजें तब गुरु जी ने कहा कि -अकबर बादशाह से कहो कि तीर्थ स्थानों पर जजिया लेने से तुम सुख नहीं पाओगे।
जब अकबर के दरबारियों ने वापस जाकर अकबर को यह सारी बात बताई तो उसी समय बादशाह अकबर ने आदेश दिया कि -गुरु अमर दास जी, उनके सिखों या किसी भी अन्य तीर्थयात्री से जजिया न लिया जाए।
बादशाह अकबर के यह आदेश के बाद कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के मेले में आए हुए हजारों लोग गुरु जी के चरणो में गिर पड़े तथा गुरु जी का गुणगान करने लगे। पहली बार तीर्थ यात्रियों ने बिना जजिया दिए पर्व स्नान किया।

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चौथी पातशाही श्री गुरु रामदास जी भी कुरुक्षेत्र आए थे। उनकी स्मृति में गुरुद्वारा साहिब बना हुआ है।

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छठी पातशाही श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी

1630 ईस्वी मई के महीने में गुरु जी ने चंदू के नाक में नकेल डालकर और मुश्कें बांधकर लाहौर जाने से पहले कुरुक्षेत्र पहुंचे तथा एक टीबे पर सूरजकुंड के किनारे डेरा लगाया था। गुरु जी की स्मृति में गुरुद्वारा छठी पातशाही बना हुआ है।

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सातवीं पातशाही श्री गुरु अमर दास जी

यहां10 मार्च 1656 कोअमावस के दिन श्री गुरु अमरदासजी अपनी एक श्रद्धालु बढ़ई का अनुरोध स्वीकार करके यहां पहुंचे थे।

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आठवीं पातशाही श्री बाल गुरु हर कृष्ण साहब जी

बाल गुरु साहब गुरुद्वारा पंजोखडा साहब से चलकर यहां पहुंचे थे। यहां आकर आपने पिता हर राय जी के स्थान पर नमस्कार किया और अपने पठान श्रद्धालु के घर गए, जहां तीसरी पातशाही श्री गुरु अमरदास जी तथा सातवें गुरु हर राय जी ने चरण डाले थे। आपने यहां अपने पिताजी की स्मृति में एक महान भंडारा किया तथा 36 प्रकार के पकवान तैयार करा कर संगतों को पलकों में बिठा कर भोजन करवाया था।

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नौवी पातशाही श्री गुरु तेग बहादुर जी

गुरु तेग बहादुर जी १५ माघ,१७२७ संवत को परिवार और संगतो सहित पहुंचे थे। गुरु जी ने थानेश्वर महादेव मंदिर के किनारे पर अपना डेरा लगाया। गुरु जी ने यहां लोगों को सच बोलने और नेक काम करने का उपदेश दिया।

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दशम पातशाही श्री गुरु गोविंद सिंह जी

श्री गुरु गोविंद सिंह जी १६८८ -८९ में सूर्य ग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र में पधारे तथा राजघाट की पूर्व दिशा में डेरा लगाया। उस समय गुरु जी के साथ महल माता तथा साहबजादे थे।
यहां गुरु जी ने खीर और मालपुओं का लंगर आरंभ किया। पंगत में एक तांत्रिक योगी जिसने मंत्रों के द्वारा अपनी भूख बढ़ाई हुई थी ,वह भी बैठा हुआ था। पंगत में बैठकर वह असंख्य मालपुए और फिर खाए चला जा रहा था जिससे गुरु जी के नाम पर आंच आए। लेकिन जब गुरु जी ने अपने सेवकों को सतनाम कहकर उस तांत्रिक को खीर तथा मालपुए देने के लिए कहा तो वह तांत्रिक जोगी पहले ही ग्रास से तृप्त हो गया तथा गुरु जी के चरणों में गिर पड़ा।
गुरु जी ने दान करने के लिए एक गधी मंगवाई। ब्राह्मणों ने गधी लेने से इंकार कर दिया लेकिन एक युवा ब्राह्मण ने अपनी माता से आज्ञा लेकर यह दान स्वीकार कर लिया। वास्तव में वह गधी अनंत दूध देने वाली एक मूल्यवान गाय थी।

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गांव मांडी – (कुरुक्षेत्र)

बाबा श्री चंद जी महाराज, उदासीन ब्रह्मा अखाड़ा

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श्री गुरुद्वारा पंजोखडा साहब – अम्बाला

श्री बाल गुरु हर किशन सिंह जी जब यहां आए थे तो वहां के ब्राह्मणों के मन में यह शंका उठी की इतना छोटा बालक गुरु नहीं हो सकता। अतः उन्होंने गुरुजी से गीता के अर्थ बताने को कहा। बाल गुरु जी ने पंजोखडा के छज्जू अहीर, जोकि गूंगा और बहरा था, के सिर पर अपनी छड़ी रखकर उससे गीता की व्याख्या करवाई तो वहां खड़ी संगत तथा ब्राह्मण लोग बाल गुरु जी के चरणों में लौट गए और क्षमा याचना की।

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हरिद्वार __ कनखल

श्री गुरु अमर दास जी को तो हरिद्वार इतना अपनी और खींचता था कि गुरु गद्दी संभालने से पहले वह 20 वर्षों तक लगातार हर साल संघ के साथ यहां की यात्रा करते रहे थे।
श्री गुरु अमरदास जी ने अपनी हरिद्वार एवं कनखल की यात्रा की स्मृति ने कनखल में गंगा जी के तट पर सती घाट पर गुरुद्वारा तीसरी पातशाही का निर्माण किया।

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गुरु नानक देव जी अपनी पहली उदासी(संसार यात्रा)
के दौरान हरिद्वार आए थे। गुरु नानक देव जी ने हरिद्वार में कर्मकांडों और वहम – भ्रमों के पहले अंधेरे को दूर करने के लिए -ज्ञान का प्रकाश किया था।

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दिल्ली — गुरुद्वारा दमदमा साहब, बाला साहब,

मोती बाग, नानक प्याऊ, मजनू का टीला, श्री रकाबगंज,
अंगिठा साहब , शीशगंज साहब

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पांवटा साहिब

श्री गुरुद्वारा गुरु गोविंद सिंह जी, पांवटा साहिब

( देहरादून से ५० किमी , यमुनानगर से ५६ किमी )

यह गुरुद्वारा सिखों का पवित्र स्थल होने के साथ-साथ ऐतिहासिक तीर्थ स्थल भी है।
यमुना किनारे स्थित यह पवित्र स्थल इसके चारों ओर रमणीक पहाड़ इस स्थान की शोभा को और भी बढ़ाते हैं।
गुरुद्वारे के पास ही यमुना नदी के किनारे गोविंद घाट पर तीर्थयात्री बड़े ही श्रद्धा के साथ स्नान करते हैं।

होली के पर्व पर पांवटा साहिब का नजारा अलग ही होता है। होली के पर्व पर यहां गुरुद्वारे के पास खुले मैदान में मेले का आयोजन किया जाता है। मेले का शुभारंभ झांकी के साथ होता है जो गुरुद्वारे से शुरू होकर बद्रीपुर तक जाती है और फिर वहां से वापस गुरुद्वारे में आती है। झांकी के समय रास्ते में श्रद्धालु हलवा और चने का प्रसाद लोगों में बांटते है। होली के दिन लोग सुबह रंगो में सराबोर हो जाते हैं और शाम को मेले में घूमने का आनंद लेते हैं। होली के अवसर पर यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और तन मन धन से गुरु की सेवा करके अपने अंदर एक नई उमंग और ऊर्जा का अनुभव करते हैं।

जो श्रद्धालु तीर्थयात्री गुरु गोविंद सिंह जी के गुरुद्वारे के दर्शन करने के लिए आते हैं वह गुरुद्वारे से ठीक 5 किमी दूर बाबा भूरे शाह की ऐतिहासिक मजार पर नंगे पांव जाते हैं।
इस मजार पर हर बृहस्पतिवार के दिन भी भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

बाबा भूरे शाह की मजार व गुरुद्वारे के बीच यमुना नदी बहती है।
यमुना नदी यहां पर बिल्कुल शांत होकर बहती हैं। यहां यमुना के पानी के बहने तक की आवाज सुनाई नहीं पड़ती है।

इस गुरुद्वारे के पास ही गुरुद्वारा हरिमंदर साहिब वह स्थान है जहां श्री कलंगीधर दशमेश पिताजी ने सबसे पहले अपने घोड़े से उतर कर चरण दिए । इस गुरुद्वारे में ऊंचे ऊंचे सिहासन और पुरातन शस्त्र सुशोभित हैं।

यमुना नदी के किनारे कवि दरबार बना हुआ है। यहां पर
सतगुरु अपने ४२ कवियों के साथ बैठा कर अपनी वाणी रचा करते थे। दंतकथा प्रचलित है कि दसवें ग्रंथ व अन्य कई ग्रंथों की रचनाएं यहीं पर की गई है।
श्री दरबार साहिब एक खूबसूरत स्थान है। शाम के समय इसी स्थान पर सतगुरु जी बैठ कर पाठ किया करते थे।
इतिहास के अनुसार भंगाणी का युद्ध जीतने के बाद गुरु जी ने युद्ध में विजयी योद्धाओं को यहीं पर पुरस्कार दिए थे।
यहीं एक रोचक स्थान कलपी के ऋषि के नाम से जाना जाता है। इसी स्थान पर कालप के ऋषि को गुरु जी की आज्ञा के साथ सिख कालापी को पालकी में यहां लाया गया। इन्हीं की यादगार के लिए एक स्मारक गुरुद्वारे के अंदर बनी हुई है।

पांवटा साहिब से ठीक 16 किलोमीटर दूर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर भंगाणी का मैदान है। यह एक प्रसिद्ध स्थान होने के साथ-साथ एक तीर्थ स्थल भी है यहां पर भंगाणी साहब का गुरुद्वारा है। दूर-दूर से लोग यहां पर दर्शन करने के लिए आते हैं। इस मैदान के बारे में कहा जाता है कि यहां पर सिखों के सतगुरु ने एक भयंकर लड़ाई का सामना किया था।। जिसकी स्मृति में गुरुद्वारे का निर्माण किया गया है। जोकि भंगाणी साहिब गुरुद्वारे के नाम से जाना जाता है।
भंगाणी साहिब से ४१ किमी की दूरी पर वह स्थान है जहां सतगुरु ने अपने शस्त्र के द्वारा शेर का शिकार किया था। इस स्थान को शेरगढ़ के नाम से जाना जाता है।

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