____________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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धर्म नगरी हरिद्वार में अनेकों पौराणिक प्राचीन मंदिर एवं धार्मिक स्थल है। शिवालिक पहाड़ियों और नीलपर्वत से घिरे इस प्रसिद्ध तीर्थ में कई देवी-देवताओं ने तप किया है अपितु नील पर्वत तो उनकी क्रिड़ाओं का प्रमुख स्थल रहा है। नील पर्वत पर स्थित गौरीशंकर महादेव मंदिर, नीलेश्वर महादेव मंदिर, दक्षिण काली मंदिर, चंडी देवी मंदिर, अंजनी देवी मंदिर आदि कई विख्यात पौराणिक मंदिर आज भी उन पौराणिक कथाओं के साक्षी हैं।

हरिद्वार में गंगा जी की नीलधारा के उस पार नील पर्वत की चोटी पर स्थित हनुमान जी की माता अंजनी देवी का प्राचीन एवं पौराणिक मंदिर है। पौराणिक कथाओं के अनुसार अंजनी महर्षि गौतम की पुत्री थी।

पौराणिक कथा है, गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या अत्यंत रूपवती थी। देवताओं के राजा इंद्र अहिल्या के सौंदर्य के वशीभूत होकर एक दिन गौतम ऋषि के आश्रम आ पहुंचे। देवराज इंद्र अपने साथ चंद्रमा को भी लेकर आए थे।

गौतम ऋषि प्रतिदिन भोर के समय गंगा स्नान करने के लिए जाया करते थे। उस दिन गौतम ऋषि के आश्रम में अर्धरात्रि के समय चंद्रमा ने मुर्गे का रूप धारण करके बांग दी, जिससे गौतम ऋषि भ्रमवश भोर का समय हो गया यह समझकर गंगा स्नान के लिए चल दिए।

गौतम ऋषि के गंगा स्नान के लिए चले जाने के बाद उनके पीछे इंद्र गौतम ऋषि का रूप धारण करके अहिल्या के पास आ पहुंचे।

लेकिन गौतम ऋषि जैसे ही स्नान करने के लिए गंगा जी में उतरे कि उन्हें आभास हुआ कि अभी दिन नहीं निकला है यह अर्धरात्रि का समय है। गौतम ऋषि उल्टे पांव वापस अपने आश्रम को लौट आए।

गौतम ऋषि ने अपने आश्रम पहुंचने पर देखा कि आश्रम के बाहर मुर्गे के रूप में चंद्रमा खड़ा है। उन्होंने चंद्रमा पर घुटनों तक गंगा जी में उतरने से भीगी धोती फटकार कर मारी। कहा जाता है कि चंद्रमा में जो धब्बा नजर आता है, यह वही गौतम ऋषि द्वारा मारी गई गीली धोती का ही निशान है।

अपनी कुटिया में पहुंचकर गौतम ऋषि ने कुटिया के अंदर इंद्र को देखा। उन्होंने कुपित होकर इंद्र को श्राप दिया कि जिस भग के वशीभूत होकर तू अधर्म की राह पर होता हुआ यहां तक आया है, तेरे सारे शरीर में वही भग फैल जाए।

इंद्र को श्राप देने के बाद कुपित गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी से पूछा कि तुम्हारे पास कौन आया था? लेकिन लज्जावश अहिल्या ने गौतम ऋषि से सत्य छुपा गई जिस पर गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी अहिल्या को श्राप दिया कि,” जा तु पत्थर की शिला बन जा।”

अपनी पत्नी अहिल्या को श्राप देने के बाद गौतम ऋषि ने अपनी पुत्री अंजनी से पूछा की, ‘पुत्री कौन आया था?’अंजनी ने अपने पिता गौतम ऋषि को बताया कि ‘पिताजी देवराज इंद्र आप का वेश धारण करके आए थे।’

अंजनी के उत्तर से उनकी माता अहिल्या कुपित हो गई कि तूने सत्य बोलकर मेरे दोष को प्रकट कर दिया है, ‘जा मैं तुझे श्राप देती हूं कि तेरे पर कुवांरपन में ही पुत्रवती होने का दोष लगेगा।’

अपनी माता के दिए श्राप को सुनकर अंजनी ने अपनी माता अहिल्या से कहा कि,’मैं तप करके तुम्हारे दिए श्राप को मिथ्या साबित करूंगी’और अंजनी नील पर्वत पर तप करने के लिए चली गई। अंजनी ने तप करने से पहले यह प्रतिज्ञा की कि ‘मैं इस स्थान पर पहाड़ के अंदर तप करूंगी, और मैं जीवन भर किसी पुरुष का मुंह नहीं देखूंगी।’

आज हरिद्वार में नील पर्वत पर जहां अंजनी देवी का मंदिर है वहीं अंजनी ने तप किया था।

पुराणों के अनुसार ही जिस समय अंजनी नील पर्वत पर तप कर रही थी, उसी समय भस्मासुर ने भी भगवान भोले महादेव की कठिन तपस्या करके उनसे यह वरदान प्राप्त किया था कि मैं जिसके शीश पर हाथ रख दूं,वह भस्म हो जाए।

भोले भंडारी भगवान शंकर से वरदान पाकर भस्मासुर दैत्य के मन में कपट भरा विचार आया कि क्यों न शिव को ही भस्म करके उनकी अर्धांगिनी पार्वती को अपनी पत्नी बनाया जाए। भस्मासुर के इस कपट भरे भाव को समझते ही भगवान शंकर भागने लगे। आगे-आगे भगवान शंकर और उनके पीछे-पीछे भस्मासुर भागने लगा।

क्षीरसागर में शेषशैय्या पर विराजमान भगवान विष्णु ने अपनी अलौकिक शक्ति से यह सब जान लिया और वे भगवान शिव को बचाने के लिए मोहिनी रूप में भस्मासुर दैत्य के सामने जा खड़े हुए। भस्मासुर भगवान विष्णु के मोहिनी रूप को देखकर शिव और पार्वती को भूल उस मोहिनी रूप पर मोहित हो गया।

मोहिनी रूप धारण किए भगवान विष्णु ने भस्मासुर से कहा कि मुझे प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें मेरे साथ मेरे जैसा ही नृत्य करना होगा तभी तुम मुझे प्राप्त कर सकोगे।

भस्मासुर उस मोहिनी रूप पर इतना आसक्त हो चुका था कि उसने भगवान विष्णु के मोहिनी रूप के साथ नृत्य करने की सहमति दे दी। नृत्य करते-करते मोहिनी रूप में विष्णु भगवान ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा और उन्हीं का अनुसरण करते हुए भस्मासुर ने भी अपना हाथ अपने ही सिर पर रखा, भगवान शिव के दिए वरदान के प्रभाव से वह वहीं भस्म हो गया।

भस्मासुर तो स्वयं भस्म हो गया लेकिन पौराणिक कथा में वर्णन है कि भगवान विष्णु का वह मोहिनी रूप इतना सुंदर और लावण्यमय था कि भगवान शिव का उस रूप को देखकर वीर्य स्खलित हो गया जिसे भगवान विष्णु ने अपनी हथेली पर ले लिया। कहते हैं, यदि वह वीर्य भूमंडल पर गिरता तो वह खंड-खंड हो जाता और यदि समुद्र में गिरता तो उसमें अग्नि की ज्वालाएं उठने लगती। हथेली पर उस वीर्य को लिए हुए भगवान विष्णु ने विचार किया कि इस संसार में ऐसी कौन स्त्री है जो इसे धारण कर सके? अपनी योगदृष्टि के द्वारा भगवान विष्णु ने जाना कि नील पर्वत पर अंजनी कठोर तप कर रही है और वह ही इस भगवान शिव के स्खलित वीर्य को धारण कर सकती है।

तब भगवान विष्णु एक ऋषि के रूप में नील पर्वत पर अंजनी के पास पहुंचे और उनसे जल पिलाने का आग्रह किया। लेकिन अंजनी अपनी प्रतिज्ञा के कारण पहाड़ की कंदरा से बाहर नहीं आई। अतः उन्होंने कंदरा के अंदर से ही हाथ निकालकर भगवान विष्णु को जल पिलाना चाहा।

भगवान विष्णु ने जल पीने से पहले अंजना से जानना चाहा कि उनका गुरु कौन है,क्या तुमने गुरु मंत्र ले लिया है? अंजनी के मना करने पर भगवान विष्णु बोले कि तब तो मैं तुम्हारे हाथ से जल नहीं पियूंगा, क्योंकि बिना गुरुमंत्र प्राप्त किए तप करने वाले से जल लेकर पीना उचित नहीं है। भगवान विष्णु का उत्तर सुनकर अब अंजनी धर्मसंकट में पड़ गई कि दरवाजे पर आए अतिथि का जल पिए बिना लौट जाना पाप होगा।

अंजनी ने ऋषि का रूप धारण किए हुए भगवान विष्णु से ही प्रार्थना की कि हे ऋषिवर आप ही मुझे गुरुमंत्र देकर मेरे गुरु बन जाएं। लेकिन मैंने अपने जीवन में किसी भी मनुष्य का चेहरा नहीं देखने की प्रतिज्ञा ली हुई है,इसलिए मैं अपना कान बाहर निकालती हूं आप उसी में मुझे गुरु मंत्र दे दीजिए। भगवान विष्णु तुरंत सहमत हो गए और अंजनी ने गुरु मंत्र प्राप्त करने के लिए जैसे ही अपना कान बाहर निकाला भगवान विष्णु ने फूंक मारकर वह स्खलित वीर्य अंजनी के कान में पहुंचा दिया।

भगवान विष्णु ने वह वीर्य फूंक मारने से उत्पन्न हुए हवा यानि पवन के माध्यम से अंजनी माता के कान में पहुंचाया था, इसलिए अंजनी माता से उत्पन्न हुए हनुमान पवनपुत्र कहलाए तथा हनुमान जी भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र कहलाते हैं।

हरिद्वार में नील पर्वत की चोटी पर जहां माता अंजनी ने तप किया था, वहीं पर यह विख्यात एवं पौराणिक मंदिर स्थित है। प्राचीन अंजनी माता मंदिर सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है।

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