सहारनपुर जनपद का नुकड़ कस्बा पांडवों द्वारा बसाया गया है। पांच पांडवों में एक भाई नकुल के नाम पर इसका नाम नकुल पड़ा जो बाद में अपभ्रंश होकर नकुड़ हो गया।

नकुलेश्वर महादेव मंदिर  –  नकुल द्वारा स्थापित यह शिव मंदिर पौराणिक तथा चमत्कारिक ही नहीं हमारी सांस्कृतिक विरासत का भी केंद्र है।

इस मंदिर के बारे में बताया जाता है कि महाभारत का युद्ध होने से पहले पांडवों ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए यहां आकर यमुना नदी के किनारे शिव मंदिर और एक कुएं का निर्माण कराया। इनका निर्माण एक ही रात्रि में दुधी नामक पत्थर से कराया गया। पांडवों द्वारा निर्मित  मंदिर और कुएं को आज भी प्राचीन रूप में देखा जा सकता है।

कुएं का जिस दुधी नामक पत्थर से निर्माण किया गया है , वे पत्थर इतने बड़े बड़े हैं कि उन्हें पाच – सात युवक मिलकर भी उठा पाने में सफल नहीं हो सकते हैं।

इस कुएं के बारे में किवदंती है कि इस कुएं के जल से शिवलिंग का जलाभिषेक करने वाले श्रद्धालु की हर मनोकामना भगवान शंकर पूरी करते हैं।

इस कुएं के बारे में एक और आश्चर्यजनक बात है कि इस कुएं के जल की ऊपरी सतह हमेशा सड़क की ऊपरी सतह के  बराबर बनी रहती है। गर्मी के मौसम में जब आसपास के जल स्रोतों का जलस्तर जमीन के काफी नीचे चला जाता है। उस समय भी इस प्राचीन कुएं का जलस्तर हमेशा सड़क की सत्य के बराबर ही बना रहता है l

पांडवों के बनवाए इस कुएं के प्रती एक और आश्चर्य जुड़ा हुआ है। पांडवों ने जब इस कुएं का निर्माण कराया था ।उस समय रात्रि बीत जाने के कारण कुएं की मुंडेर अधूरी ही छोड़ दी गई थी। कुएं.की वह मुंडेर आज भी हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी अधूरी अवस्था में ही है।

नकुल द्वारा स्थापित किया गया नकुलेश्वर महादेव मंदिर इस क्षेत्र का सबसे भव्य मंदिर एवं सबकी मनोकामना पूरी करने वाला मंदिर माना जाता है।

महाशिवरात्रि के अवसर पर नकुलेश्वर महादेव मंदिर के शिवलिंग पर स्थानीय एवं दूरदराज के अंचलों और दूसरे जनपदों व प्रांतों के श्रद्धालु यहां आकर जलाभिषेक करके मनोकामनाएं मांगते हैं।

प्राचीन नकुलेश्वर महादेव मंदिर एवं कुआं हमारी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर है। यह मंदिर आज भव्य स्वरूप ग्रहण कर चुका है। यह पौराणिक मंदिर चमत्कारिक ही नहीं हमारी विरासत का भी केंद्र है।

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अनोखी है नकुड की रामलीला मंचन की परंपरा

 

पांच पांडवों में से एक नकुल द्वारा बसाई नगरी नकुड मे रामलीला मंचन की अनोखी परंपरा है। देशभर में जहां रामलीला मंचन विजयदशमी के अवसर पर किए जाने की परंपरा है। परंतु नकुड की रामलीला इसकी अपवाद है। नकुड में रामलीला का मंचन दशहरा के अवसर पर न हो कर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होती है जो कि पंद्रह दिन तक चलती है।

हर वर्ष चैत्र मास में रामनवमी से पूर्व अष्टमी तिथि को नारद मोह की लीला के मंचन के साथ रामलीला मंचन का श्री गणेश शुरू हो जाता है। रामनवमी के दिन श्री राम जन्मोत्सव की लीला का मंचन किया जाता है। पंद्रह दिनों तक चलने वाली रामलीला नगर में एक उत्सव के रूप में मनाई जाती है। श्री राम सीता का विवाह तथा श्री राम के वन से आने की लीला का मंचन दिन के समय नगर के जनक बाजार के बीचोबीच किया जाता है। इन दोनों लीलाओं श्री राम बारात व भरत मिलाप के समय नगर में जुलूस निकालकर पूरा नगर इसमें शामिल हो राममय हो जाता है। अन्य दिनों की लीलाओं का मंचन रात्रि में रामलीला भवन में किया जाता है। नगर में सैकड़ों वर्षों से इस परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है।

पूरे देश में जहां विजयादशमी के अवसर पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है। परंतु नकुड में रावण दहन करने की परंपरा नहीं है। यहां के लोगों का मानना है कि रावण के पुतले के दहन से श्री राम के द्वारा लंका पर विजय प्राप्त करने के अहंकार का भाव उत्पन्न होता है इसलिए नकुड’ में रावण के पुतले के दहन करने की परंपरा नहीं है।

 

 

 

 

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