____________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के लगभग १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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कुरुक्षेत्र की शास्त्रीय ४८ कोसीय परिक्रमा की परिधि में अमीन गांव एक महत्वपूर्ण स्थान और महाभारत युद्ध का साक्षी स्थल है।

अमीन गांव ही वह स्थान है जहां आचार्य द्रोणाचार्य और करण जैसे छहः प्रमुख कौरव पक्ष के महारथियों ने मिलकर अकेले अभिमन्यु का वध किया था। इसका महाभारत पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। संक्षेप में –

पितामह भीष्म ने महाभारत के युद्ध में १० दिन भीषण युद्ध किया। अर्जुन के बाणों के बिंध शरशय्या पर लेट जाने के बाद द्रोणाचार्य का सेनापति के पद अभिषेक हुआ।

महाभारत युद्ध के रण में पहुंचकर आचार्य द्रोण ने उस दिन अपनी सेना का शकट व्युह बनाया। धर्मराज युधिष्ठिर की पांडव सेना ने भी क्रौंच व्युह की रचना कर रखी थी। इसी समय यकायक महारथी द्रोण ने सारी सेना के बीच दुर्योधन से कहा-‘राजन तुमने मुझे सेनापति के पद पर प्रतिष्ठित किया है, इसलिए मैं तुम्हें उसके अनुरूप फल देना चाहता हूं। बताओ मैं तुम्हारा क्या काम करूं, तुम्हारी जो इच्छा हो मुझसे वर मांग लो’।
इस पर दुर्योधन ने कर्ण आदि अपने हितेषियों से सलाह करके आचार्य से कहा कि यदि ‘आप मुझे वर देना चाहते हैं तो युधिष्ठिर को जीवित पकड़ कर मेरे पास ले आइए।’

यह सुनकर द्रोणाचार्य ने कहा ‘तुम युधिष्ठिर को कैद करना ही चाहते हो किंतु दुर्योधन तुम्हें उन्हें मारवा डालने की इच्छा क्यों नहीं है।’

दुर्योधन ने कहा ‘आचार्य युधिष्ठिर के मारे जाने पर भी मेरी विजय नहीं हो सकती क्योंकि सब पांडवों को तो देवता भी नहीं मार सकते, इसलिए शेष पांडव में जो भी बच जाएगा वही हमारा अंत कर देगा। यदि धर्मराज युधिष्ठिर मेरे बंदी बन गए तो मैं उन्हें फिर जुए में जीत लूंगा और उनका अनुसरण करने वाले सब पांडव भी फिर से वन में चले जाएंगे। इस तरह बहुत दिनों तक के लिए फिर से मेरी जीत हो जाएगी इसलिए मैं किसी भी स्थिति में युधिष्ठिर का वध नहीं करना चाहता।’

द्रोणाचार्य बहुत व्यवहार कुशल थे उन्होंने दुर्योधन के कुटिल अभिप्राय को जानकर एक शर्त के साथ वचन दिया कि यदि ‘वीर अर्जुन ने युधिष्ठिर की रक्षा न की तो तुम युधिष्ठिर को अपना बंदी बना हुआ ही समझो।’
दुर्योधन ने द्रोणाचार्य की प्रतिज्ञा को स्थाई बनाने के लिए अपनी पूरी सेना में यह बात फैला दी कि द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को कैद करने की प्रतिज्ञा की है।
द्रोणाचार्य की प्रतिज्ञा के बारे में सुनकर कौरव सेना सिंहनाद करने लगी।

महाभारत के युद्ध में उस दिन पांडव और कौरव सेना के बड़े-बड़े महारथियों के बीच बड़ा ही अद्भुत युद्ध हुआ। मैदान में खून की नदी बहने लगी। युधिष्ठिर की रक्षा के लिए अर्जुन के उनके पास उपस्थित रहने पर द्रोणाचार्य धर्मराज युधिष्ठिर को उस दिन के युद्ध में कैद नहीं कर पाए। सूर्यास्त होने पर दोनों और की सेना अपने अपने शिविर में लौट आई।

सेना के अपने शिविर में लौटने के पश्चात आचार्य द्रोण ने अत्यंत खिन्न होकर संकोच के साथ दुर्योधन से कहा की अर्जुन की उपस्थिति में युधिष्ठिर को देवता गण भी कैद नहीं कर सकते यदि तुम किसी उपाय से अर्जुन को दूर ले जा सको तो युधिष्ठिर तुम्हारी कैद में आ सकते हैं।
आचार्य द्रोण की बात सुनकर निगर्त्तराज और उनके भाइयों ने कहा कि-‘अर्जुन हमें हमेशा नीचा दिखाता रहता है उसकी बातों से हम दिन-रात क्रोध की ज्वाला में जलते रहते हैं हम प्रतिज्ञा करते हैं कि अब पृथ्वी पर या तो अर्जुन ही रहेगा या फिर त्रिगर्त्त ही नहीं रहेंगे’। पांचो त्रिगर्त्त भाइयों ने अग्नि को साक्षी करके यह दृढ़ प्रतिज्ञा की।

पांचों त्रिगर्त्त भाइयों ने अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारा। उनकी युद्ध करने की पुकार पर अर्जुन ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा-‘महाराज मेरा यह नियम है कि कोई मुझे युद्ध के लिए ललकारे तो मैं कदम पीछे नहीं रखता इसलिए आप मुझे इनका युद्ध में संहार करने का आदेश दीजिए’।

धर्मराज युधिष्ठिर के द्वारा द्रोणाचार्य की प्रतिज्ञा की बात कहने पर अर्जुन ने कहा- ‘राजन आज के युद्ध के समय यह सत्यजीत संग्राम में आपकी रक्षा करेगा इस पांचाल कुमार के रहते आचार्य द्रोण का मनोरथ पूर्ण नहीं होगा’।

युधिष्ठिर ने त्रिगर्त्त भाइयों से युद्ध करने के लिए अर्जुन को आज्ञा दे दी।
युद्ध में अर्जुन के पैने बाण त्रिगत्तौं की सेना को नष्ट कर रहे थे। इस युद्ध में दोनों ओर से अनेकों दिव्यास्त्रों का प्रयोग हुआ। युद्धक्षेत्र सब और लोथों से भर गया।

संशप्तकों के साथ लड़ने के लिए अर्जुन के चले जाने के बाद उस दिन के युद्ध में आचार्य द्रोण ने युधिष्ठिर को पकड़ने के लिए गरुड़ व्युह की रचना की। युधिष्ठिर ने भी उनसे मुकाबला करने के लिए अपनी सेना का मंडलार्धव्युह बनाया।

उस दिन के युद्ध में आचार्य द्रोण ने फिर युधिष्ठिर पर आक्रमण करके उन्हें बंदी बनाना चाहा लेकिन पांडव पक्ष के द्वारा उनकी सब प्रकार से बचाने के प्रयास किए गए। भीषण युद्ध में द्रोण पांडवों के वीर योद्धाओं को हराकर तेजी से युधिष्ठिर के सामने आ गए लेकिन युधिष्ठिर तेजी से घोड़ों को हंकवा कर अपने रथ को युद्ध क्षेत्र से बाहर ले गए। पांडव सेना ने लौटकर द्रोण को घेर लिया दोनों ओर से भीषण युद्ध हुआ आचार्य द्रोण को मरने से बचाने के लिए जैसा युद्ध हुआ वैसा उससे पहले कभी नहीं हुआ था।

उधर अर्जुन और त्रिगर्तों के बीच भीषण युद्ध में भगदत्त ने वैष्णवास्त्र का आवाहन कर उसे अभिमंत्रित करके अर्जुन की छाती पर चलाया। भगदत्त का अस्त्र सब का नाश करने वाला था। लेकिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ओट में करके उसे अपनी ही छाती पर झेल लिया। यह वैष्णवास्त्र नरकासुर को भगवान नारायण का दिया हुआ था जो नरकासुर के द्वारा भगदत्त को प्राप्त हुआ था। अतः अर्जुन की प्राण रक्षा के लिए अस्त्र की चोट श्री कृष्ण ने स्वयं सह ली और उसे व्यर्थ कर दिया।

श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा ‘अब भगदत्त के पास यह दिव्य अस्त्र नहीं रहा अतः इस असुर को तुम मार डालो। यह भगदत्त बहुत बड़ी आयु का होने के कारण इसकी पलकें ऊपर नहीं उठ पाती हैं। जिसके कारण इसकी आंखें बंद रहती हैं। आंखों को खुला रखने के लिए वह कपड़े की पट्टी से पलकों को ललाट में बांधे रखता है’।

श्री कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने बाण मारकर भगदत्त की सिर की पट्टी काट दी। उसके कटते ही भगदत्त की आंखें बंद हो गई। इसके बाद अर्जुन ने अर्धचंद्राकार बाण मारकर भगदत्त की छाती भेद दी, उसका ह्रदय फट गया और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। इस प्रकार अर्जुन ने उस युद्ध में इंद्र के मित्र भगदत्त का वध किया और कौरवों के अन्य अनेकों योद्धाओं का भी संहार किया।
दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता अर्जुन ने कौरव सेना का विध्वंस किया।
इधर द्रोणाचार्य अपने बाणों से पांडव सेना को छिन्न-भिन्न करने लगे। पांडव पक्ष के कई बड़े वीर योद्धा मारे गए। इतने में ही अर्जुन बहुत से संशप्तकों को जीतकर जहां द्रोणाचार्य पांडव सेना का संहार कर रहे थे, वहां आ पहुंचे और कौरव सेना को अपने शस्त्रों से परास्त करने लगे। इस प्रकार वहां दोनों पक्षों की ओर से महाभयानक संग्राम छिड़ गया। इतने में ही सूर्यास्त होने पर दोनों पक्षों की सेना अपने शिविर में लौट आई।

उस दिन दुर्योधन पांडवों का अभ्युदय देखकर उदास और कुपित हो रहा था।

दूसरे दिन सवेरे ही दुर्योधन ने सब योद्धाओं के सामने प्रेम और अभिमान के साथ द्रोणाचार्य से कहा- ‘हम लोग आपके शत्रुओं में से हैं तभी तो आपने युधिष्ठिर के सामने आ आने पर भी कैद नहीं किया। यदि आप उसे पकड़ना चाहते तो संपूर्ण देवता साथ लेकर भी पांडव आपसे उसकी रक्षा नहीं कर सकते। आपने प्रसन्न होकर पहले मुझे वरदान तो दे दिया परंतु बाद में उसे पूरा नहीं किया।

दुर्योधन के ऐसा कहने पर द्रोणाचार्य ने खिन्न होकर कहा- ‘तुम्हें ऐसा नहीं समझना चाहिए। मैं तो सदा तुम्हारा हित करने का प्रयास करता हूं। किंतु मैं क्या करूं अर्जुन जब युधिष्ठिर की रक्षा कर रहे हों तो संपूर्ण लोकों में कोई भी नहीं जीत सकता। जहां श्री कृष्ण और अर्जुन हैं वहां शंकर के सिवा और किसका बल काम कर सकता है।’

इतना कहकर द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा –

‘आज मैं युद्ध में पांडव पक्ष का कोई श्रेष्ठ महारथी का नाश करूंगा। आज के युद्ध में ऐसा व्युह बनाऊंगा जिसे देवता भी नहीं तोड़ सकते हां अर्जुन को किसी भी उपाय से यहां से दूर हटा दो क्योंकि युद्ध की ऐसी कोई भी कला नहीं है जो उसे ज्ञात न हो अथवा वह उसे कर न सके।’

द्रोणाचार्य के ऐसा कहने पर सप्तशकों ने अर्जुन को फिर से युद्ध के लिए ललकारा और वे अर्जुन को दक्षिण दिशा की ओर ले गए। वहां अर्जुन ने शत्रुओं के साथ घोर युद्ध किया।

इधर आचार्य द्रोण ने ‘चक्रव्यूह’ का निर्माण किया। इंद्र के समान पराक्रमी राजाओं को उस ‘चक्रव्यूह’ के महत्वपूर्ण स्थानों पर खड़ा किया। व्युह के अग्रभाग में द्रोणाचार्य के साथ जयद्रथ, अश्वत्थामा और अनेकों वीर खड़े थे।

द्रोणाचार्य द्वारा सुरक्षित उस सब ओर से अभेद व्युह पर भीमसेन को आगे कर पांडव सेना के महारथियों ने आक्रमण किया लेकिन द्रोणाचार्य के पराक्रम को देख उनका सामना करने के बारे में युधिष्ठिर ने बहुत विचार किया। द्रोणाचार्य का सामना करना दूसरों के लिए अत्यंत कठिन समझकर उन्होंने इस अत्यंत भारी कार्य का भार अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु पर रखा। अभिमन्यु अपने मामा श्री कृष्ण और पिता अर्जुन के समान ही कम पराकर्मी नहीं था। वह अत्यंत तेजस्वी और शत्रुओं का संहार करने वाला था।

युधिष्ठिर ने अभिमन्यु से कहा बेटा अभिमन्यु हम चक्रव्यूह भेदने का उपाय बिल्कुल भी नहीं जानते। इसे तो तुम, अर्जुन, श्रीकृष्ण अथवा प्रद्युम्न ही तोड़ सकते हैं। पांचवा कोई भी वीर इस काम को नहीं कर सकता। अतः तुम शस्त्रों के द्वारा द्रोणाचार्य के इस चक्रव्यूह को तोड़ डालो नहीं तो युद्ध से लौटने पर अर्जुन हम सबको ताना देंगे।

अभिमन्यु ने युधिष्ठिर से कहा यद्यपि यह व्युह अभेद्य है। मैं अपने पितृवर्ग की विजय के लिए इस व्युह में अभी प्रवेश करता हूं और अभिमन्यु ने कहा कि जब मैं माता के गर्भ में था उस समय पिताश्री ने माता को चक्रव्युह को तोड़ने का उपाय तो बताया था लेकिन निकलना नहीं बता पाए थे। मैंने उस समय गर्भ में ही चक्रव्यूह को तोड़ने का ज्ञान सुन लिया था। लेकिन यदि मैं वहां विपत्ति में पड़ गया तो फिर निकल नहीं सकुंगा।

युधिष्ठिर ने कहा वीरवर हम सब साथ चलेंगे जिस मार्ग से तुम जाओगे तुम्हारे पीछे-पीछे हम सबभी चलेंगे और सब तरह से तुम्हारी रक्षा करेंगे।

भीम ने भी कहा एक बार तुम व्युह को तोड़ दो वहां के बड़े-बड़े वीरों को मारकर हम लोग व्युह का विध्वंस कर डालेंगे।

अभिमन्यु के द्वारा अपने सारथि को रथ द्रोणाचार्य के पास ले जाने की आज्ञा देने पर उनके सारथि ने अभिमन्यु से कहा-‘पांडवों ने आप पर बहुत बड़ा भार रख दिया है। द्रोणाचार्य सब तरह से निपुण हैं। आप इस पर थोड़ी देर विचार कर लीजिए।’ सारथी की बात पर अभिमन्यु ने हंसकर उसे समझाया और शीघ्र ही द्रोण की सेना के पास चलने की आज्ञा दी। सारथी मन से बहुत प्रसन्न तो नहीं हुआ परंतु वह घोड़ों को द्रोण की ओर ले गया।

अभिमन्यु अपने पिता अर्जुन से भी बड़ा पराक्रमी था। दोनों ओर के योद्धाओं में घोर संग्राम होने लगा। उस भयंकर युद्ध में द्रोण के देखते ही देखते व्युह भेद कर अभिमन्यु उसके भीतर घुस गया। उसके बाणों से बहुत से योद्धा धराशाई हो गए। उसने अकेले ही अचिन्तनिय पराक्रम कर दिखाया।

अपनी सेना को तितर-‌बितर होते देख दुर्योधन अत्यंत क्रोध में भरा हुआ अभिमन्यु के सामने आया। द्रोणाचार्य की आज्ञा से अनेक वीर योद्धा दुर्योधन की चारों ओर से रक्षा करने लगे। अभिमन्यु पर तीखे बाणों की वर्षा कर उन्होंने दुर्योधन को बचा लिया।

अभिमन्यु के अद्भुत पराक्रम से सारी सेना विचलित होकर भागने लगी। तब कौरव सेना के अनेकों महारथियों ने अभिमन्यु पर बाणों की वर्षा कर घायल कर दिया।

अभिमन्यु ने शरीर को छेद देने वाले बाणों को चलाकर कर्ण का कवच तोड़ दिया। उसके अद्भुत पराक्रम से अभिमन्यु शत्रु सेना को चारों दिशाओं में दिखाई दे रहा था।

इधर जब अभिमन्यु के पीछे पीछे शेष पांडव अभिमन्यु की रक्षा के लिए चले तो जयद्रथ ने अपने दिव्यास्त्रों का प्रयोग करके पांडवों को सेना सहित रोक दिया। जयद्रथ को यह दिव्य अस्त्र भगवान शंकर ने उसकी आराधना से प्रसन्न होकर यह कह कर दिए थे कि तुम अर्जुन को छोड़ शेष चार पांडवों को युद्ध में जीत सकोगे। वरदान के प्रभाव से जयद्रथ ने उन्हें व्युह के अंदर जाने से रोक दिया।

अभिमन्यु ने अकेले ही कौरव सेना के कई प्रमुख वीरों का संहार कर दिया। अभिमन्यु एक-एक करके कौरव सेना के योद्धाओं को मार रहा था।

तब कर्ण ने द्रोणाचार्य से कहा अभिमन्यु हम सबको कुचल रहा है। इसके वध का कोई उपाय बताइए।

कर्ण की बात सुनकर द्रोण ने कहा अर्जुन को मैंने जो कवच धारण करने की विद्या सिखाई थी निश्चय ही उस संपूर्ण विद्या को यह भी जानता है। अतः यदि इसके धनुष और प्रत्यंचा को काटकर इसके घोड़े व सारथि को मार दिया जाए तो कार्य हो सकता है। कर्ण तुम बड़े धनुर्धर हो तुम कर सको तो यही करो। सब प्रकार से असहाय करके इसे युद्ध क्षेत्र से भगाओ और पीछे से प्रहार करो यदि इसके हाथ में धनुष रहा तो इसे देवता भी नहीं हरा सकते।

आचार्य द्रोण के बताए अनुसार कर्ण ने अभिमन्यु को धनुष और रथहीन कर दिया। इसके बाद असहाय अकेले अभिमन्यु पर निर्दयी छहः महारथियों ने बाणों की वर्षा कर दी। अभिमन्यु ने तब भी अपने धर्म का पालन किया। हाथ में ढाल-तलवार लेकर वह बालक उछला ही था कि द्रोणाचार्य ने ‘छुरप्र’ नामक बाण से उसकी तलवार के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और कर्ण ने उसकी ढाल छिन्न-भिन्न कर दी।

अभिमन्यु के पास तलवार भी नहीं थी। सारे अंगों में बाण धंसे हुए थे। उसी दशा में वह क्रोध में भरकर रथ के पहिए को चक्र की तरह लेकर द्रोणाचार्य पर झपटा। सबने मिलकर उस चक्ररूपी पहिए के भी टुकड़े-टुकड़े कर दिए। तब उस वीर अभिमन्यु ने हाथ में गदा ली और अश्वत्थामा पर चलायी। उस वज्र के समान गदा को आते देख अश्वत्थामा एक और हट गया। उसके घोड़े और सारथी मारे गए।
कई और महारथियों को अपनी गदा से मारकर अभिमन्यु ने दुशासन के पुत्र के रथ और घोड़ों को तोड़ डाला।

दुशासन का पुत्र और अभिमन्यु एक दूसरे पर गदा से प्रहार करने लगे। गदा की चोट लगने पर दोनों एक साथ ही पृथ्वी पर गिर पड़े।
दुशासन का पुत्र पहले उठा और अभिमन्यु अभी उठ ही रहा था कि उसने अभिमन्यु के मस्तक पर गदा मारी। प्रचंड आघात से अभिमन्यु पुणः मूर्छित होकर गिर पड़ा।

उसके बाद सब ने मिलकर अभिमन्यु को मार दिया। द्रोण और कर्ण जैसे छहः प्रमुख महारथियों ने मिलकर अकेले अभिमन्यु का वध किया था।

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