___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत)के १००किमी के दायरे में गंगा- यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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मुस्लिम सूफी मत की कई सबसे प्रसिद्ध दरगाहें इस क्षेत्र में स्थित हैं।

यह माना जाता है कि अजमेर शरीफ के ख्वाजा मोइनुद्दी नौन चिश्ती जो मुसलमानों के प्रसिद्ध सूफी पीर हैं, के उर्स के अवसर पर भाग लेने वाले अकीदतमन्दों के लिए यह जरूरी होता है कि वे पहले हरिद्वार के पिरान कलियर , सहारनपुर
के अंबेहटा व गंगोह की पाक दरगाहों तथा दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में सलाम करें तभी अजमेर शरीफ जाएं।

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* कलियर शरीफ दरगाह –(रुड़की -हरिद्वार जनपद)

अजमेर शरीफ के बाद सबसे मुकद्दस और पाक दरगाह हजरत साबिर साहब की मानी जाती है। जो यहां रुड़की से 7 किलोमीटर दूर पुराने हरिद्वार रुड़की मार्ग ।।पर गंग नहर के किनारे पिरान कलियर में स्थित है।

अमीर खुसरो, हजरत निजामुद्दीन औलिया और अलाउद्दीन खिलजी से लेकर जनसाधारण तक जिनके चमत्कार, रहमत और जलाल से प्रभावित रहे। ऐसे सूफी संत सैयद अलाउद्दीन अली अहमद साबिर की पवित्र दरगाह।

विश्व प्रसिद्ध यह दरगाह शिवालिक की पर्वत मालाओं में घिरे गंग नहर के किनारे सौम्य प्राकृतिक वातावरण में स्थित है।

कलियर शरीफ वह पाक स्थान है जहां चार पीरों की दरगाह बताई जाती है। कहते हैं कि अगर एक पीर यहां और हो जाते तो इसका महत्व मक्का की तरह पवित्र हो जाता। यह चारों दरगाहें उन पीरों की है जो इस धरती पर खुदा का नूर बन कर उतरे थे।
पहली दरगाह हजरत इमाम साहब की है। जिसे बड़ी दरगाह कहा जाता है। इस दरगाह का गुंबद कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था।

दूसरी दरगाह हजरत साबिर साहब की है। इस दरगाह की मान्यता पूरे विश्व में विशेष रूप से अनुकरणीय हैं।

यहां पर स्थित तीसरी दरगाह इमाम के मामा हजरत किलकिली साहब की है, जो इंसानियत की रक्षा के लिए शहीद हुए थे।
चौथी दरगाह हजरत गायब पीर की है। इस दरगाह का पता उस समय चला था जब यहां नहर की खुदाई की जा रही थी।

साबिर के नाम से प्रसिद्ध इस सूफी संत के बारे में अनेक किंवदंतिया फैली है। जिनके अनुसार साबिर की माता ने अपने पति की मृत्यु के बाद अपने पुत्र साबिर को अपने भाई बाबा फरीद के पास यह कहते हुए छोड़ दिया कि वह उसे 12 साल बाद वापिस ले जाएगी।
बालक के मामा बाबा फरीद ने अपने भांजे साबिर को लंगर का इंतजाम और खाना बांटने की जिम्मेदारी सोंग दी। कहा जाता है कि साबिर निरंतर 12 वर्षों तक भूखे रहकर अपना फर्ज निभाते रहे। उन्होंने बारह साल तक अपने मामू के लंगर का प्रबंध किया। लेकिन उन्होंने मामा के लंगर में से खाना कभी नहीं खाया। जिससे ये सूख कर हड्डियों का ढांचा हो गए। उनके इस सब्र को देख कर बाबा फरीद ने अलाउद्दीन को साबिर के खिताब से सुशोभित किया। इसके बाद से ही उन्हें अली अहमद साबिर कहा जाने लगा। बाबा फरीद ने यहीं पर साबिर पाक को मुरीद बनाया और उन्हें शिक्षा दीक्षा देनी प्रारंभ की।

कहा जाता की साबिर की माता जब 12 वर्ष के बाद बाबा फरीद के पास आई और अपने बेटे साबिर के लाख मना करने के बाद भी बाबा फरीद की बेटी से उनका निकाह कर दिया। कहां जाता है कि निकाह के बाद रात को जब दुल्हन साबिर के सामने आई तो साबिर की नजरों से एक शोला भड़का और वह जलकर भस्म हो गई।

साबिर साहब ने अपनी इबादत के द्वारा जो शक्ति प्राप्त की उससे अनेक चमत्कार व करामाती हुई। इन चमत्कार और करामाती की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई।
उनके जलाल (गुस्से) का आलम यह था कि जिस पर भी हजरत साबिर नजर डाल देते वह भस्मा हो जाता था और यही हाल उनकी अपनी पत्नी का भी हुआ।

एक अन्य किवदंती के अनुसार बताया जाता है कि एक दिन साबिर अपने मुरीदों के साथ जुमे की नमाज अदा करने के लिए जामा मस्जिद गए तब वहां पर उल्मा जाहिर में नोकझोंक होने पर गुस्से में उन्होंने मस्जिद को ही सजदा करने का हुक्म दे दिया जिससे मस्जिद ही ढह गई और उनके विरोधी उसमें दबकर मर गए। साबिर को इतने पर भी संतोष न हुआ । उन्होंने तुरंत अपने मुरीदों से फरमाया कि जो उनके चाहने वाले है, वे तुरंत इस स्थान को १२ पहर के अंदर अंदर छोड़कर यहां से 12 कोस के फासले से बाहर चले जाएं। गुलजारी सहित केवल 6 लोगों ने कली और छोड़ा।
हजरत साबिर एक गूलर के पेड़ के नीचे आए और उन्होंने आंखें आसमान की ओर करके कुछ क्षणों के बाद जमीन पर कहर की नजर डाली। तुरंत उसी समय जमीन से जगह जगह पर शोले भड़कने लगे। चारों ओर आग लग गई। उस दायरे के अंदर की सभी जड़ चेतन पानी जलकर राख हो गए। केवल इस आग से गुलजारी का मकान सैयद इमामुद्दीन की मजार और उक्त गूलर का वृक्ष आग से बज गए।
हजरत साबिर साहब उसी गुलर की डाल को पकड़ कर खड़े होकर खुदा की इबादत करते रहे।

उनके इतना कहने के बाद कलियर छोड़ कर चले गए तब वहां ऐसी बीमारी फैली कि कलियर शरीफ वीरान हो गया।

बताया जाता है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया के प्रिय शिष्य अमीर खुसरो खुद चल कर कलियर शरीफ आए थे और उन्होंने अपना कलाम हजरत साबिर को सुनाया। जब अमीर खुसरो वापस दिल्ली निजामुद्दीन औलिया के पास आए और उन्होंने अपनी यात्रा के बारे में पूरा वृतांत हजरत निजामुद्दीन आलिया को सुनाएं तो उन्होंने अमीर खुसरो की आंख और हाथ चूम लिए, क्योंकि इन्हीं आंखों से खुसरो ने हजरत साबिर के दीदार किए थे और इन हाथों से उन्होंने हजरत साबिर से हाथ मिलाए थे।

हजरत साबिर के सुपुर्दगी ए खाक के लगभग 300 साल बाद हजरत ख्वाजा गंगोही ने यहां गुंबद को तामीर कराया और मस्जिद बनवाई थी। इसी के बाद से कलियर शरीफ पर लोगों का आना जाना शुरू हुआ था
गूलर के जिस पेड़ को साबिर 12 साल तक खुदा की याद में पकड़ कर खड़े रहे। उस स्थान पर अब संगमरमर का चबूतरा बनाया गया है। जायरीन इस चबूतरे पर आकर मोमबत्ती और अगरबत्ती रोशन करते हैं।

प्रत्येक साल पिरान कलियर में साबिर साहब का उर्स
इस्लामिक कैलेंडर के रबीउल अव्वल में पहली तारीख से चांद की 16 तारीख तक मनाया जाता है। उर्स पर देश विदेश से लाखों जायरीन खुशहाली और अपनी मन्नतो की पूरा होने के लिए यहां हाजिरी देने के लिए आते हैं और हजरत के सजदे में सिर झुका कर दुआएं और मनौतियां मांगते हैं। यहां आने वाले जायरीनो में सभी धर्म और मजहब के लोग होते हैं।

चांद की पहली तारीख को मेहंदी डोरी की रस्म के साथ उर्स शुरू हो जाता है। चांद की दसवीं , 11वीं और 12वीं तारीखों को उर्स के मुख्य आयोजन होते हैं। इन तारीखों पर ही मेला अपने पूरे शबाब पर होता है। हजरत साबिर साहब की दरगाह पर देश और विदेश के मशहूर कव्वाल यहां आकर अपने नजराना अकीदत के रूप में अपने फन के जौहर दिखा कर पेश करते हैं, और हुजूर साबिर साहब की रूहानी ताकत को अनुभव कर हाजिरी लगाने आए कव्वाल मस्ती के आलम में गा उठते हैं।

साबिर साहब के मजार शरीफ को गुस्ल शरीफ वाले दिन इत्र केवड़े आदि खुशबुओं से गुस्ल कराया जाता है। जायरीन गुसल के जल को बोतलों में भरकर आबे हयात समझकर सौगात के रूप में अपने साथ ले जाते हैं तथा अपने दोस्तों व रिश्तेदारों को बतौर तोहफा के देते हैं।

सूफी सज्जादो के द्वारा लगाए गए विभिन्न शिविरों में कव्वाली की गूंज से पूरे मेले का माहौल संगीत से सराबोर हो जाता है।

कलियर उर्स मेला एक ग्रामीण मेला है। दूरदराज से यहां लोग आते हैं। सदियां गुजर गई लेकिन इस मेले में कोई खास बदलाव नहीं हुए हैं। उर्स के मेले में सर्कस काला जादू नौटंकी आदि मनोरंजन के साधन आते हैं। उर्स में आने वाले हलवा पराठा का लुफ्त उठाते हैं। मेले में खासतौर पर बरेली के सुरमें लखनऊ के चिकन तथा मुरादाबादी बर्तनों की दुकानें भी खासतौर पर आती हैं। यह चीजें यहां आने वाले लोगों के लिए खास आकर्षण का केंद्र होती हैं। कलियर उर्स मेला चाहे जितना अव्यवस्थित हो लेकिन इसका एक अपना ही अलग लुफ्त है।

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* गंगोह शरीफ – ( सहारनपुर जनपद)

सहारनपुर जनपद का गंगोह कस्बा धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यहां स्थित कई सूफी दरगाहो से यह कस्बा अकीदतमंदो के बीच में गंगोह शरीफ के नाम से जाना जाता है।
गंगोह शरीफ को धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण स्थान दिलाने वाली हजरत कुतबुल आलम रहमत इलाही का अपना अलग ही रुतबा है। कहा जाता है कि गंगोह में सूफी संतों की इतनी तब्बूकूर्रात संग्रहित है, जितनी किसी अन्य स्थान पर आज भी उपलब्ध नहीं है।
दिल्ली का बादशाह इब्राहिम लोदी और मुगल बादशाह हुमायूं भी हजरत कुतबुल आलम के बहुत मुरीद थे और इस मुकद्दस मुकाम पर हाजिरी भरने आया करते थे। कुतबे आलम की पाक मजार भी बादशाह हुमायूं ने ही बनवाई थी। उस समय की उपलब्ध ऐतिहासिक पुस्तकों में इस बात के प्रमाण उपलब्ध हैं।
हजरत कुतबे आलम लगभग 5 शताब्दी पूर्व गंगोह शरीफ पधारे थे। हजरत कुतबे आलम का जन्म बाराबंकी जिले के रदोली स्थान पर हुआ था।
गंगोह शरीफ में वैसे तो साल भर श्रद्धालु आते रहते हैं लेकिन उर्स के अवसर पर इनकी संख्या बहुत अधिक हो जाती है। इस अवसर पर आने वाले हजारों जायरीनों में भी मुसलमानों से भी अधिक संख्या में हिंदू श्रद्धालु यहां आते हैं।

यह जायरीन उत्तर प्रदेश के भिन्न-भिन्न भागों के अलावा हरियाणा पंजाब हिमाचल प्रदेश दिल्ली व जम्मू कश्मीर आदि देश के दूर दूर के स्थानों से अपनी मुरादों को पूरा होने का विश्वास लेकर यहां आते हैं।

उर्स की शुरुआत तोसे(प्रसाद के रूप में हलवा बांटना) की महफिल से शुरू होता है।उर्स शुरू होने से पूर्व डि जुब्बे की रस्म पूरी की जाती है। जुब्बे के रूप में एक दस्तार एक पैराहान व तस्वी होती है, इनको एक श्रद्धालु एक बस की छत पर बैठकर यह जुब्बा निकालता है जो हजरत शेख की मजार तक आता है और यहां सलाम करके वापस चला जाता है।
जियारत में यहां सभी पीर पैगंबरों का सामान दिखाया जाता है, जिनमें विशेष रूप से ख्वाजा अजमेरी के जूते का टुकड़ा
बाबा फरीद हजरत शमस हजरत शाह, कबोरूल, औलिया दर्वेय, मोहम्मद बिन कासिम का पेराहान विशेष उल्लेखनीय है।

गंगोह शरीफ के और उर्स में शामिल होने वाले श्रद्धालु अपनी श्रद्धा का तोहफा मामू मौला बख्श की पार्क दरगाह पर भी अवश्य चढ़ाने जाते हैं।
मामू मौला बख्श की पाक दरगाह यहां स्थित अन्य दरगाहों के मुकाबले अच्छी हालत मैं नहीं है जबकि उनके मानने वालों की संख्या बहुत अधिक है। इस बारे में कहा जाता है की अपनी दरगाह की खूबसूरती मामू खुद ही नहीं चाहते हैं। उनकी दरगाह को खूबसूरत बनाने के हर प्रयास को वे नकार देते हैं। इसके विपरीत यहां हजरत शेख मोहम्मद सादिक व इनके मुरीद हजरत दाऊद की दरगाह बेहद खूबसूरत बनी हुई है।
बताया जाता है कि वर्तमान में इन दरगाहों की खूबसूरती के लिए जो भी कार्य कराया गया है उसमें से अधिकांश कार्य हिंदू श्रद्धालुओं द्वारा ही कराया गया है।

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* अमबेहटा – ( सहारनपुर जनपद)

पीरों की नगरी अम्बेहटा

जनपद सहारनपुर का कस्बा अम्बेहटा पीरों की नगरी के नाम से देशभर में प्रसिद्ध है।

यहां संसार भर में प्रसिद्ध सूफी संत हजरत शाह अब्दुल माली की पाक दरगाह है। इन्हें पीरजादा कहा जाता है। हजरत शाह अब्दुल माली के वंश बेल मैं अनेक अंकुर आज भी यहां रहते हैं जोया होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक व सामाजिक गतिविधियों में शामिल होकर उनके नाम में चारचांद लगाते है।
इसके अलावा और भी कई पाक दरगाह यहां पर है।

हजरत शाह अब्दुल माली के मजार कॉम प्रत्येक सप्ताह जुम्मे रात के दिन सूरज ढलने के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु मन्नतें मांगने यहां आते हैं। यहां होने वाली होने वाली महफिल ए कव्वाली की गूंज बरबस ही श्रोताओं को अपनी और आकर्षित कर लेती है। कव्वालियां सुनने के लिए लोग सभी भेदभाव भुलाकर यहां एकत्रित होते हैं।
इस दरगाह पर प्रतिवर्ष उर्स के अवसर पर एक विशाल मेला लगता है। देश विदेश में इसे हजरत शाह अब्दुल माली के – उर्स – ए – शरीफ -के नाम से जाना जाता है।उर्स
में भारी संख्या में हजरत शाह साहब को मानने वाले यहां आकर मन्नतें मांगते हैं। उर्स के आखरी दिन एक समापन समारोह में हजरत माली साहब के तस्बीह – वस्त्रादि प्रदर्शित किए जाते हैं। इस दिन मौ. खानकाह में तिल रखने की भी जगह नहीं होती, चारों ओर सिर ही सिर नजर आते हैं।

इस दरगाह के बारे में अनेक आश्चर्यजनक बातें भी कही जाती है जिन पर आम आदमी द्वारा सहज ही विश्वास करना
कठिन होता है।
दरगाह के अंदर तीन बहुमूल्य हस्तलिखित क़ुरान ए शरीफ़ रखे हैं, जिन्हें लगभग 250 वर्ष पूर्व शाह अबुल माली के पौत्र द्वारा लिखी गई थी। इन कुरानों के बारे में उठती है कि दरगाह बंद होने के बाद हजरत साहब व उनके शिष्य अपने पढ़ते हैं। यह भी कहा जाता है कि जब भी दरगाह के दरवाजे को बिना दस्तक दिए खोलकर अंदर जाया गया, तब ही कोई व्यक्ति अंदर कुरान उड़ता हुआ पाया गया, जो तुरंत ही पलक झपकते अदृश्य हो गया। यह भी बताया जाता है की दरगाह को बंद करते समय कुरान के जिस पन्ने को खुला छोड़ा गया अगले दिन वह पलटा हुआ मिला।

वास्तु कला की दृष्टि से भी इस दरगाह का भवन पूरे भारत में प्रसिद्ध है। हिंदुस्तान में किसी और दरगाह का भवन इस दरगाह के भवन जैसा नहीं है। इस दरगाह को बादशाह फिरोज शाह तुगलक के वजीर ए आलम नवाब रोशनउददौला
ने शाह के शिष्य हजरत मीरां जी द्वारा निर्मित कराया और 26 गांव इस दरगाह की संपत्ति घोषित की।
यह भी बताया जाता है कि सन 1950 में सरकार द्वारा जमीदारा उन्मूलन के बाद यह गांव दरगाह से अलग कर दिए गए लेकिन गांवों का लगान वसूल कर राज्य सरकार आज भी अनोटी के रूप में दरगाह को देती है।

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* सरसावा – ( सहारनपुर जनपद)

सहारनपुर जनपद के सरसावा कस्बे में स्थित
दरगाह जमालिया जहां रूहानियत का केंद्र है वही यह सहारनपुर जनपद का दर्शनीय स्थान भी है।
सरसावा की दरगाह जमालिया चार वालियों की स्थली कहलाती है।
सरसावा में अंबाला रोड पर एक विशाल मैदान में स्थित मखदूम पाक की दरगाह की खूबसूरती देखते ही बनती है।
दरगाह जमालिया तीन और से आम के बागों से गिरी हुई है।
यहां लहलहाती फसलें इस दरगाह की खूबसूरती में चार चांद लगाती है। पर
इस स्थान की प्राकृतिक सुंदरता व दरगाह का शांत वातावरण यहां आने वाले जायरीनों को भाव विभोर कर देता है। साथ ही उन्हें आत्मिक व मानसिक शांति भी प्रदान करता है।
मखदूम पाक की दरगाह का इतिहास लगभग 800 वर्ष पुराना है। हजरत मखदूम पाक ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी के शिष्य थे। वे अपने गुरु के कहने पर सरसावा आए थे।
प्रतिवर्ष चार दिवसीय उर्स ए जमालिया के अवसर पर अकीदतमंदो द्वारा द्वारा अजमेर शरीफ से लाई गई चादर चढ़ाई जाती है।
अजमेर से लाई गई चादर शरीफ के जुलूस में शामिल अखाड़े के युवकों द्वारा लाठी व तलवारबाजी के एक से एक हुनर दिखाए जाते हैं। चादर शरीफ का जुलूस कई जगह से होते हुए दरगाह ए जमालिया में संपन्न होता है।
जहां अकीदतमंदो द्वारा दुआएं मांगते हुए दरगाह में चादर चढ़ाई जाती है। चादर शरीफ के जुलूस में बाहर से आए हुए कव्वाल कव्वालियां पेश करते हैं। वही अखाड़े के लोग लाठी भालो तलवारों चक आदि प्राचीन हथियारों से युद्ध कला के बेहतरीन प्रदर्शन करके दिखाते हैं।

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*** पानीपत – (हरियाणा)

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* दरगाह कलंदर साहब

चिश्ती मत के एक प्रमुख सूफी संत हुए हैं कलंदर साहब। कलंदर साहब प्रसिद्ध सूफी संतों में एक थे। कलंदर साहब की दरगाह पानीपत में है। 700 साल से भी अधिक पुरानी इस दरगाह की बहुत मान्यता है। यह अजमेर शरीफ और हजरत निजामुद्दीन की तरह सम्मानित है। यहां बड़ी संख्या में लोग मन्नतें मांगने आते हैं।।१

कलंदर का अर्थ होता है मस्त यानी जो मोह माया को छोड़कर ईश्वर की याद में मस्त रहे।
कलंदर उन्हें कहा जाता है जो व्यक्ति असीम आनंद में इतनी गहराई तक डूब चुका है कि उसे अपनी दुनियाई दौलत और यहां तक की अपनी मौजूदगी के बारे में भी परवाह नहीं करता।

पानीपत स्थित कलंदर शाह दरगाह का बड़ा महत्व है। कहा जाता है कि इस स्तर की पूरी दुनिया में केवल ढाई दरगाह है। पहली पानीपत में कलंदर शाह की, दूसरी पाकिस्तान में और तीसरी इराक के बसरा में। चूंकि बसरा की दरगाह महिला सूफि की है, इसलिए उसका आधा दर्जा माना जाता है।
कलंदर शाह की दरगाह के पास ही मुबारक अली की मजार है। आज भी कलंदर शाह से पहले यहां आने वाले मुबारक अली की दरगाह पर चादर चढ़ाते हैं।

यहां श्रद्धालु अपने नाम का ताला जड़ तक मन्नतें मांगते हैं। और जब हिंदी मांगी गई मन्नत पूरी हो जाती है तो लोग अपने नाम का ताला खोल देते है।

कलंदर साहब का जन्म पानीपत में सन 1190 में हुआ था।
कहा जाता है कि कलंदर साहब ने जन्म के 3 दिन बाद तक आंखें नहीं खोली थी और न ही इन्होंने दूध पिया, इस दौरान वह केवल रोते ही रहे थे। इसी समय इनके घर मुबारकबाद देने आए एक दरवेश ने इनके कान में धीरे से एक आयत पढी और अल्लाह का नाम लिया तो अली शाह कलंदर ने रोना बंद किया और आंखें खोल कर उन्होंने दूध पीना शुरू कर दिया।

उन्होंने उन सब शिक्षा और कला में महारत हासिल की जो उस समय प्रचलित थी। उन्होंने अपने उस्ताद के पास चालीस साल तक तालीम ली और फिर दिल्ली में हजरत कुतुबुद्दीन ख्वाजा बख्तियार काकी दरगाह में हाजिर हुए। दिल्ली में बड़े-बड़े विद्वानों और सूफी दरवेशों ने उन्हें अपने से बड़ा माना।

कलंदर शाह उच्च कोटि के विद्वान और कवि भी थे। उनकी कुछ ही रचनाएं इस समय उपलब्ध है। कलंदर साहब ने हिंदी भाषा में काव्य की रचना की थी।
अमीर खुसरो की इनकी सेवा में हाजिरी देने इनके पास आते थे। शायराना तबीयत के कलंदर शाह और प्रसिद्ध गजल गायक अमीर खुसरो जब यह दोनों परस्पर मिलते होंगे तो संगीत की यादगार महफिल बन जाती होगी।

हजरत शाह कलंदर साहिब की दरगाह पर सालाना उर्स का आयोजन होता है। उर्स कव्वालियों के साथ शुरू होता है। उर्स
में कलंदर के मस्त दिवाने देश के कोने-कोने से आते है, कुछ तो नंगे पांव ही आते है।
उर्स के समय दरगाह की रौनक देखते ही बनती है। मस्त फकीरों के हाथों में बड़े-बड़े झाड़े बच्चों को बहुत अच्छे लगते हैं। उर्स के दौरान यहां होने वाली कव्वालियों को सुनने के लिए नगर के लोग उमड़ पड़ते हैं। रात को दरगाह की गुंबद पर भव्य रोशनी की जाती है जो हर किसी का मन मोह लेती है।

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*** बिजनौर जनपद

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* दरगाह – ए -आहिया जोगीरमपुरी

(बिजनौर के नजीबाबाद से 7 किमी दूर)

शिया समुदाय की विश्व प्रसिद्ध दरगाह दरगाह आहिया -ए – हिन्द है। शिया संप्रदाय की इस दरगाह को जिसे सैकडों वर्ष पूर्व हजरत अली के चाहने वाले सैयद राजू ने उनके आदेश पर निर्माण कराया था।
‘नजफे हिंद’ नाम से प्रसिद्ध इस दरगाह को शिया मुसलमान उतना ही पाक मानते हैं जितनी अरब में नजफ नामक स्थान पर हजरत अली की दरगाह है।
जोगीरमपुरी स्थित दरगाह ए आलिया पर हर साल मई के महीने में गेहूं की फसल कटने के बाद चार दिवसीय सालाना मजलिस लगती है। इस मजलिस के दौरान शिया धर्मगुरु तकरीर करते हैं। चार दिन तक होने वाली इस मजलिस के अवसर पर यहां की चहल-पहल के लिए यह स्थान केवल जिले या क्षेत्र में ही नहीं, दूर-दूर तक भी जाना जाता है। जायरीन विशेष रूप से यंहा जियारत करने आते हैं। लाखों लोग इन दिनों यहां आकर मन्नत मांगते हैं, मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। शिया मुसलमानों के साथ साथ अन्य धर्म और संप्रदायों के लोग भी यहां मन्नत मांगने के साथ साथ श्रद्धा सुमन चढ़ाने आते हैं।

इन दिनों हजारों लोग इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के दामाद हजरत मौला अली की दरगाह पर सजदा करते हैं और मन्नतें मांगते हैं। लगभग एक सप्ताह तक चलने वाले इस आयोजन में शिया मुसलमान यहां अकीदत के साथ कर्बला में हजरत इमाम हुसैन की शहादत को भी याद करते हैं। विभिन्न स्थानों से आए विद्वानों की तकरीरों से यहां का माहौल कभी कभी इतना मातमी और भावपूर्ण हो जाता है कि इसमें शिरकत करने वाले श्रद्धालु रो उठते हैं।

यहां भारत में शिवालिक पर्वतों की तलहटी में इनकी दरगाह होने के बारे में बताया जाता है कि वह अपने एक मुरीदके बार-बार याद करने और उस पर पड़ी मुसीबत को टालने के लिए अपनी मृत्यु के भी हजारों साल बाद इस स्थान पर प्रकट हुए थे तथा फिर अंतर्ध्यान हो गए थे। अंतर्ध्यान होने वाले स्थान पर ही वर्तमान समय में स्थित दरगाह को बनवाया गया था।

मुगल शासन काल की बात है। बादशाह शाहजहां के दरबार में कार्यरत एक दीवान सैयद अलाउद्दीन भी यही के थे। उनके बाद यही ओहदा उनके पुत्र सैयद राजू को मिला। अपने पिता की तरह सैयद राजू भी बादशाह शाहजहां के प्रति पूरी तरह वफादार थे। औरंगजेब के बार-बार अपने पिता शाहजहां के खिलाफ विद्रोह में सैयद राजू ने बादशाहा औरंगजेब का साथ देकर विद्रोह को दबाने में बढ़-चढ़कर उनका साथ दिया था। जिससे खुश होकर बादशाह शाहजहां ने सैयद राजू को वर्तमान जोगीरमपुरी का इलाका इनाम में दे दिया था।
औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को कैद में डालकर दिल्ली के तख्त पर कब्जा कर लिया था। औरंगजेब शाहजहां के वफादारों को चुन-चुन कर अपने रास्ते से हटा रहा था। औरंगजेब सैयद राजू को भी अपने रास्ते से हटाना चाहता था। सैयद राजू अपनी जान बचाने के लिए अपनी इस जागीर में आकर चोरी छिपे रहने लगे। अपनी जान पर खतरा जान कर वे दिन में जंगल में छुप जाते थे और रात में अपने घर में आकर सोते थे। सैयद राजू हर समय हजरत अली को याद कर उनसे मदद मांगते रहते।
कहा जाता है कि एक दिन अपने मुरीद सैयद राजू की पुकार सुनकर हजरत अली घोड़े पर सवार होकर अपने लश्कर के साथ जोगीरामपुरी में प्रकट हुए। बताते हैं कि उस समय एक ब्राह्मण रास्ते में घास काट रहा था। उसने घोड़ों के टापों की आवाज सुनी। उसने खतरे को भांप कर जल्दी से सैयद राजू को खतरे की जानकारी देना चाहता था लेकिन वह अपनी आंखों की कम रोशनी के कारण मजबूर था। घुड़सवार उसे पकड़कर ले जाने लगे। वह ब्राह्मण अपनी जान की भीख मांगते हुए लश्कर के सरदार के पास पहुंचा। उसे देखते ही घोड़े पर सवार हजरत मौला अली ने कहा कि डरो मत, सैयद राजू से कहना कि वह जिसको दिन रात याद करते रहते हैं वह मिलने आए हैं उसको यहां बुला ला। ब्राह्मण के द्वारा अपनी आंखों में रोशनी कम होने के कारण जल्दी आने में असमर्थता जताई, जिस पर हजरत मौला अली ने कहा कि अपनी आंखें बंद कर खोल कर देख। ब्राह्मण द्वारा ऐसा ही करने पर उसकी आंखों में पूरी तरह से रोशनी आ गई तथा उसने घोड़े पर सवार एक तेजस्वी नकाबपोश को देखा, जिन्होंने कहा कि यह जगह हमें भी पसंद है तथा यहां पर एक छोटा सा रोजा बनवा दें।
हजरत मौला अली का यह पैगाम जब ब्राह्मण ने सैयद राजू को सुनाया तो उन्हें यकीन नहीं आया लेकिन ब्राह्मण की आंखों की रोशनी वापस देख कर वे भी उनका दर्शन करने के लिए चल दिए। उनके मना करने पर भी बहुत से ग्रामीण उनके पीछे पीछे चल दिए। सैयद राजू के पीछे इतनी भीड़ को देखकर हजरत मौला अली अंतर्ध्यान हो गए थे, लेकिन वहां पर घोड़ों की खुरों के निशान थे तथा घोड़ों के मुंह से निकले झाग पड़े थे।
हजरत अली को न पाकर सैयद राजू खूब रोए और हजरत अली की निशानी को सुरक्षित कर लिया। सपने में आए हजरत अली के आदेश पर सैयद राजू ने उसी स्थान पर रोजे का निर्माण कराया। रोजे के निर्माण के दौरान पानी का संकट आने पर हजरत अली के आदेश पर ही रोजा वाले स्थान पर खड़े गूलर के पेड़ के पास खोदने पर पानी का चश्मा मिला। आज उसी स्थान पर एक कुआं है जिसका पानी कभी नहीं सूखता है।
सैयद राजू द्वारा बनवाया गया रोजा आज विश्व की प्रमुख शिया दरगाह के रूप में पहचान बनाए हुए हैं। दरगाह की देखरेख के लिए बनाई गई कमेटी ने जायरीनों के सहयोग से इस दरगाह को इराक स्थित नजफ की तर्ज पर विकसित कर आस्था और विश्वास का केंद्र बना दिया। हर साल गेहूं की फसल कटने के बाद चार दिवसीय मजलिसों में देश विदेश के लाखों जायरीन यहां आकर जियारत करते हैं और सियाग धर्मगुरु अपनी तकरीर करते हैं।

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*** शामली जनपद
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कैराना – (शामली जनपद)

छडियान मेला – कैराना में लगने वाला प्राचीन एवं प्रसिद्ध मेला छडियान जो हजरत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की याद में लगता है हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेर वालों ने सूफी मत का प्रचार करने के लिए जाते समय एक रात यहां विश्राम किया था और अपनी छड़ी यहां गाड़ी थी। उन्हीं की याद में उस मैदान का नाम छडियान मैदान हो गया।

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झिंझाना – ( शामली जनपद)

देशभर में सूफी संतों की दरगाहों में झिंझाना की हजरत शाह उल आलमीन रहमतुल्ला अलैह साहब की दरगाह का खास स्थान है। श्रद्धा से लोग इस दरगाह को मानते हैं।

शताब्दियों पहले इस स्थान पर राजा झिंझ का राज्य था उसी से इसका नाम झिंझाना पड़ा। झिंझ एक अत्याचारी राजा था। उसके जुल्मों सितम से हजरत शाह‌उल आलमीन रहमतुल्ला अलैह साहब ने ही निजात दिलाई थी।

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कैराना कस्बे में झिंझाना रोड पर बाले मियां की मजार जिसे नौ गजा पीर के नाम से भी जाना जाता है।

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प्राचीन मजारें

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जनपद- सहारनपुर

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नानौता –

यहां दादा मियां का प्राचीन मजार है। बताया जाता है कि इस मजार के ऊपर का गुंबद बादशाह सिकंदर लोदी ने दादा मियां के चमत्कार से प्रभावित होकर बनवाया था। इस मजार के बारे में एक और बात बताई जाती है कि यदि कोई पशु दूध नहीं देता है तो उसका स्वामी उस पशु सहित यहां मजार पर आकर मन्नत मांगे तो उसका पशु फिर से दूध देना शुरू कर देता है। हर जुम्मे रात को यहां स्थानीय एवं आसपास के इलाके के लोग बड़ी संख्या में जियारत करने आते हैं।

नानौता कस्बे में एक अन्य मजार हजरत मौलाना याकूब की दिल्ली रोड पर स्थित है। इसके साथ ही सूफी इलाही बख्श की मजार भी लोगों की आस्था का केंद्र है।

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*** मुजफ्फरनगर जनपद

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** सीकरी गांव (भोपा) –

* मौलाना हाफिज अब्दुल लतीफ साबरी की दरगाह

मुजफ्फरनगर जिला मुख्यालय से 27 किमी दूर मोरना पुरकाजी मार्ग पर सीकरी गांव में सूफी संत लतीफ साबरी की मजार स्थित है।

मौलाना अब्दुल लतीफ साबरी की मजार हजारों जायरीनों की अटूट श्रद्धा व आस्था का केंद्र बनी हुई है। माना जाता है कि यहां पर खाने वाले श्रद्धालु की मन्नतें जरूर पूरी होती हैं।

सीकरी के शेख परिवार में जन्मे सूफी संत लतीफ बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। उनका ज्यादातर समय खुदा की इबादत में गुजरता था। उन्होंने हमेशा लोगों को गरीबों और लाचारों की खिदमत, मोहब्बत व बुराइयों से खुद को बचाने का संदेश दिया।

हजरत साबरी सरल उदार व्यक्तित्व के सूफी संत थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक थी। जन्म से ही वर्ली प्रवृत्ति के नाम से विख्यात हजरत साहब ने दीन दुखियों की सेवा करके उनका दिल जीत लिया।

वह अपने पास आने वाले हर व्यक्ति का एक मेहमान की तरह आदर सत्कार करते थे। भाईचारा कायम करना व परोपकार का पाठ पढ़ाया करते थे। उन्होंने एक नजर जिस पर डाली उसका भला हो गया। उनके दरबार में कोई भी फरियादी निराश होकर नहीं लौटता था।

उनके जीवन काल में ही दरगाह और मस्जिद की तामीर शुरू हो गई थी। दरगाह में स्थित मजार के ऊपर 40 फीट ऊंचा संगमरमर का गुंबद है। सूफी संत के बड़े बेटे लुत्फुर्रहमान साबरी सज्जादानशी होने के साथ-साथ खलीफा अव्वल भी हैं। 92 साल की उम्र में अल्लाह को प्यारे हो गए सूफी संत के जीवन काल में ही जिले के अलावा मुरादाबाद रामपुर अमरोहा संभल व बिलारी आदि स्थानों से जरीन यहां आने लगे थे। उनके पुत्र सूफी संत हजरत बाबा हिफजुर्रहमान उनके कई चमत्कार बताते हैं। वली बाबा के इंतकाल के बाद संत हजरत बाबा लुत्फुर्रहमान ने इस दरगाह का निर्माण कराया।

दुनिया से रुखसत होने के बाद भी मौलाना लतीफी का दरबार उसी शानो शौकत से जगमगा रहा है। सभी धर्मावलंबी यहां आकर हजरत की मजार के आगे नतमस्तक होते हैं जो कौमी एकता का एक जीता जागता उदाहरण है।

उनकी मजार पर उर्स हर साल मुस्लिम कैलेंडर के मुताबिक चांद की 6 जमादी उल अव्वल से शुरू होने वाला और 5 दिन तक धूमधाम से चलता है। इस अवसर पर दरगाह को बहुत सुंदर तरीके से सजाया जाता है।

सीकरी शरीफ में उर्स के मौके पर हजारों की संख्या में जायरीन मजार पर पहुंचकर मन्नत मांगते हैं। कुल शरीफ की मुख्य रस्म में भाग लेने के लिए राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, उत्तराखंड, कोटा, अजमेर, सूरत, बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर आदि जगहों से आए जायरीन यहां बनाए गए पंडालों में ठहरते हैं।

मुरादाबाद, संभल, बिलारी, तुगलपुर कम्हेड़ा आदि के ग्रामीण सेवा के लिए लंगर लगाते हैं।

इन दिनों मजार के गुस्ल की रस्म अदा की जाती है और जायरीन वहां गुलाब जल छिड़कते हैं। मजार गुलाब जल व इत्र की खुशबू से महक उठती है। जायरीनों के द्वारा फातिहा पढ़ा जाता है।

उर्स के दौरान जुमे की नमाज का खास महत्व होता है। उर्स के अवसर पर बाहर से आने वाले लोगों के लिए मुफ्त भोजन और कव्वालियों के दौर चलते हैं। उर्स में जायरीनों के मनोरंजन के लिए देशभर से मशहूर कव्वाल आते हैं जो बाबा की शान में कलाम पेश करते हैं।

कुल रस्म के आखरी दिन मजार पर चादरपोशी की जाती है। इस दिन यहां देश के कोने कोने से बड़ी संख्या में जायरीन आते हैं।

उसमें आए जायरीन दिन भर मेले में लगी साज-शृंगार, खेल-खिलौने, मिठाई, वस्त्र, कांच व लकड़ी का सामान की दुकानों पर जमकर खरीदारी करते हैं। छोटे बच्चे झूलों का आनंद उठाते हैं

पिरान कलियर के बाद इलाके का यह सबसे बड़ा उर्स माना जाता है।
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** बघरा कस्बा

* दरगाहे आलिया बाबुल हवाइज –

मुजफ्फरनगर जनपद से 12 किमी दूर शामली मार्ग पर बघरा कस्बे मे सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक शिया समुदाय का विश्व प्रसिद्ध धर्मस्थल दरगाह बाबुल हवाइज स्थित है।

इस प्रसिद्ध भव्य दरगाह में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले सालाना मजलिसों में देश विदेश से लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है।

बघरा कस्बे के बस स्टैंड पर स्थित बाग में जहां पहले से ही ताजिए दफन किए जाते हैं। इसी बाग में स्थित दरगाह के बारे में मान्यता है कि शिया समुदाय के मौलाना फरजंद अली ने इराक देश के करबला में स्थित मौहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन की कब्र से पवित्र मिट्टी लाकर बघरा के इस बाग में दफन की थी।

इस स्थान पर दरगाह बनने का इतिहास बहुत रोचक है।
बताते हैं कि 13 अप्रैल 1963 के दिन शाम के समय पास के ही गांव सैदपुरा का असगर त्यागी नाम का एक युवक यहां के पवित्र स्थान पर अपने पशुओं को चराते हुए बैठकर गाना गा रहा था रहा था। तभी एक नकाबपोश घुड़सवार आंधी की तरह आकर यहां बैठकर गाना गाते हुए असगर के सामने प्रकट हुआ। लेकिन अजगर ने उस नकाबपोश घुड़सवार कि और कोई ध्यान नहीं दिया तो उसे आवाज आई कि हम अपने आका के रोजे का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसी समय उस घुड़सवार की ठोकर असगर के मुंह पर लगी जिससे वह 40 कदम की दूरी पर जाकर गिरा और बेहोश हो गया। यह खबर बघरा कस्बे और पास के शेखपुरा गांव में तेजी से फैल गई। बघरा और आस-पास के गांव से सैकड़ों लोग वहां पहुंच गए जहां असगर बेहोश होकर पड़ा था।

उस स्थान पर इकट्ठा हुए लोगों ने देखा कि तेज गर्मी के मौसम में कड़ी जमीन पर घोड़े की टाप के निशानात काफी गहरे तक बने हुए हैं, जिनसे अद्भुत चमत्कारी खुशबू आ रही थी। उस स्थान पर मौजूद लोगों ने ऐसी अद्भुत खुशबू पहले कभी भी महसूस नहीं की थी।

काफी प्रयासों से बहुत देर बाद जब असगर को होश आया तब उसने अपने साथ घटित हुए वाकिए को विस्तार से बताया। उसके पूरी तरह से बताए वाकिए के अनुसार महजब के जानकार विद्वानों ने यह तय पाया कि यहां हजरत अली के बेटे हजरत अब्बास प्रकट हुए थे। वहां मौजूद निशानात उन्हीं के घोड़े की टाप के हैं। विद्वानों के विचार विमर्श के बाद घोड़े के टापों उन निशानों को सुरक्षित कर दिया गया। साथ ही यहां उस स्थान पर हजरत अब्बास के नाम से रोजा बना दिया। धीरे धीरे उस छोटे से रोजे ने अब एक विशाल दरगाह का रूप धारण कर लिया है। देश विदेश से प्रतिवर्ष लाखों जायरीन यहां पहुंचते हैं और मुंह मांगी मुराद पाते हैं।

इस दरगाह पर जियारत के लिए राजनीतिक हस्तियों का जमावड़ा भी यदा-कदा देखा जा सकता है। अनेक महत्वपूर्ण हस्तियों ने यहां पहुंचकर मन्नते मांगी है और उनकी मन्नतें कबूल भी हुई।

इस दरगाह में मन्नतें मांगने के बाद जब उन लोगों की मन्नते पूरी हो जाती हैं वे सालाना के समय यहां चादरे चढ़ाते हैं और प्रसाद वितरण करते हुए देखे जा सकते हैं।

हर साल होने वाली सालाना मजलिस में देश भर से आए हुए नामवर‌ उलमाएदीन तकरीर करते हैं। सालाना मजलिस के अवसर पर ऑल इंडिया मुशायरा का आयोजन भी किया जाता है जिसमें देशभर के शायर शिरकत करते हैं।

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शामली जनपद

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थानाभवन –

सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक दरगाह हजरत शाह शमसूद्दीन पीर शाहविलायत साहब का सालाना उर्स।

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बागपत जनपद
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बरनावा गांव – बदरुद्दीन और मखदूम शाह की दरगाह

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अमरोहा जनपद   –

 

हजरत शाह विलायत की दरगाह

यह दरगाह बिच्छू वाली मजार के नाम से देश और दुनिया में मशहूर है।

सांप और बिच्छू को देख कर हमारे होश उड़ जाते हैं। लेकिन एक ऐसी जगह जहां पर बिच्छू शाह विलायत के इशारे पर चलते हैं। वह बिच्छू जिसके काटते ही मौत निश्चित होती है, लेकिन यहां के बिच्छू इंसानों से प्यार करते हैं। यहां बिच्छू सजदा करते हैं,/ बिच्छू किसी को काटते नहीं है।

यहां की हर जगह में बिच्छू छुपे हैं। किसी दीवार, किसी पेड़, किसी कोने की मिट्टी हटाते ही सैकड़ों बिच्छू निकल पड़ते हैं। इन्हें आप अपने हाथ की हथेली में भी लेकर घूम सकते हैं। यहां तक कि अपने साथ अपने घर भी ले जा सकते हैं, लेकिन एक तय समय के लिए ही। एक तय वक्त के मुताबिक  इन्हें दरगाह में वापिस भी लाना होता है। तय समय पूरा होने के बाद यह अपने पुराने असली रूप में आ जाते हैं और नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

800 साल से भी अधिक पुरानी इस दरगाह में बिच्छू कैसे आए कहां से आए

800 साल से भी पहले ईरान से सैयद शरर्फुद्दीन शाह विलायत भारत मेंं अमरोहा आए थे और उन्होंने इसे अपना मुकाम बना लिया और यहीं घर बना कर रहने का फैसला कर लिया। उस समय यहां पहले से मौजूद शाह नसरुद्दीन ने नाराजगी जाहिर की। वे नहीं चाहते थे की हजरत शाह विलायत वहां मुकाम करें | दोनों के बीच मोहब्बत बरकरार रहे इस लिए उन्होंने एक कटोरे में पानी के ऊपर फूल डालकर भेजे थे। एक दूसरे को पीछे हटने को मजबूर करने का यह सिलसिला ही बिच्छूओं के आने का जरिया बना। शाह नसरुद्दीन ने अपनी तौहीन समझते हुए उन्हें शाप दिया कि तुम जहां रहते हो वहां केवल कीड़े मकोड़े ही निकलेंगे। इस पर शाह विलायत ने एक चमत्कार किया। उन्होंने घोषणा कर दी कि उस इलाके में रहने वाले यह सांप बिच्छू किसी को भी नहीं काटेंगेl

उन दोनों की बातें हकीकत में बदल गई और आज तक वहां यह सिलसिला जारी है। शाह विलायत बिच्छू वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध हो गए।  लगभग 800 वर्ष से भी अधिक गुजर जाने के बाद भी दरगाह पर बिच्छूऔं की तादाद कभी कम नहीं हुई।

शाह विलायत की दरगाह पर अकीदत मंदो का मेला लगा रहता है। यहां वर्ष में एक बार बहुत बड़ा मेला लगता है। इस अवसर पर देश-विदेश से खासकर खाड़ी देशों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। लोग बड़े आराम से यहां बिच्छूओं को अपने हाथ में उठाते हैं और अपनी हथेली में लेकर घूमते हैं।

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*  अमरोहा में ही शाह नसरुद्दीन की मजार जोकि अमरोहा के सबसे पुराने सूफी बुजुर्ग थे।

* दरगाह भूरे शाह

* रजबपुर – (गजरौला) –

राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित रजबपुर कस्बा स्थित है। यहां भारत भर में प्रसिद्ध बाबा फरीद रहमतुल्ला आले की दरगाह है। रजबपुर कस्बा में बाबा फरीद की दरगाह होने से यह कस्बा पूरे देश में विख्यात है बाबा फरीद की दरगाह के उर्स पर सभी वर्गों के अकीदतमंद शामिल होकर चादरपोशी करते हैं और मन्नतें मांगते हैं। बाबा फरीद जी की दरगाह पर देश विदेश की विशिष्ट हस्तियां आकर चादर पोशी करती रही हैं।

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