पौराणिक काल से यह स्थान अनेक विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी है। प्राचीन काल से ही इस जनपद का उत्तरी, उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी भाग सघन वनों से आच्छादित रहने के कारण ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहा है। इस वन प्रांत में अनेक ज्ञात और अज्ञात ऋषि- मुनियों के निवास स्थान एवं आश्रम हुआ करते थे।

मालिनी नदी आज भी यहां बहती है। पुराणों के अनुसार मालिनी नदी के तट पर महर्षि कण्व का आश्रम था। जहां शकुंतला और महाराजा दुष्यंत का प्रथम मिलन और गंधर्व विवाह हुआ था। इन्हीं की संतान थी भरत जो अपने बाल्यकाल में यहीं  सिंह हाथी आदि वन्य प्राणियों के साथ खेला करते थे। खेल खेल में भरत शेर के जबड़े को खोल कर उसके दांत गिन लिया करते थे। इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा था। इसी पौराणिक कथानक को महाकवि कालिदास ने  अपनी विश्व प्रसिद्ध साहित्यिक रचना अभिज्ञान शाकुंतलम में साहित्यबद्ध किया है l

इस भूमि पर सघन वन और पवित्र गंगा का तट होने के  कारण यहां ऋषि-मुनियों ने घोर तप किए, इसीलिए बिजनौर की धरती देवभूमि और तपोभूमि भी कहलाती है।

इसी बिजनौर जनपद में गंगा के तट पर महाभारत काल का एक पावन और रमणीक स्थान विदुर कुटी है l भगवान श्री कृष्ण इस स्थान पर आए थे और यहां विदुर जी के घर  बथुए के साथ को खाया था। महाभारत युद्ध  में मारे गए सभी सैनिकों की विधवाओं को विदुर जी अपने साथ यहां ले आए थे और सभी को यहीं अपने आश्रम के पास बसाया था। वह स्थान आज के समय में दारानगर के नाम से जाना जाता है।

महाभारत काल की एक और प्रसिद्ध  राजा मोरध्वज की कथा का संबंध भी यहां से है। बिजनौर में नजीबाबाद के पास राजा मोरध्वज के नगर और किले के पुरातत्व अवशेष आज भी मिलते हैं ।

बिजनौर का बहुत पहले वेन नगर नाम था। राजा वेन के नाम पर इसे  वेन कहा जाता था। बाद में समय और भाषा में आए परिवर्तन के कारण इसका नाम विजयनगर हुआ और अब बिजनौर है।

राजा वेन के नगर के अवशेष बिजनौर से कुछ दूर खेतों में खंडहर के रूप में मिलते हैं। उस समय की दिवारें, मूर्तियां, खिलौने आदि आज भी यहां मिलते हैं। यहां से थोड़ी ही दूरी पर गंगा नदी बहती है। माना जाता है कि किसी समय गंगा में आई भारी बाढ़ में यह नगर काल- कवालित हो गया।

इसी जनपद में मंडावर कस्बा है। बौद्ध काल में यह एक प्रसिद्ध बौद्ध स्थल था। प्रसिद्ध इतिहासकार कनिंघम का मानना है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था और इस स्थान पर 6 माह तक रहकर उसने इस पूरे इलाके का ऐतिहासिक और  भौगोलिक अध्ययन किया था।

इतिहास की किताबों में एक और प्रसिद्ध  अरब यात्री इब्नेबतूता का वर्णन मिलता है। इब्नबतूता भी मंडावर आया था और उसने अपने यात्रा वर्णन में दिल्ली से मंडावर होते हुए अमरोहा जाने के बारे में लिखा है। सुल्तान इल्तुतमिश भी सन 1227 में मंडावर आया था और उसने यहां एक मस्जिद बनवाई थी। मंडावर के ही मुंशी शहामत अली ने इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया को उर्दू का ट्यूशन पढ़ाया था।

मुगल बादशाह अकबर के नौ रत्नों में से अबुल फजल और फैजी का जन्म आजमपुर गांव में हुआ था और उन्होंने इसी गांव में तालीम हासिल की थी। कहा तो यह भी जाता है की बीरबल बिजनौर से ही कुछ दूर स्थित गांव खीरी के रहने वाले थे।

देखा जाए तो पूरा बिजनौर जनपद ही पौराणिक और इतिहास की महत्वपूर्ण कथाओं और घटनाओं से भरा पड़ा है।

रियासती काल में बिजनौर जनपद के इलाके में रियासतदारों के साथ- साथ जमीदार त्यागी राजपूतों का भी बहुत प्रभाव रहा है। यहां साहनपुर, कूकड़ा, धर्मनगरी, हल्दौर और ताजपुर आदि रियासतें रही हैं। साहनपुर रजवाड़ा तो अकबर काल से ही रियासत थी I यहां की बाकी रियासतें भी बहुत पुराने समय से ही रियासतें रहती आई थी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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