_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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भगवान श्री कृष्ण यानी श्याम के नाम पर बनी शामली

शामली का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के साथ हस्तिनापुर से युद्धभूमि कुरुक्षेत्र में जाने के लिए शामली से होकर ही गए थे। मार्ग से गुजरते हुए श्री कृष्ण ने यहां वृक्षों से आच्छादित मनोरम स्थान हनुमान धाम में कुछ समय के लिए विश्राम करके रास्ते की थकान को मिटाया था और यहां के वृक्षों के मीठे फल खाए थे और यंहा के मीठे जल के पुराने कुएं से जल पीकर अपनी प्यास बुझाई थी। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण के नाम पर ही इस स्थान का नाम श्यामवाली पड़ा। जो कालांतर में शामली हो गया।

इतिहास के पन्नों में भी शामली का नाम पीछे नहीं है। मराठों ने दिल्ली पर अधिकार करने के उद्देश्य से शामली को सैनिक छावनी के रूप में विकसित किया था। उसी समय मराठों ने शामली नगर के चारों कोनों पर चार शिवालयों की स्थापना करके उन्हें आपस में भूमिगत सुरंगों से जोड़ा था।

सन 1857 में स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम में शामली क्रांति का गढ़ था। 1857 की क्रांति में चौधरी मोहर सिंह के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने अंग्रेजों के शासन से त्रस्त जनता को उनसे मुक्ति दिलाने के लिए अंग्रेजी शासकों की बर्बरता पूर्वक नीतियों का डटकर जवाब दिया। मथुरा में स्वामी विरजानंद के संपर्क में रहकर क्रांतिकारी गुणों की बदौलत चौधरी मोहर सिंह ने अंग्रेजों के बर्बर शासन से देश की जनता को मुक्ति दिलाने के लिए अपने आप को पूरी तरह से समर्पित कर दिया। चौधरी मोहर सिंह के नेतृत्व में यहां की अनेक महिलाएं भी स्वतंत्रता की इस क्रांति ज्वाला में कूद पड़ी थी। उन्होंने अपने क्रांतिकारी सैनिकों के साथ शामली तहसील पर हमला बोलकर, तहसील भवन को जला दिया था और दो माह तक निरंतर अपना कब्जा
बनाए रखा। लेकिन अंग्रेजी सेना ने शामली पर फिर से अधिकार जमा लिया। इस सूचना के मिलते ही चौधरी मोहर सिंह ने शामली में जंग होने की स्थिति को देख कर क्रांति वीरों के साथ बनत गांव के पास पहुंचकर अपना मोर्चा जमा लिया। इसमें उनके साथ यहां की वीरांगनाएं भी शामिल थी। चौधरी मोहर सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजी फौजियों की टुकड़ी पहुंचते ही इन वीरों ने अंग्रेज टुकड़ी पर हमला बोल दिया। उस समय वे घोड़े पर सवार थे और उनकी तलवार अंग्रेजी सैनिकों पर बिजली की तरह टूट पड़ी। जिसमें उन्होंने बहुत सारे अंग्रेजी सैनिकों को मार गिराया। तो इस जंग में अनेक क्रांतिकारी वीर भी मारे गए। इसी जंग में दुर्भाग्यवश चौधरी मोहर सिंह को गोली लग गई और वे वीरगति को प्राप्त हुए।
अंग्रेजों ने जनता को आतंकित करने के लिए चौधरी मोहर सिंह की लाश को शामली की कोतवाली में लाकर पेड़ से फांसी पर लटका दिया।

बाद में अंग्रेज कंपनी सरकार ने आग बबूला होकर इस क्षेत्र के किसानों के घर व खेत में खड़ी फसलों को जला डाला और इस क्षेत्र की जनता के साथ आग का बदला आग से लेकर अपनी दमनकारी नीति से असहनीय शारीरिक यातनाएं दी। अपने क्रोध की ज्वाला को शांत करने के लिए शामली की तहसील को तोड़कर, शामली के स्थान पर कैराना को नई तहसील बना दिया।

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