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देवबंद के आसपास के स्थान

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*** जखवाला गांव –

देवबंद कस्बे से 8 किलोमीटर दक्षिण में यह गांव स्थित है।

इस गांव का नाम जखवाला तालाब के नाम पर पड़ा है। यक्ष वाला तालाब से अपभ्रंश होकर जख वाला तालाब नाम पड़ा।
महाभारत काल में जब पांडव अज्ञातवास के समय इधर उधर भटक रहे थे तब वह इस स्थान पर भी आए थे। एक दिन पानी की तलाश में एक- एक करके नकुल, सहदेव, भीम और अर्जुन पानी लेने के लिए सरोवर के किनारे पहुंचे लेकिन सरोवर के स्वामी यक्ष के प्रश्नों का सही उत्तर नहीं दे पाने के कारण वह सभी अचेत होकर गिर पड़े। सबसे अंत में अपने भाइयों को खोजते हुए धर्मराज युधिष्ठिर सरोवर के पास पहुंचे। धर्मराज युधिष्ठिर ने सरोवर के स्वामी यक्ष के सभी प्रश्नों के उचित उत्तर दिए। तब यक्ष ने प्रसन्न होकर युधिष्ठिर से कहा कि तुम इन चारों भाइयों में से किसी एक को जीवित करा सकते हो। जिस पर युधिष्ठिर ने कहा कि कुंती के पुत्र के रूप में तो मैं स्वयं जीवित हूं और माद्री पुत्र के रूप में आप नकुल सहदेव में से किसी एक को जीवित कर दो। धर्मराज युधिष्ठिर के न्याय को देख कर यक्ष ने प्रसन्न होकर सभी पांडवों को जीवित कर दिया था।

इस क्षेत्र के ग्रामीण दावा करते हैं कि जखवाला तालाब ही यक्ष का तालाब है। कुछ दशक पहले तक तालाब के भीतर के पक्के निर्माण का कुछ भाग देखा जा सकता था। बताया जाता है कि पुरातत्व विभाग की टीम भी जखवाला तालाब और आसपास के स्थान का निरीक्षण करने के लिए आई थी।

जखवाला गांव के आसपास के भी कई स्थान पांडवों से संबंधित रहे हैं। जिससे इसके नाम के पीछे की कहावत सच प्रतीत होती है।

* चंडी देवी मंदिर –

जखवाला गांव में स्थित शक्ति का प्रतीक चंडी देवी मंदिर का इतिहास शताब्दियों पुराना है। गांव वालों की मान्यता है कि जब मराठों ने इस जखवाला गांव पर चढ़ाई की थी देवी ने ही गांव की सुरक्षा की थी। यही कारण है वैशाख के अंतिम सोमवार को प्रतिवर्ष देवी का मेला लगता है। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इसके अलावा प्रतिदिन भी मंदिर में देवी के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

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*** रणखंडी गांव –

जखवाला गांव के समीप में ही रणखंडी गांव स्थित है। कहते हैं कि कौरवों और पांडवों ने युद्ध के लिए रणखंडी गांव की जमीन को ही चुना था। रणखंडी नाम भी रण क्षेत्र का ही अपभ्रंश है। पांडवों और कौरवों की सेना भी यहां जुट गई थी। लेकिन यहां के हरे भरे क्षेत्र को देखकर उन्होंने यहां युद्ध करने का विचार त्याग दिया था।

जखवाला गांव के पश्चिम में स्थित जड़ौदा पांडा गांव को भी पांडव कालीन बताया जाता है।

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*** टिकेरौल गांव –

देवबंद तहसील के गांव टिकरोल में 1000 वर्ष पुराना शिव मंदिर यह मंदिर काफी दिनों से उपेक्षित और खंडहर के रूप में था गांव के कुछ भक्तों ने इसके पुनरुद्धार के लिए जब इसकी सफाई की तो उसमें एक शिलालेख लगा मिला जिस पर श्री गणेशाय नमः के साथ संवत १०२४ अंकित है इसके साथ ही शिलालेख पर
‘रिघनार्थ ८ जी का से नवत गुर जी का चेला सरवन गिर सिवाला’ भी अंकित है।

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*** मीरगपुर गांव –

देवबंद से 8 किमी दूर काली नदी के तट पर स्थित मीरगपुर गांव अपने विशेष रहन-सहन और सात्विक खानपान के लिए विख्यात है। आज के समय में जहां अधिकांश लोगों में मांस मदिरा और नशे के अन्य साधनों का सेवन बढ़ रहा है। वहीं इस गांव में मांस और मदिरा पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। गांव के किसी परिवार या उसके किसी सदस्य ने शराब और मांसाहार के साथ लहसुन व प्याज का सेवन भी किया वह या तो गांव छोड़कर चला गया अथवा उनके साथ ऐसी कोई अनहोनी हुई कि उन्हें इन प्रतिबंधित वस्तुओं का सेवन करना भारी पड़ गया।

इस गांव को मांस मदिरा और किसी भी प्रकार के अन्य नशे से रहित बनाने के पीछे बाबा फकीर दास की सीख आज भी काम कर रही है। मुगल बादशाह जहांगीर के शासन के समय की बात है जब बाबा फकीर दास यहां आकर रुके थे। बाबा फक्कड़ दास ने अपने शिष्यों को जेल से इसी शर्त पर रिहा कराया था कि वे कभी भी किसी प्रकार का नशा नहीं करेंगे और मांसाहार का सेवन भी नहीं करेंगे पूरे गांव ने श्रद्धा पूर्वक बाबा की आज्ञा को मानते हुए जो प्रतिज्ञा की थी उसको गांव वाले आज भी पूरी श्रद्धा से पालन कर रहे हैं।

गांव के निवासी बताते हैं कि बादशाह जहांगीर के शासन में बादशाह के नुमाइंदों के अत्याचारों से यहां के लोग बहुत त्रस्त थे। तभी उनके गांव में पंजाब के रहने वाले सिद्ध पुरुष बाबा फकीर दास अपने शिष्यों के साथ घूमते हुए यहां आए थे। कुछ दिन बाबा इस गांव में रहे। बाबा फकीर दास के चमत्कारिक व्यक्तित्व और सिद्धियों से गांव वाले बहुत प्रभावित हुए। बाबा ने गांव वालों को उपदेश दिया कि अगर यहां के लोग नशा और तामसिक वस्तुओं का परित्याग कर देंगे तो यह गांव हर प्रकार से सुखी और समृद्ध शाली बन जाएगा। गांव के लोगों ने बाबा को जो वचन दिया था उसका पालन गांव वाले आज भी कर रहे हैं। गांव वालों के अनुसार जो लोग इस परंपरा का उल्लंघन करते उसे गुरु स्वयं ही सजा देते हैं। यह गांव गुर्जर जाति बहुल गांव है। गुर्जर समाज के लोग अपनी बिरादरी में इस परंपरा का बड़ी कठोरता से पालन करते हैं। वैसे गांव में रहने वाले अन्य जाति के लोग भी इस परंपरा को पूरी तरह से निभाते हैं। इस गांव में रहने वाले व्यक्ति अपने भोजन में अंडा – मांस और प्याज लहसुन तक का प्रयोग नहीं करते। किसी भी प्रकार का नशा जिसमें शराब पान, बीड़ी- सिगरेट, हुक्का गुटका भांग आदि नशे के किसी भी प्रकार की वस्तु का सेवन भी नहीं करते हैं और न ही यह चीजें गांव में बेची जाती हैं।

काली नदी के किनारे एक ऊंचे टीले पर बाबा फकीर दास की समाधि बनी हुई है। बाबा फकीर दास जी की स्मृति में मीरगुपुर गांव में प्रति वर्ष फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि से पहले दशमी तिथि को मेले का धूमधाम से आयोजन किया जाता है

मेले में इस गांव के साथ-साथ दूर दूर से आए श्रद्धालु शक्कर का प्रसाद और चादर चढ़ाकर मनोकामनाएं मांगते हैं। इस मेले का मुख्य आकर्षण इस अवसर पर गांव के प्रत्येक घर में देसी घी का हलवा बनता है। मिरगपुर के गांव वाले संत बाबा फकीरदास जी की याद में भरने वाले मेले को एक त्यौहार की तरह मनाते हैं और अपने- अपने घरों में लोगों को बुलाकर अपने बनाए हुए व्यंजनों को खिलाते हैं। इससे गांव का यह मेला एक अलग ही रूप रंग ले लेता है।

यह मेला गांव वालों की आस्था से जुड़ा हुआ है। जिससे यह मेला अन्य स्थानों पर लगने वाले और दूसरे मेलों से अलग हटकर है।

मेले में प्रसाद की दुकानें, खेल- खिलौने, श्रृंगार सामग्री और खाने पीने की दुकानों के साथ साथ झूले भी लगते हैं। मेले में बच्चे खुशी से झूमते फिरते हैं

गांव वालों का कहना है कि बाबा फकीरा दास जी का आशीर्वाद हमेशा की तरह अब भी गांव वालों के साथ बना हुआ है। जिससे गांव में निरंतर खुशहाली बनी रहती है। बाबा फकीरा दास आज भी गांव वालों पर अपनी निगाहें रखते हैं। पुराने समय में यहां के गांव वालों द्वारा बाबा को दिए वचन के बाद से लगातार बाबा की कृपा यहां बनी हुई है। इस गांव वालों के लिए बाबा फकीरा दास भगवान के समान हैं।

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*** धूमगढ़ गांव ( बड़गांव) – नाग देवता मंदिर

गांव धूम गढ़ स्थित आस्था के बाबा नाग देवता मंदिर में स्थानीय रीति-रिवाजों के अंतर्गत प्रत्येक रविवार को पूजा अर्चना की जाती है। जिसमें प्रदेश ही नहीं उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान व अन्य कई राज्यों के श्रद्धालुगण मनोकामना पूरी होने के बाद प्रसाद वितरण करते हैं।
बाबा नाग देवता मंदिर का मुख्य प्रसाद दूध खीर है

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*** भायला गांव – सिद्धपीठ नागेश्वर महादेव मंदिर

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* खेड़ा मुगल स्थित मुगलकालीन तालाब

* जड़ौदा पांडा का तालाब – इस तालाब के किनारे

पांडवों ने तपस्या की थी।

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