___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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आचार्य अभय देव –

भारत में अंग्रेजों के शासन के दौरान आजादी के दीवाने और अपनी वेदज्ञ वाणी और साहित्य सर्जन से समाज में चेतना का संचार कर देने वाले तपस्वी आचार्य अभय देव का जन्म चरथावल कस्बा में सन 1896 में हुआ था।

इनका बचपन का नाम देव शर्मा था। कुशाग्र बुद्धि के धनी देव को 7 वर्ष की आयु में ही उनके पिता स्वामी श्रद्धानंद द्वारा स्थापित हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी में छोड़ आए थे।गुरुकुल में देव जल्दी ही गुरुओं के प्रिय बालक बन गए थे। गुरुकुल में वेदों की शिक्षा के साथ ही योग साधना को भी इन्होंने अंगीकृत कर लिया था।

इनके तेजस्वी व्यक्तित्व एवं उनमें छिपी की आभा स्वामी श्रद्धानंद की परख में आ गई और उन्होंने देव का ‘अभय’ नामकरण कर दिया। देव में छिपी क्षमताओं को देखकर स्वामी श्रद्धानंद ने उन्हें वही गुरुकुल कांगड़ी में उपाध्याय के रूप में नियुक्त कर लिया। स्वामी श्रद्धानंद के सानिध्य में गुरुकुल कांगड़ी में विद्यार्थियों के निर्माण का लक्ष्य रहा हो या उस समय के नौजवानों में स्वदेशी की भावना को जागृत करना। हर जिम्मेदारी और दायित्व को इन्होंने पूरी निष्ठा से निभाया।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गुरुकुल कांगड़ी में आए महात्मा गांधी भी अभय देव की ज्ञान ज्योति से सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सके।

गुरुकुल से महात्मा गांधी अभय देव से इतना प्रभावित होकर लोटे कि विदा होने से पहले उन्हें वर्धा आश्रम में आने का निमंत्रण दे दिया।

वर्धा में दिए गए आचार्य अभय देव के ओजस्वी व्याख्यानों की छाप बापू के हृदय में जीवन भर समाई रही। वर्धा आश्रम में दिए गए उनके ओजस्वी व्याख्यानों को बापू कभी नहीं भुला पाए। इसका उल्लेख स्वयं बापू ने अपनी आत्मकथा में भी किया है।

आचार्य जी से महात्मा गांधी कितने प्रभावित थे इसका पता इससे चलता है कि उन्होंने उन्हें तीन बार साबरमती आश्रम में मिलने के लिए बुलाया था।

बापू के बुलावे पर सन 1928 में अभय देव 31 जनवरी से 22 फरवरी तक साबरमती आश्रम में रहे। इस समय बापू ने उनसे 4 दिन तक एकांत साधना का विधिवत प्रशिक्षण लिया था।

इस महान योगी की योग्यता का लोहा उस समय के क्रांतिकारी और अहिंसा वादी दोनों मानते थे।

आचार्य अभय देव की योग विद्या ने सरदार भगत सिंह तब को प्रभावित किया था। ब्रिटिश सरकार को भगत सिंह की तलाश थी, उस समय आचार्य जी गुरुकुल कांगड़ी में अध्यापन करते थे। रात में भगत सिंह आचार्य जी से मिले। भगत सिंह ने अंग्रेजों द्वारा यातनाएं देने के बाद भी कुछ नहीं उगलवाने की योग विद्या गुरुकुल कांगड़ी में आचार्य अभय देव से पूछी थी।

आचार्य जी ने अपनी आत्मकथा में भी स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह और गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ लंबे सानिध्य का उल्लेख किया है। आचार्य जी ने सरदार भगत सिंह के बारे में लिखा है कि उस 23 साल के नौजवान में बहुत सरलता थी। आचार्य जी की भगत सिंह से दो बार मुलाकात हुई थी।

स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री जी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान चरथावल क्षेत्र के ही बिरालसी गांव के गुरुकुल में शिक्षक थे। उस समय अभय देव ने लाल बहादुर शास्त्री जी के संग गांव-गांव आजादी के आंदोलन की अलग भी जगाई थी।

देश को आजादी मिलने के बाद भी आचार्य जी केवल भारतीय संस्कृति के संवर्धन के लिए ही समर्पित रहे। लेकिन उनका अपने साथियों शास्त्री जी, गोविंद बल्लभ पंत और राजेंद्र बाबू से वैचारिकता संबंध बना रहा।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें महात्मा गांधी स्वामी श्रद्धानंद और सरदार भगत सिंह का स्नेह मिला था। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी भी उनकी योग साधना से प्रभावित थे।

स्वतंत्रता के बाद अभय देव महर्षि अरविंद के पांडिचेरी आश्रम से जुड़ गए थे। वैदिक साहित्य सर्जन में जुटे अभय देव वर्षों तक वहां सेवा कार्य के बाद माता मीरा की स्वीकृति से सन 1950 में अपनी पि‌तृभूमि चरथावल लौट आए।

चरथावल आकर उन्होंने अरविंद निकेतन की स्थापना की।
यहां उन्होंने आध्यात्मिक की अलक जगाई उसका लोहा सारी दुनिया ने माना।

वैदिक साहित्य के सृजन में आचार्य जी ने नई ज्योति बिखेरी। ब्रह्मचर्य में तपे मनस्वी अभय देव देश के प्रकांड विद्वानों की प्रथम पंक्ति में शामिल हो गए।

वैदिक साहित्य में आचार्य अभय देव की कृतियां अमूल्य और अमर हैं।

उनकी ३६० वेदमंत्रों की व्याख्या पर आधारित ‘वैदिक विनय’पुस्तक की कीर्ति सर्वविदित है।

ब्रह्मचर्य गीत,ब्राह्मण की गऊ,यज्ञ और योग,तरंगित हृदय,एक योगयात्री की आत्मकथा समेत अनगिनत कृतियों में उनका ज्ञान वैभव झलकता है।

आचार्य अभय देव जब पांडिचेरी के महरिशी अरविंद आश्रम में रह रहे थे वहां उन्होंने ‘अदिति’ नामक पत्रिका का संपादन किया था। चरथावल में भी उन्होंने ‘वेदसुधा’ नामक एक मासिक पत्रिका निकाली थी।

आचार्य अभय देव ने भवानीपुरा और न्यामू गांव की अपनी भूमि को दान करके एक बड़ी गौशाला का निर्माण कराया था।

उन्होंने जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद जी से गोधन बढ़ाने की बात कही थी। राजेंद्र प्रसाद जी ने स्थानीय आश्रम में गौशाला के निर्माण के लिए 5 लाख रुपए का अनुदान दिया था जो उस जमाने में एक बड़ी रकम थी।

यह आचार्य जी की सादगी और ईमानदारी थी कि उन्होंने गौशाला निर्माण के बाद बचा हुआ पैसा सरकार को वापस कर दिया था। यह गौशाला उस समय की सबसे बड़ी गौशाला थी। आचार्य जी के समय में इस गौशाला का काफी विकास हुआ।

शारीरिक दुर्बलता के बावजूद कुशाग्र बुद्धि के धनी मोनव्रती के साधक आचार्य अभय देव बहुप्रचार से दूर ही रहते थे। दो दशकों तक उन्होंने क्षेत्र में आध्यात्मिक वैभव को फैलाया अपनी अंतिम सांस तक वे मोन प्रवृत्ति के पक्षधर रहे। महान योगी अभय देव ने 9 जनवरी 1970 को शरीर त्याग दिया।

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