अंबेहटा
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सहारनपुर जनपद का अंबेहटा कस्बा जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर स्थित है।

पीरों की नगरी के नाम से पूरे देश में विख्यात अंबेहटा को बादशाह फिरोजशाह तुगलक के सिपहसालार असदुल्लाह ने फौज की छावनी के रूप में बसाया था।

अंबेहटा के नाम के संबंध में बहुत सी बातें कही जाती हैं। लेकिन अंबेहटा नाम पड़ने के बारे में कहा जाता है की पुराने समय में यहां पर आम के पेड़ बहुतायत में थे जो कि आज भी यहां आम के बाग बड़ी संख्या में है। इसलिए इसको आम हटा कहते थे। जो बाद में अपभ्रंश हो कर अंबेहटा कहलाया जाने लगा।

अंबेहटा कस्बा बसने के लगभग 300 साल बाद हजरत शाह अबुल माली यहां आकर बसे और उन्होंने इस नगर में तालीम, तहजीब और संस्कृति की एक नई लहर पैदा की।
हजरत अबुल माली साहब एक पहुंचे हुए पीर थे। इसलिए उनकी याद में अंबेहटा के आगे पीरजादगान शब्द जुड़ गया।

ऐसे अनेक सूफी संतों की दरगाहें और निशानियां यहां स्थित है। जिन्होंने सारे हिंदुस्तान को प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया।

दुनिया भर में प्रसिद्ध यहां के सूफी हजरत शाह अबुल माली की दरगाह अंबेहटा नगर के बिल्कुल बीच में मोहल्ला खानगाह में स्थित है। दरगाह से लाखों-करोड़ों लोग अपनी मन्नतें पूरी करते हैं। हर जुम्मेरात को दिन ढलने के पश्चात महफिल ए कव्वाली शुरू होती है। जिसकी मनमोहक आवाजें सुनने वाले को बरबस ही अपनी और खींच लेती हैं। महफिल ए कव्वाली में सभी वर्गों के लोग बिना किसी भेदभाव के शामिल होते हैं।

इस दरगाह पर हर साल एक विशाल मेला लगता है। जिसे उर्स ए शरीफ के नाम से देश विदेश में जाना जाता है। बड़ी संख्या में देश विदेश के जायरीन इस उर्स में शिरकत करने आते हैं। उर्स के आखिरी दिन हजरत शाह साहब के तबर्रूकात प्रदर्शित किए जाते हैं। इस दिन मो. खानगाह में इतनी भीड़ होती है कि तिल रखने की भी जगह नहीं होती चारों ओर सिर ही सिर दिखाई देते हैं।

इस ऐतिहासिक दरगाह के विषय में अनेक आश्चर्यजनक बातें बताई जाती हैं जो समय-समय पर सामने आती हैं। मुस्लिमों के प्रसिद्ध तीर्थ अजमेर शरीफ के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स के अवसर पर भाग लेने वाले अकीदतमंदो के लिए यह आवश्यक होता है कि वह पिरान कलियर, अंबेहटा, गंगोह में सलाम करें और उसके बाद ही जियारत के लिए अजमेर शरीफ जाएं। ऐसा करके ही उन्हें पूरा सवाब मिलता है।

इस दरगाह की प्राचीन इमारत पूरे हिंदुस्तान में मशहूर है। किसी अन्य दरगाह की इमारत इस दरगाह जैसी खूबसूरत नहीं है। इस इमारत को बादशाह फिरोजशाह तुगलक के वजीरे आलम रोशनुद्दौला ने शाह के शागिर्द मीरां जी द्वारा तामीर करवाया था।

अंबेहटा में आज भी हजरत शाह अबुल माली के अनेक वंशज मौजूद है जिन्हें यहां पीरजादा कहा जाता है यह आज भी विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों में शिरकत कर साहब के नाम को चार चांद लगा रहे हैं

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अंबेहटा में प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर श्री रामचंद्र जी महाराज एवं प्राचीन श्री रायवाला मंदिर भी हिंदुओं और आर्य समाज की कुछ गिनी चुनी प्रमुख भवनों में शामिल हैं।

अंबेहटा में जैन समाज का भव्य जिनालय आस्था का केंद्र है।

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यहां के बारे में एक आश्चर्यजनक सत्य बात है जिसके बारे में बताया जाता है कि संसार के मानचित्र पर ऐसा कोई देश नहीं है। जहां पर इस नगरी की जनता की वंशवेल का कोई न कोई अंकुर उपस्थित न हो।

यहां के लोगों की अक्लमंदी और होशियारी के संबंध में बताया जाता है कि मुगल काल में बादशाह जहांगीर को उसके गुप्तचर विभाग ने यह गुप्त रिपोर्ट दी थी कि अंबेहटा के लोग इतने पढ़े लिखे और होशियार हैं कि अगर उनको दरबार या हुकूमत में कोई ऊंचा ओहदा दे दिया गया तो वह हुकूमत पर भी कब्जा जमा लेंगे।

इस नगर ने बड़े-बड़े समझदार और पढ़े लिखे लोगों को जन्म दिया। जिन्होंने इस कस्बे की प्रसिद्धि में चार चांद लगाए।
ऐसे ही लोगों में एक नाम मुंशी मोहम्मद अला का आता है। जिन्होंने अपने बाग में एक स्कूल की स्थापना की जो धीरे-धीरे बाद में एक इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी बन गई। और बाद में सरकार ने भी इस यूनिवर्सिटी की डिग्री को मान्यता प्रदान कर दी। इस यूनिवर्सिटी से डिग्री पाने वाले छात्रों को बड़े सम्मान के साथ देखा जाता था। यहां से डिग्री लेने वाले विद्यार्थी दुनिया के हर कोने में जाकर इंजीनियर बने। लेकिन देश के बंटवारे की नजर इस यूनिवर्सिटी को ऐसी लगी कि इसका नामोनिशान मिट गया।

मशहूर उर्दू शायर इकबाल अजीम का जन्म यहीं पर हुआ। इसी नगर में जन्म लेने वाले हाजी शाह रशीद अहमद साहब उर्दू के मशहूर शायर हुए। जिन्होंने हजरत मौ. साहब की जीवन गाथा और इस्लामिक इतिहास को पद के रूप में लिखकर शाहनामा – ए – इस्लाम के नाम से प्रकाशित करवाया।

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