___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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सूर्य मंदिर – अमादलपुर गांव

यमुना नदी के निकट ही महाभारतकालीन यह स्थान हरियाणा के यमुनानगर जनपद में धातुउद्योग नगरी जगाधरी से मात्र ६ कि.मी. दूर स्थित है।

पौराणिक समय में यह स्थान सिंधुवन का प्रसिद्ध ‘कामायकवन’कहलाता था। सुंदर, मनोहर एवं रमणीक प्रदूषण रहित वातावरण में यहां इस क्षेत्र का प्राचीन सूर्यनारायण मंदिर एवं सूर्यकुंड है।

मान्यता है कि द्वापर युग में सूर्यवंश के राजा सुमित्र ने अपने कुल के इष्टदेव भगवान सूर्यनारायण जी को तपस्या से प्रसन्न किया एवं उनकी आज्ञा से सूर्यनारायण के भव्य मंदिर को बनवाया।

यह भी माना जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इस स्थान पर बिताया था। इस दौरान अर्जुन भगवान शंकर से पाशुपत्यास्त्र लेने कैलाश पर्वत गए और भगवान शंकर को प्रसन्न करके यह अस्त्र प्राप्त किया। अर्जुन के कहने पर भगवान शंकर ने उन्हें स्वरूपाकार शिवलिंग दिया। उस शिवलिंग की अर्जुन ने इसी स्थान पर स्थापना करके पूजा अर्चना की। यहां के ग्रामीणों का कहना है कि पांडवों द्वारा शिव मंदिर का निर्माण एक ही रात में किया गया था।

यह भी मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन यहां वन में बिहार करते हुए यमुना जी के किनारे आए। उन्होंने यहां तपस्या में लीन एक कन्या को देखा। श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने उस कन्या के पास जाकर तपस्या करने का कारण पूछा। उस कन्या ने अर्जुन को बताया कि मैं सूर्य भगवान की पुत्री कालिंदी हूं और भगवान श्री कृष्ण को अपना पति बनाने के लिए तपस्या कर रही हूं। यहां से श्री कृष्ण उसे अपने साथ इंद्रप्रस्थ ले आए और उसके साथ पाणीग्रहण करके अपनी पटरानी बनाया। कालिंदी (यमुना) भगवान श्रीकृष्ण की 8 पटरानियों में से एक है।

आदि गुरु शंकराचार्य जी ने भी इस स्थान पर आदिबद्री तीर्थ का जीर्णोद्धार करने के बाद लौटते समय विश्राम किया था।

इस मंदिर की विशेषता है कि मंदिर का निर्माण ज्योतिष एवं वास्तु के अनुसार ऐसे विशेष कोण से कराया गया है कि सूर्य की पहली किरण मंदिर में स्थापित भगवान सूर्य देव की प्रतिमा पर पड़े।

मंदिर के पास ही पुरातन सूर्यकुंड है। यह सूर्य भगवान की कृपा है कि कुंड का जल सदैव गर्म ही रहता है। सूर्य कुंड में स्नान करने से यह भी माना जाता है कि इस कुंड में स्नान करने से शारीरिक चर्मरोग आदि ठीक हो जाते हैं।

श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र सूर्य नारायण मंदिर में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते हैं।

प्राचीन काल में यहां सुग विश्वविद्यालय था जिसका वर्णन प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टॉड ने भी अपनी पुस्तक में किया है।

शताब्दियों तक इस क्षेत्र में विदेशी आक्रांताओं ने लूटपाट और विध्वंस किया। औरंगजेब के समय में भी यह पौराणिक स्थल उनके विध्वंस का शिकार हुआ। मंदिर को तोड़ा गया तथा सूर्यनारायण भगवान की अष्टधातु की प्रतिम को उखाड़ कर आक्रांता अपने साथ ले गए।

कई दशक पहले इस मंदिर का जीर्णोद्धार ग्रामीणों के सहयोग से श्री अखिलानंद ब्रह्मचारी जी द्वारा कराया गया। यहां श्री सूर्य नारायण जी, श्री लक्ष्मी नारायण जी, श्री हनुमान जी आदि की भव्य देव प्रतिमाओं की स्थापना की गई।

इस स्थान पर प्रतिवर्ष सूर्यषष्टि अर्थात भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन दो दिवसीय मेला लगता है।

पितृ शांति के लिए इस स्थान पर पिंड दान करना फलदायक माना गया है। फल्गु तीर्थ एवं गयाजी तीर्थ की तरह अमावस्या एवं संक्रांति की पुण्य तिथि के दिन श्रद्धालु यहां आते हैं।

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