सरधना

(मेरठ से 20 किलोमीटर दूर)

जहां बेगम समरू का प्रसिद्ध ‘सरधना का गिरजाघर ‘ व
चमत्कारी माँ मरियम की तस्वीर है

मेरठ जनपद के सरधना कस्बे में बेगम समरू द्वारा बनवाया गया चर्च तीर्थ स्थल ही नहीं बल्कि कलात्मक दृष्टि से भी बेजोड़ है। यह अपनी तरह का अकेला ऐसा चर्च है जिसे कृपाओं की माता मरियम को समर्पित किया गया है। माना जाता है कि इस चर्च में मौजूद माता मरियम की चमत्कारी तस्वीर लोगों के दुख दूर कर देती है।

श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक इस ऐतिहासिक चर्च में प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में देश विदेश से यहां पर कृपाओं की माता मरियम के दर्शन करने के लिए आते हैं। गिरजाघर में माता मरियम की चमत्कारी तस्वीर लगी हुई है। लोगों के अनुसार इसके सामने खड़े होकर सच्चे मन से कोई मुराद मांगी जाए तो वह जरूर पूरी होती है।
कहते हैं कि चर्च में मौजूद चमत्कारी तस्वीर ने ही बसिलिका
का खिताब दिलाया। इसी चमत्कारी तस्वीर के कारण यंहा इस चर्चे में विशेष प्रार्थना और मेले की परंपरा शुरू हुई।

बताया जाता है कि जिस दिन यह तस्वीर चर्च में स्थापित की गई उसी दिन एक महिला अपने बीमार बेटे को लेकर यहां आई जिसे डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। उसने अपने बीमार बेटे को इस चमत्कारी तस्वीर से छुआ कर दुआ मांगी तो उसका बेटा उसी समय ठीक हो गया। तब से यहां हर साल 7 नवंबर से मेले का आयोजन किया जाता है। मेले का समापन तीसरे दिन मुख्य प्रार्थना के बाद किया जाता है। इस आयोजन में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

यहां वे पूजा परिधान रखे हुए जो बेगम ने चर्च को भेट किए थे। वर्जिन मेरी की एक मूर्ति भी है, जिसे २३वें पोप
जॉन ने चर्च का सबसे खूबसूरत आभूषण कहा था। पोप ने 19 दिसंबर 1961 में इस चर्च को माइनर बसिलिका उपाधि दी। बसिलिका गिरजाघरों को दी जाने वाली एक उपाधि है, जोकि चुने हुए गिरजाघरों को दी जाती है।

कृपाओं की माता मरियम का प्रसिद्ध कलात्मक तीर्थ स्थान अपना विशेष ऐतिहासिक कलात्मक व आध्यात्मिक महत्व रखता है।

इटेेलियन और मुस्लिम निर्माण कला के बेहतरीन कंबीनेशन के रूप में मशहूर इस रोमन कैथोलिक गिरजाघर का निर्माण इटली के शिल्पकार एंथनी रेमालीन की कल्पनाओं के आधार पर हुआ है। शिल्प कला के उच्च कोटि के उदाहरण के रूप में बने गिरजाघर को अर्ध -वृत्ताकार रूप में रोम में बने सेंट पीटर के महा गिरजा घर के अनुरूप ही बनाया गया है। इस गिरजाघर के बनाने में सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है। पूजा बेदी अत्यंत आकर्षक
बनाई गई है। गिरजाघर की गुंबदाकार छ्तें और मेहतब अत्यंत दर्शनीय है।
काफी बड़े इलाके में फैली इस चर्च में प्रवेश करते ही किसी अलग दुनिया में पहुंचने का एहसास होता है। चारों ओर पहली हरियाली खुशनुमा माहौल का एहसास कराती है।

गिरजाघर के एक कक्ष में बेगम समरू की कब्र के रूप में बनाया गया स्मारक मूर्ति कलाकार बेजोड़ नमूना है। इसे बेगम समरू की मौत के बाद उसके दत्तक पुत्र डेविड ओक्ट्रोलोनी
डायरन सोम्बु ने बनवाया था। एक ही पत्थर से तराशा गया यह 18 फुट लंबा स्मारक है। इस स्मारक का निर्माण रोम के प्रसिद्ध मूर्तिकार टैडोलिनी ने रोम में ही किया था। वहां से इसे जल मार्ग द्वारा सरधना लाया गया था।
संगमरमर से बने इस स्मारक में ग्यारह आदमियों की बराबर मूर्तियां हैं और तीन हिस्से हैं जो नक्काशी से भरे पड़े हैं।
इन तीन हिस्सों के पास खड़ी 6 मूर्तियां अलग अलग चीजों के निशान हैं, जबकि ऊपर खड़ी पांच मूर्तियां उन लोगों की अमरता के गीत गाती हैं जो बेगम की मौत के समय उनसे संबंधित थे।

अपने कब्र के ऊपर खड़ी बेगम की मूर्ति अब भी ऐसी लगती है मानो अपने दरबार में लोगों के मुकदमों की सुनवाई कर रही है।

सबसे ऊपर स्वयं बेगम समरू सिहासन पर विराजमान है। उनके हाथ में बादशाह शाह आलम द्वारा जारी किया गया वह फरमान है जिसके द्वारा जुआना बेगम को सरधना की जागीर की बेगम नियुक्त किया गया था।

बेगम के इस दरबार में एक ओर उनके दत्तक पुत्र डेविड, सेनापति इनायतुल्ला, प्रधानमंत्री दीवान रायसिंह और सरधना के पहले बिशप जूलियस सीसर एसकोनी है। इस स्मारक के एक भाग में बेगम का यह दरबार है, दूसरे भाग में स्वयं बेगम युद्ध के मैदान की ओर अपनी सेना के साथ कूच कर रही है। इस स्मारक के तीसरे भाग में गिरजे के समर्पण समारोह का दृश्य है।

इसी स्मारक में जमीन पर लगी 6 मूर्तियां प्रतीकात्मक है। हाथ में सांप लिए घूंघट में एक औरत विराजमान है,जो बेगम समरू के कठोर अनुशासन एवं नारी सुलभ लज्जा का प्रतीक है। इसी स्मारक में बच्चे को दूध पिलाती मां, तथा भिखारी की ओर मुखातिब बेगम, बेगम समरू के विशाल हृदय, वात्सल्य और दया का प्रतीक है। इसी स्मारक में एक जगह शेर को दबाकर बैठी स्त्री बेगम के दृढ साहस का प्रतीक है।

बेगम समरू की दिल्ली दिली इच्छा थी कि अपनी तरह के एक अलग गिरजाघर का निर्माण करवाया जाए। बस इसी चाहत के चलते बेगम ने अपना तन, मन,धन लगाकर इस गिरजाघर का निर्माण करवाया।

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ताजपुर का चर्च    –

जनपद मुख्यालय बिजनौर से 40 किलोमीटर दूर

 

ताजपुर में कंडूला नदी दो किनारे संगमरमर से बने इस गिरजाघर का अपनी बनावट और सुंदरता के कारण पूरे एशिया में खास स्थान है।  हिंदू राजा द्वारा बनवाया गया यह गिरजाघर स्थाापत्य खूबसूरत नमूना है।

इस ऐतिहासिक गिरजाघर को ताजपुर के राजा श्याम सिंह रिख  ( राजा फ्रांसिस जेवियर) ने  अपनी इसाई पत्नी मारगरेट के लिए सन 1913 में बनवाया था।

ताजपुर कस्बे के उत्तरी भाग में 12 एकड़ भूमि में स्थित सेक्रेट हार्ट चर्च बना है। इसके आगे के हिस्से के दोनों ओर नोर्मन शैली की बड़ी मीनारें बनी है। गिरजाघर में प्रवेश करते ही सबसे पहले उंची वेदी आकर्षित करती है। इसका निर्माण फ्लोरेंस निवासी विश्व प्रसिद्ध मूर्तिकार जो जोस्पे और कमानी चिंती ने किया था। गिरजाघर के अंदर छतों पर सोने की परत चढ़ाई गई थी। चर्च की खिड़कियों से आने वाला प्रकाश अंदर की ओर सतरंगी छटा भी बिखेरता है। प्रभु ईसा मसीह की कलाकृति दिव्य है। अंदर की तरफ प्रभु यीशु के 12 शिष्यों की मूर्तियां हैं।प्रवेश द्वार से गिरजाघर तक मार्ग के दोनों ओर प्रभु ईसा मसीह की मूर्तियां लगी हैं और उन मूर्तियों के नीचे उनका जीवन वृतांत लिखा गया है। मार्ग के दोनो ओर फलों के बाग हैं। जो यहां प्रार्थना  करने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। क्रिसमस के अवसर पर यहां दूर-दूर से पर्यटक आते हैं।

 

बाहर की ओर प्रभु यीशु के जीवन को दर्शाती 35 मूर्तियां हैं।

इस गिरजाघर के अंदर बनी मीनारों में लगे तीन इटालियन घंटो की आवाज कई मील दूर तक सुनाई देती है।

 

 

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