___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प.भारत)के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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आचार्य पंडित सीताराम चतुर्वेदी
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देश के जाने-माने विद्वान हिंदी साहित्य की विविध कलाओं कविता, नाटक, आलोचना तथा पौराणिक सांस्कृतिक ग्रंथों के प्रणेता आचार्य पंडित सीताराम चतुर्वेदी मूर्धन्य साहित्यकार ही नहीं बल्कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व के रूप में देश को दुनिया में जाने जाते थे।

24 साल तक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी के निजी सचिव रहे आचार्य जी को मालवीय जी का जीवन दर्शन ऐसा भाया कि वह उन्हीं के होकर रह गए। उनके निजी सचिव बने और 5 जून 1937 मालवीय जी के जीवन के 75 वर्ष पूरे होने पर उनके जीवन पर ग्रंथ की रचना और संपादन किया था।

आचार्य सीताराम चतुर्वेदी जी का जन्म वाराणसी में 27 जनवरी 1907 को पंडित भीमसेन चतुर्वेदी के यहां हुआ था। उनके पिता बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में धर्म शास्त्र विभाग में प्राध्यापक थे। मुजफ्फरनगर से उनका पैतृक संबंध था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी मुजफ्फरनगर में हुई। शहर के भौरों के मंदिर की संस्कृत पाठशाला में शुरुआती अध्ययन के बाद हाई स्कूल की परीक्षा उन्होंने यहीं से उत्तीर्ण की।

सन 1920 में उन्होंने पंडित मदन मोहन मालवीय जी को मुजफ्फरनगर में पहली बार देखा और वह उनसे इतने प्रभावित हुए कि आगे की पढ़ाई के लिए पंडित जी के साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय चले गए।

काशी से ही उन्होंने एलएलबी और बीटी किया तथा हिंदी संस्कृत, पाली और प्राचीन भारतीय संस्कृति तथा इतिहास में एमए तथा संस्कृत साहित्याचार्य की उपाधि भी यहीं से प्राप्त की।

आचार्य सीताराम चतुर्वेदी जी हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के बड़े विद्वान तथा नाट्यशास्त्र, संगीत सहित अनेकानेक विधाओं के ज्ञाता थे। अध्यापन के साथ ही खेल, संगीत, गायन और वादन में भी उनका काफी दखल था। संपूर्ण कालिदास साहित्य का हिंदी अनुवाद चतुर्वेदी जी की ही देन है।

चतुर्वेदी जी ने देश के विभिन्न शिक्षा संस्थानों में अध्यापन कार्य किया। शुरुआत में वह सेंट्रल हिंदू स्कूल कामाच्छा वाराणसी में अध्यापक हुए। उनकी संगीत, गायन, वादन के ज्ञान के कारण काशी हिंदू विश्वविद्यालय के टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में उन्हें पहले संगीत शिक्षक और बाद में प्रवक्ता बनाया गया।

चतुर्वेदी जी सन 1946 में मुंबई के भारतीय विद्या भवन में हिंदी व पाली के विभागाध्यक्ष बने। 1950 में बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में प्राचार्य और 1957 से 1962 तक मुरली मनोहर टाउन डिग्री कॉलेज में प्राचार्य रहे तथा बाद में बिन्नी विद्या मंदिर कोलकाता के निदेशक हुए।

बाद में वह वाराणसी आए और साहित्य साधना में रम गए। सन1980 में चतुर्वेदी जी मुजफ्फरनगर लौट आए और यहां अंतिम समय तक रहकर साहित्य साधना करते रहे।

चतुर्वेदी जी ने सैकड़ों नाटक, उपन्यास, कहानी, जीवन चरित्र, प्रबंध काव्य, धार्मिक कथा और समीक्षाशास्त्र, साहित्यशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, धर्म, अध्यात्म, दर्शन व रंगमंच आदि विषयों पर लगभग 300 पुस्तकों का लेखन किया तथा समीक्षा ग्रंथ आदि लिखे।

कई पीढ़ियों के उनके सुप्रसिद्ध शिष्यों में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई, चंद्रशेखर, लता मंगेशकर, पंडित राम बहोरी शुक्ल, डॉं.हरिवंश राय बच्चन, पंडित करुणापति त्रिपाठी, शिव प्रसाद मिश्र, रुद्र काशीकेय, मोती बीए, निरंकार देव सेवक, डॉ.किशोरी लाल गुप्त, डॉ.केदारनाथ शुक्ल, डॉ.भगवती प्रसाद सिंह, डॉ.रामलाल सिंह, डॉ.कृष्णदेव प्रसाद उपाध्याय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

आचार्य सीताराम चतुर्वेदी जी अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के शिक्षा मंत्री भी रहे थे।

वह अयोध्या प्रसाद उपाध्याय, जयशंकर प्रसाद, बाबू श्याम सुंदर दास, मुंशी प्रेमचंद जैसे उच्च कोटि के साहित्यकारों के अंतरंग मित्र थे।

चतुर्वेदी जी क्रांतिकारियों के भूमिगत समाचार पत्रों रणभेरी और शंखनाद के संपादक भी रहे।

चतुर्वेदी जी की विद्वता से प्रभावित होकर महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें वर्ष 1934 में अपना निजी सचिव बनाया था और तभी से पंडित जी मालवीय जी के अंतिम दिनों तक उनके हर कार्य में सहयोगी रहे।

उन्होंने आजादी के आंदोलन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस सहित अनेक क्रांतिकारियों के साथ काम किया था। चतुर्वेदी जी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अनन्य मित्र थे। पंडित मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू से उनका संपर्क रहता था।

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