_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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प्राचीन काल में राजा महाराजाओं के बीच युद्ध तीर -कमान और भाले – तलवारों आदि हथियारों से लड़ा जाता था। इन अस्त्र- शस्त्रों के द्वारा सामने वाले पर वार करना और इन अस्त्रों – शस्त्रों के वार से स्वयं को बचाना भी एक कला होती थी और इस कला को युद्ध कला जाता था।आज के समय में सरकारी उपेक्षा के कारण इस प्राचीन कला को लोग भूलते जा रहे हैं।

प्राचीन काल में यह विद्या युद्ध लड़ने के समय तो काम आती ही थी। वैसे भी इस विद्या को सीखने वाला व्यक्ति आत्म रक्षा करने में सक्षम होता था। इस विद्या को सीखने वाला आज के समय में प्रचलित जूडो कराटे आदि मार्शल आर्ट को जल्दी ही सीख जाता है।

इस युद्घ विद्या को सिखाने का जिस स्थान पर प्रशिक्षण दिया जाता है उसे अखाड़ा कहा जाता है। अखाड़ों में पुराने समय में काम आने वाली शास्त्र जैसे तलवार, बल्लम, खांडे, परसा, पंजा, गोफा, चक्रगदा आदि का प्रशिक्षण किया जाता है।

इन अखाड़ों में प्रशिक्षण लेने वाला व्यक्ति अकेले ही आठ-दस लोगों से एक साथ मुकाबला कर सकता है। यह विद्या लोगों को स्वावलंबी बनाने में आज भी सक्षम है। इस विद्या को सिखने वाला व्यक्ति शारीरिक रूप से शक्तिशाली और मजबूत शरीर का स्वामी बन जाता है। इसके साथ वह अपनी आत्मरक्षा करने में भी सक्षम हो जाता है।

किसी समय गांव- गांव में इस विद्या को जानने वाले होते थे। आजकल इस युद्धविद्या का प्रदर्शन धार्मिक जुलूसों आदि में किया जाता है।

इस प्राचीन युद्धविद्या को थोड़ा सा भी सरकार के द्वारा प्रोत्साहन मिले तो यह प्राचीन कला अपना खोया सम्मान पुनः प्राप्त कर सकती है।

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थाना भवन – जनपद शामली

इस युद्ध कला के प्रति उपेक्षा के बाद भी कुछ लोग
इस कला को भूले नहीं है और निशुल्क इसके प्रचार प्रसार करने में लगे हुए हैं। थाना भवन के पास जलालाबाद कस्बे में सन 1910 में स्व. बालीराम ने इस विद्या को सिखाने के लिए प्रशिक्षण केंद्र (अखाड़ा) खोला था। तब से इस केंद्र को स्व. सरदार मेहर सिंह, दुर्गा प्रसाद कश्यप, हुकुम सिंह भटनागर, बनारसी दास, रामानंद उपाध्याय, रामस्वरूप आदि ने प्रशिक्षण दिया उसके बाद ब्रज भूषण उपाध्याय विनोद विश्वकर्मा आदि यहां के प्राचीन शिव मंदिर की धर्मशाला में इस कला के प्रशिक्षण केंद्र को चलाते रहे।
स्व.बालीराम द्वारा चलाए गए अखाड़े से हजारों शिष्यों ने इस विद्या को सीख कर आस- पास के अन्य स्थानों नानौता, तीतरो, गंगोह, थानाभवन, देवबंद, शामली, शाहपुर आदि स्थानों पर अखाड़ों की स्थापना करके प्राचीन शास्त्रों के चलाने का प्रशिक्षण दिया। इन अखाड़ा केंद्रों पर मुख्यतः लाठी, बल्लम, तलवार चलाने के साथ- साथ अपना बचाव करना भी सिखाया जाता है।
इन अखाड़ों में प्रशिक्षण लेने वाला व्यक्ति यहां पर लाठी चलाना व तलवारबाजी और इनसे अपना बचाव करना सीखता है इसके अलावा यहां जंजीर, गोला, तीर कमान चलाने जैसी अन्य विद्याएं भी यहां सीखते हैं। वहीं इस विद्या को सीखने के साथ साथ उनका व्यायाम भी हो जाता है
संस्था का उद्देश्य युवाओं में इस विद्या के ओर आकर्षित करना है। इस संस्था के द्वारा प्रशिक्षित युवाओं के दल ने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत रविंद्र भवन ऑडिटोरियम में अपनी कला का प्रदर्शन किया हुआ है इस संस्था के प्रशिक्षक रहे स. मेहर सिंह ने पटियाला में हिंसा पर उतारू शेर को मार गिराया था उनके इस साहसिक कार्य पर सरकार ने उन्हें पुरस्क्कृत भी किया था।

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थाना भवन में मोहर्रम के अवसर पर अखाड़ा अजीमुद्दीन के कार्यकर्ता अपने उस्ताद के नेतृत्व में मोहर्रम के जुलूस में तलवारबाजी, लाठी चलाना और बल्लम आदि चलाने का सुंदर प्रदर्शन करके भारतीय शस्त्र विद्या का परिचय पेश करते हैं। इनके साथ साथ इस अखाड़े के शागिर्द हैरतअंगेज प्रदर्शन करके दिखाते हैं। लाठियां और तलवार चलाने में माहिर अकेले ही एक व्यक्ति कई लोगों को परास्त करने का सुंदर प्रदर्शन करके दिखाता है।

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