_______________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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शामली जनपद के जलालाबाद कस्बे से आचार्य धौम्य एवं उनके शिष्य आरुणि की कथा जुड़ी हुई है। यह कथा प्राचीन ग्रंथ उपनिषदों में वर्णित है।

ये आरुणि वही हैं जिनके जीवन की एक घटना को देश के हर बच्चे को कभी ना कभी स्कूली शिक्षा में बता दिया जाता है।

वैदिक काल में आचार्य धौम्य का आश्रम आज के समय में जहां जलालाबाद कस्बा है,इसी क्षेत्र में ही स्थित था।

उन दिनों यहां आचार्य धौम्य का आश्रम था। आचार्य धौम्य अपने शिष्यों को ज्ञान और पुरुषार्थ दोनों ही प्रकार की शिक्षा प्रदान करते थे। इसलिए उनके पास साधन संपन्न और निर्धन दोनों ही वर्गों के शिष्य शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। आचार्य ऋषि धौम्य बिना किसी भेदभाव के समान रूप से अपने विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते थे। आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाने के लिए आचार्य धौम्य ने अपने शिष्यों को कृषि कार्य करने की आज्ञा दी थी। आचार्य धौम्य के शिष्यों की योग्यता का कोई मुकाबला नहीं था, फिर भी आचार्य धौम्य उनमें से भी किसी योग्य शिष्य को तलाशते रहते थे।

एक दिन बहुत भीषण वर्षा हुई। तेज वर्षा से जल और थल का भेद भी मिटने लगा था। आचार्य धौम्य अपने सभी शिष्यों के साथ चिंतित खड़े वर्षा रुकने की प्रतीक्षा कर रहे थे। लेकिन वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

ऋषि धौम्य को भीषण वर्षा के कारण पानी के तेज बहाव से खेतों की मेढ़ खराब हो जाने और उससे फसल नष्ट हो जाने की चिंता थी। इसके लिए पानी के बहने से खेतों की टूटी मेढों की मरम्मत करने की आवश्यकता थी। जिससे फसल को नष्ट होने से बचाया जा सके।

लेकिन अंधियारी रात का समय और भीषण वर्षा में खेतों में जाकर यह कार्य करने के लिए कोई तैयार नहीं था। तब आरुणि ने आगे बढ़कर यह कार्य करने के लिए गुरुदेव से आज्ञा मांगी। आचार्य घौम्य ने आरुणि से कहा कि मैं तुम्हें अकेले जाने की आज्ञा नहीं दे सकता। आरुणि ने दृढ़ता से गुरुदेव से कहा कि आप ही तो कहते हैं, बिना प्रयास किए हार नहीं माननी चाहिए फिर मैं इस वर्षा से कैसे हार मान सकता हूं। गुरु धौम्य ने आरुणि के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। आरुणि ने गुरु के मौन को उनकी स्वीकृति माना और वह उस भयानक रात्रि में वर्षा की चिंता किए बगैर अकेला ही खेतों की ओर निकल पड़ा।

आरुणि जब खेतों पर पहुंचा तो उसने देखा तेज वर्षों से खेतों की मेंढ में दरारें आ गई है। आरुणि ने अपनी संपूर्ण शक्ति लगाकर मिट्टी एकत्रित की और खेत की मेंढ की दरारों में भर दी लेकिन एक स्थान पर आरुणि के बार-बार मिट्टी से भरने पर भी वर्षा के पानी के तेज बहाव से वह दरार और भी बड़ी होती जा रही थी। उसके सभी प्रयास निष्फल हो रहे थे। तब वह स्वयं ही उस स्थान पर लेट गया। इससे पानी का बहना रुक गया।

उस अंधियारी रात और घनघोर वर्षा में पूरी रात्रि आरुणि उस स्थान पर वैसे ही लेटा रहा। प्रातः काल जब अपने इस शिष्य आरुणि को ढूंढते हुए गुरु धौम्य खेतों पर आए, गुरुदेव ने आरुणि को खेत की मेड पर लेटे हुए देखा तो उनके आंसू निकल आए और खुशी के मारे कहने लगे उद्दालक, उद्दालक।

वर्षा और ठंड के कारण आरुणि का पूरा शरीर अकड़ गया था। लेकिन गुरुदेव के द्वारा उसके सिर पर प्रेम से हाथ फेरने पर उसमें चेतना लौट आई।

जिस धैर्य और सहनशक्ति से आरूनी ने खेतों की रक्षा की थी और आश्रम को बचाया, वह आश्रम का उद्धारक माना गया और इस उद्धारक शब्द को ही तब की प्रचलित बोली के आधार पर उद्दालक कहकर गुरु धौम्य ने आरुणि को नया नाम दे दिया – उद्दालक आरुणि।

उद्दालक आरुणि उस समय के बहुत बड़े दार्शनिक थे।

उद्दालक आरुणि ने ‘तत्वमसि’ नामक महावाक्य इस देश को दिया है।

उद्दालक आरुणि ही नहीं इनका पूरा कुटुंब ही दार्शनिकों का था इनके पिता अरुण औपवेशि गौतम भी उस समय के विचारकों में एक थे।

आरुणि उद्दालक के दो पुत्र – श्वेतकेतु और नचिकेता तो अपने पिता आरूनी से भी विद्वता और ख्याति में चार कदम आगे थे।

इनकी बेटी सुजाता का विवाह कहोल से हुआ था। कहोल वही थे जिन्होंने महाराजा जनक की ब्रह्मसभा में याज्ञवल्क्य से भरी सभा में एक बड़ी बहस की थी। उद्दालक आरुणि के दौहित्र यानी सुजाता और कहोल के पुत्र अष्टावक्र थे। यही अष्टावक्र जब राजा जनक की ब्रह्मसभा में गए तब वहां उपस्थित विद्वानों ने उनकी कुरूपता का उपहास किया। तब अष्टावक्र ने अपनी प्रतिभा का सिक्का महाराजा जनक के ब्रह्मसभा में जमाया था।

उद्दालक आरुणि द्वारा कहा गया महावाक्य ‘तत्वमसि’ सहस्रादियों से भारत की हर विचारधारा का महावाक्य बन गया।

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