_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के१०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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भारत की सनातन संस्कृति और सभ्यता जितनी प्राचीन है लगभग उतना ही प्राचीन कुंभ का इतिहास है। संस्कृत भाषा में कुंभ का अर्थ घट अथवा घड़ा होता है। सनातन धर्म के धार्मिक संस्कारों में इसे कलश के नाम से भी उपयोग किया जाता है। कलश का सनातन हिंदू धर्म के पवित्र कार्यों में गहरा संबंध है। गृह प्रवेश से लेकर मृत्यु संस्कार तक में इसका प्रयोग होता है। सनातन हिंदू धर्म के अनेक धार्मिक संस्कारों में कलश की स्थापना की जाती है एवं धार्मिक कार्यक्रम के प्रारंभ में कलश यात्रा निकाली जाती है।

ऐसी धार्मिक मान्यताएं विद्यमान है कि कलश के ऊपरी भाग अर्थात मुख में भगवान श्री विष्णु, गले में शिव और मध्य भाग में ब्रह्मा का वास होता है। शास्त्रों में वर्णन है-

कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:।

मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मा‌तृगणा: स्थिता:।।

कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा।

ऋग्वेदोsथ‌ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथ‌र्वण:।।

अड़ं्गश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।।

कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल भाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में मातृगण, कुक्षि में समस्त समुद्र, पहाड़ और पृथ्वी रहते हैं और अंगों के सहित ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद तथा अथर्व वेद भी रहते हैं।

पुराणों में वर्णन है समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी जी के प्राकट्य से पूर्व सभी श्रेष्ठ नदियां मूर्त रूप होकर स्वर्ण कलशों में पवित्र जल लाती हैं। इसी जल से दिग् पाल लक्ष्मी जी का महाभिषेक करते हैं।

ऋग्वेद में उल्लेख है जिससे स्पष्ट होता है कि मांगलिक अवसरों पर उस काल की सौभाग्यवती नारियां भी पूर्ण जलकुंभों को सिर पर उठाकर चला करती थी। भारतीय सनातन संस्कृति की इस परंपरा में आज के समय में भी किसी बड़े धार्मिक आयोजन के प्रारंभ में निकलने वाली शोभायात्रा में सौभाग्यवती स्त्रियां पूर्ण जलकुंभो को सिर पर उठाकर चलती हैं।

कुंभ के चित्रण भारतीय सनातन संस्कृति और सभ्यता का आदि पवित्र चिन्ह भी है। कुंभ का चित्रण भरहुत सांची, मथुरा, अमरावती नागार्जुनकोंडा, सारनाथ आदिप्राचीन स्थानों पर मिलता है। सिंधु घाटी सभ्यता स्थलों पर उत्खनन में भी पूर्ण कुंभ चित्रित सिक्के प्राप्त हुए हैं।

सीता जी की उत्पत्ति भी कलश से हुई और पुराणों में महर्षि अगस्त का जन्म भी कुम्भ से हुआ बताया गया है।

देवालयों के निर्माण के समय उनके आधार में निधि कलशों के रूप में धातुओं एवं रत्नों से भर कर कलशों को रखा जाता है तथा शिखर पर स्थापित कुंभ को अमृत कलश कहा जाता है।

सनातन धर्म की युगों पुरानी परंपरा है दैव अर्चना में कलश की स्थापना करना। यह परंपरा आज भी धर्म उत्सवों में पूरी श्रद्धा से निभाई जाती है।

पूर्ण कुंभ का प्राथमिक अवयव है मिट्टी। मिट्टी को शोध कर ही कुंभकार निज मानस की अभिलाषाओं के अनुसार सृजन को स्वरूप देता है।

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