_____________________________________________________ जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत) के लगभग १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारियों से संबंधित एक स्थान के बारे में – – –

_____________________________________________कोटद्वार (उत्तराखंड) के समीपवर्ती ‘दुगड्डा’ नगर से भारत माता के वीर सपूत शहीद चंद्रशेखर आजाद की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। चंद्रशेखर आजाद जुलाई सन 1930 में कुछ समय के लिए दुगड्डा से 4 कि.मी. दूर एक छोटे से गांव ‘नाथुपुर’ आए थे। उस समय यहां रहते हुए उन्होंने अपने नए क्रांतिकारी साथियों को न केवल बंदूक और पिस्तौल चलाने का प्रशिक्षण दिया था बल्कि उनके अंदर क्रांति का बीज भी बोया।

चंद्रशेखर आजाद की दुगड्डा यात्रा की कहानी भी दिलचस्प है। क्रांतिकारियों ने भारत की स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्रांति की आवश्यकता को महसूस करते हुए बम बनाने की फैक्ट्री खोलने का निश्चय किया। इस उद्देश्य के लिए धन की आवश्यकता थी। रुपयों का प्रबंध करने के लिए 1 जुलाई 1930 को रेलवे के इम्पीरियल बैंक में जमा होने वाली एक लाख रुपयों की धनराशि को लूटने का निश्चय किया गया, लेकिन इसी दिन पंडित मोतीलाल नेहरू की गिरफ्तारी के विरोध में राष्ट्रव्यापी हड़ताल होने से इस कार्य को अंजाम नहीं दिया जा सका। तब इसी दिन रात के समय चांदनी चौक के गड़ोदिया स्टोर में डकैती डाली गई जिसमें 17 हजार रुपए मिले। इस कार्य में चंद्रशेखर आजाद और विद्याभूषण, काशीराम, विशंभर दयाल, धन्वतरी, लेख राम, यशपाल और भवानी सिंह रावत आदि उनके क्रांतिकारी साथी शामिल थे।

दिल्ली की इस डकैती की घटना के बाद पुलिस की सक्रियता बहुत बढ़ गई। इसके चलते चंद्रशेखर आजाद को कुछ समय गुप्त प्रवास करने के लिए एक ऐसे निरापद निर्जन और एकांत स्थान की आवश्यकता महसूस हुई,जहां वे सुरक्षित रहने के साथ-साथ अपने साथियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी दे सकें। तब उनके विश्वस्थ साथी भवानी सिंह ने आजाद के सम्मुख दुगड्डा के नजदीक अपने गांव नाथुपुर चलने का प्रस्ताव रखा। यह इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था इसलिए आजाद को उनका सुझाव पसंद आ गया।

भवानी सिंह रावत चंद्रशेखरआजाद के अत्यंत विश्वासपात्र साथी थे, इनका जन्म पौढ़ी गढ़वाल में हुआ था। भवानी सिंह के पिता नाथो सिंह अंग्रेज फौज में अफसर थे। सेवानिवृत्ति के बाद अंग्रेजों ने उनकी वफादारी के फलस्वरूप ऑनरेरी कैप्टन की पदवी के साथ उन्हें दुगड्डा के पास के जंगल मे 20 एकड़ जमीन जागीर के रूप में दी। नाथो सिंह ने जमीन को गांव के रूप में आबाद कर लिया। गांव का नाम भी उनके नाम पर नाथुपुर पड़ा।

भवानी सिंह ने बचपन में अपने पिता के साथ सैनिक छावनियों में रहते हुए भारतीयों के प्रति अंग्रेजों के बुरे व्यवहार को देखा था। इससे उनके मन में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश पनपने लगा था।

चंदौसी में रहते हुए भवानी सिंह ने हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दिल्ली के हिंदू कॉलेज में प्रवेश लिया। हिंदू कॉलेज उस समय सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, जयदेव शिव वर्मा आदि क्रांतिकारियों की गतिविधियों का केंद्र था। यहां भवानी सिंह इन प्रमुख क्रांतिकारियों के संपर्क में आए और वे चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाले हिंदुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ के सक्रिय सदस्य बन गए।

जुलाई 1930 के दूसरे सप्ताह में चंद्रशेखर आजाद भवानी सिंह के साथ कोटद्वार-दुगड्डा होते हुए नाथुपुर पहुंचे। उनके साथ उनके साथी मुरारी लाल, छैल बिहारी, विद्याभूषण, हरकेन सिंह, विशम्भर दयाल भी थे।

नाथुपुर पहुंच कर चंद्रशेखर आजाद में अपने साथियों को निशानेबाजी का गहन प्रशिक्षण दिया। आजाद और उनके साथियों ने एक सप्ताह तक तीन हजार फिट की ऊंचाई पर स्थित सघन साल के जंगल में शस्त्र चालन व निशानेबाजी का अभ्यास किया। कई दिनों तक वह शांत जंगल प्रशिक्षण के दौरान बंदूक से चलने वाली सांय- सांय करती गोलियों की आवाज से गूंजता रहा।

अपने साथियों को कई दिनों तक गहन प्रशिक्षण देने के बाद जब चंद्रशेखर आजाद को यह विश्वास हो गया कि उनके साथी निशाना लगाने में पारंगत हो गए हैं तब उन्होंने नाथुपुर से दिल्ली लौटने का निश्चय किया।

लौटने के समय क्रांतिकारी विशंभर दयाल के आग्रह करने पर चंद्रशेखर आजाद ने एक कुकाट के पेड़ पर अपनी निशानेबाजी का प्रदर्शन करते हुए छह गोलियां दागी थी। आज भी जर्जर होता वह पेड़ वहीं खड़ा है और उसके तने में आजाद के द्वारा दागी गोलियां धंसी हुई विद्यमान हैं।

आजाद के साथी भवानी सिंह ने अपने जीवन काल में इस ऐतिहासिक धरोहर को अक्षुण्ण रखने के काफी प्रयास किए। उन्होंने इस वृक्ष के चारों ओर एक पक्का चबूतरा बनवाया और वन विभाग एवं जिला प्रशासन के सहयोग से आसपास की भूमि पर वृक्षारोपण कराकर इसे ‘आजाद स्मारक’ घोषित कराया।

भवानी सिंह ने स्वयं के प्रयासों से चंद्रशेखर आजाद की उत्तराखंड की एकमात्र नाथुपुर दुगड्डा यात्रा की स्मृति को चिरस्थाई रखने के लिए चंद्रशेखर आजाद के बलिदान दिवस 27 फरवरी को ‘दुगड्डा’ में प्रतिवर्ष एक समारोह के आयोजन की परंपरा स्थापित की। इस समारोह को व्यवस्थित रूप देते हुए प्रतिवर्ष ‘शहीद मेले’ का आयोजन किया जाता है।

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