_____________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के१०० किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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यह महाभारत काल में  बसाया गया नगर है

बुलंदशहर  जनपद में भागीरथी  गंगा के किनारे बसे  अनूपशहर का प्राचीन काल से धार्मिक महत्व रहा है।

महाभारत काल में कौरव पांडवों के बीच कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध शुरू होने से पहले भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी तीर्थाटन के लिए चले गए थे। तीर्थ यात्रा के क्रम में भगवान बलराम इस क्षेत्र में आए और यहां तपस्या की थी।

अनूप शहर से कुछ ही दूरी पर स्थित आहार गांव में पुरातत्व विभाग खुदाई  के दौरान महाभारत कालीन ध्वंसावशेष मिले हैं जिससे इस स्थान की प्राचीनता का पता चलता है

यहां से मात्र 12 किमी दूर पौराणिक व प्राचीन कालीन  अवंतिका देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। मंदिर के मध्य में भूमि के अंदर एक यंत्र मंत्र गढा हुआ है जिसकी पूजा की जाती है। यह वैष्णवी वृत्ति के तांत्रिकों का मंदिर है।

 

मुगल काल में बादशाह जहांगीर के समय एक वीर बडगूजर राजा अनूप राय ने अनूपनगर को बसाया था।

बादशाह जहांगीर ने अपने लेखों में इस प्रतापी राजा के शौर्य का उल्लेख किया है। एक बार बादशाह जहांगीर शिकार करने के लिए जंगल में गया उसके साथ राजा अनूप राय भी गए थे। जंगल में एक शेर अचानक जहांगीर पर झपट पडता है बादशाह जहांगीर  बुरी तरह से  घबरा गया। तुरंत राजा अनूप राय ने  अपनी तलवार खींची और शेर का बहादुरी से सामना करके बादशाह जहांगीर के प्राणों की रक्षा की। जहांगीर अनूप राय की वीरता से बहुत प्रभावित हुआ और उन्हें अनिराय सिंह दलन की पदवी से सम्मानित किया और यहां गंगा किनारे बसे 84 गांव पुरस्कार में दिए।

बताते हैं कि इन्हीं प्रतापी राजा अनूप सिंह की सातवीं पीढ़ी में अचल सिंह के पुत्र तारा सिंह और माधो सिंह के बीच संपत्ति का बंटवारा हो गया। तारा सिंह ने अनूपशहर को अपना मुख्यालय बनाया और माधो सिंह ने जहांगीराबाद को अपना मुख्यालय बनाया।

तारा सिंह ने अनूप शहर के विकास और उन्नति के लिए बहुत कार्य किए। उन्होने अनुपशहर में संस्कृत की उच्च शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए भी अनेक प्रयास किए। यंहा गंगा जी के तट पर उच्चकोटि के साधु- संत और महात्मा आकर रहने लगे।

तारा सिंह के कोई पुत्र नहीं था अतः उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी सम्पत्ति पर एक बार फिर से विवाद उत्पन्न हो गया। तारा सिंह के भतीजे और माधव सिंह के पुत्र उमेद सिंह को अनूपशहर मिला। लेकिन एक रानी ने इस निर्णय को स्वीकार नहीं किया। उस रानी ने अनूप शहर के किले को बारूद की भेंट कर दिया तथा रानी स्वयं भी अपनी सखियों के साथ उस में जलकर भस्म हो गई। अहमद शाह अब्दाली ने सन 1757 इस किले को फिर से बनवाया।

‘छोटी काशी’ के नाम से प्रसिद्ध अनूप शहर में प्राचीन काल से गंगा के किनारे आस्था के कल- कल हिलोरे मारते रहे हैं।

अनूप शहर को छोटीकाशी कहा जाता है। इसके बारे में एक पुरानी कहानी है। बताया जाता है कि कई सौ वर्ष पूर्व उस समय के महान संत अच्युतानंद ने वाराणसी से नाव के द्वारा गंगा की विपरीत धारा में यात्रा करते समय यह कहा कि जिस स्थान पर वह धरती पर पैर रखेंगे, उस स्थान को छोटी काशी के नाम से पुकारा जाएगा। स्वामी अच्युतानंद वाराणसी से गंगा जी में नाव के द्वारा यात्रा करते हुए यहां पहुंचे और अनूपशहर के किनारे नाव से उतर कर धरती पर पैर रखा था, तभी से संत समाज अनूप शहर को छोटी काशी के नाम से पुकारने लगा।  अनेकों ऋषि-मुनियों ने अपनी तपस्या के बल पर इस भूमि को तपोभूमि बनाया है।

सनातन धर्म के उच्च कोटि के संत समय-समय पर यहां अपना आगमन कर इस क्षेत्र की भूमि को पवित्रता प्रदान करने के साथ- साथ यहां के वासियों को भी कृतार्थ करते रहे हैं। सनातन धर्म के उच्च कोटि के महान संत अच्युत मुनि, श्री कृष्ण बोधाश्रम, श्री विष्णु आश्रम, सत्यबोधाश्रम, सुखबोधाश्रम, उड़िया बाबा, दीनदयाल बाबा, करपात्री जी महाराज, जगतगुरु शंकराचार्य शांतानंद जी, जगतगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी, श्री हरिहर बाबा, मनीराम बाबा, गौरी शंकर, बंगाली बाबा आदि बड़े-बड़े संतों का यह स्थान कर्म क्षेत्र रहा है और उनका विशेष आशीर्वाद इस स्थान को प्राप्त रहा इसी कारण यह क्षेत्र सदैव ही प्राकृतिक आपदाओं से मुक्त रहा है।

अनूप शहर में नर्वदेश्वर महादेव मंदिर, श्री गिरधारी जी का मंदिर, बिहारी जी का मंदिर, चामुंडा देवी का मंदिर और हनुमान जी का प्राचीन मंदिर है।

यहां प्राचीन मंदिरों की अनेक श्रंखलाएं हैं। गंगा किनारे अनेक साधु- संतो के आश्रम है।

प्राचीन काल से यहां गंगा जी के किनारे कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान के अवसर पर विशाल मेला लगने की परंपरा रही है इस अवसर पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगा स्नान करने के लिए आते हैं।

अमावस्या पूर्णिमा सोमवती अमावस्या व अन्य पर्व-उत्सवों पर यहां गंगा स्नान करने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। यहां के नेहरू गंज, दिनेश घाट, कुंज घाट ,लाल महादेव, पक्की घटिया, गऊघाट आदि स्नान घाटों पर श्रद्धालु गंगा स्नान करके दान पुण्य करते हैं। भगवान सत्यनारायण की कथा श्रवण कर मंदिरों – देवालयों में पूजा अर्चना करते हैं।

श्राद्ध पूर्णिमा पर दूरदराज से आए लाखों श्रद्धालु गंगा के घाटों के साथ पक्के घाट व पुल के दोनों ओर बने अस्थाई घाटों पर गंगा स्नान कर पुरोहितों से विभिन्न संस्कार करा कर भगवान सत्यनारायण की कथा का श्रवण करते हैं। प्राचीन मान्यता के अनुसार चांद पूर्णिमा पर दिवंगत पूर्वजों का स्मरण कर उन्हें आमंत्रित किया जाता है। श्राद्ध पूर्णिमा से श्राद्ध अमावस्या तक तिथि के अनुसार पूर्वजों की आत्मा की शांति की प्रार्थना की जाती है। पितृ अमावस्या पर गंगा स्नान कर अपने पूर्वजों का तर्पण कर पिण्डोदक करके उन्हें विदा कर दान करते हैं। अमावस्या पर दिवंगत पूर्वजों को श्राद्ध पूर्ण हो जाने पर विदा करने की रस्म पूरी की जाती है। इन दिनों यहां गंगा के तटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है।

  • समय-समय पर श्रद्धालु यहां श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन के अंतर्गत श्री गंगा जी को चुनरी पहरावनी  जिसमें गंगा जी की चौड़ी धारा को एक सिरे से दूसरे सिरे तक को चुनरी पहनाई जाती है का आयोजन करते हैं।

 

पहले समय में गंगा की विशाल तलहटी में श्रद्धालु एक माह तक पड़ाव डालकर मेले का आनंद लिया करते थे। किंतु समय के साथ  कार्तिक पूर्णिमा मेले के स्वरूप में परिवर्तन होता रहा है। लाखों श्रद्धालु कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा जी में स्नान व पूजा अर्चना कर गंगा मां से घर परिवार में सुख शांति की मनोकामना करते हैं।

प्राचीन काल से छोटी काशी के नाम से विख्यात यह धार्मिक नगरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुख्य तीर्थ स्थल के रूप में विकसित हो रही है l अनूप शहर में बहने वाली गंगा और गंगा तटों की सूरत बदलने के लिए खास प्रयास नमामि गंगे योजना के तहत किए जा रहे हैं।

उद्योगपति जयप्रकाश गौड़ को यहां से काफी लगाव है। वह निजी तौर पर अनूप शहर को चमकाने में जुटे हैं। प्राचीन मस्तराम आश्रम का आधुनिकीकरण करा कर उन्होंने कुछ घाटों को गोद लेकर विकसित करवाया है।अनूपशहर में उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना कर शिक्षा के मानचित्र पर अनुपशहर को नई ऊंचाई दी है। उनके द्वारा यहां गंगातट पर 6 एकड़ भूमि पर महादेव का भव्य आलीशान मंदिर व गंगा का किनारा दूर तक पक्का कराकर सौंदर्यकरण कराया गया है।

अनूपशहर से गंगा पार गवां गांव कुछ दूरी पर हरि बाबा का बांध है। बांध पर कीर्तन भवन, राम भवन, सत्संग भवन बने हैं। इसके साथ ही यहां से मात्र 15 किमी दूर सिद्ध बाबा का मंदिर, 5 किमी दूर भृगु ऋषि का आश्रम, 11 किमी दूर कर्णवास, 16 किमी दूर राजघाट, 8 किमी दूर हरिधाम स्थित हैं।

 

 

 

 

 

 

 

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